छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 415, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 415
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४११
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| कर्म। लोकी लोकवांश्चास्मदीयेन लोकेनाग्नेयेन तद्वान्भवति यथा वयम्। इह च लोके सर्वं वर्षशतमायुरेति प्राप्नोति। ज्योगुज्ज्वलं जीवति नाप्रख्यातः इत्येतत्। न चास्यावराश्च ते पुरुषाश्चास्य विदुषः सन्ततिजा इत्यर्थः। न क्षीयन्ते सन्तत्युच्छेदो न भवतीत्यर्थः। किं च तं वयमुपभुञ्ज्मः पालयामोऽस्मिंश्च लोके जीवन्तममुष्मिंश्च परलोके। य एतमेवं विद्वानुपास्ते यथोक्तं तस्यैतत्फलमित्यर्थः ॥ २ ॥ | हमारे आग्नेय लोकके द्वारा उसी प्रकार लोकी—लोकवान् होता है जैसे कि हम हैं। इस लोकमें भी वह सम्पूर्ण—सौ वर्षकी आयु प्राप्त करता है; ज्योक्—उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है अर्थात् अप्रसिद्ध होकर नहीं जीता तथा इसके अवर पुरुष जो अवर—पश्चाद्वर्ती यानी संततिमें उत्पन्न हुए पुरुष हैं वे क्षीण नहीं होते अर्थात् इसकी संततिका उच्छेद नहीं होता। यही नहीं, इस लोकमें जीवित रहते हुए तथा परलोकमें भी हम उसका पालन करते हैं। तात्पर्य यह है कि जो विद्वान् इस प्रकार इसकी उपासना करता है उसे पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥