छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 418, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश खण्ड
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आहवनीयाग्निविद्या
अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति । एष विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥
तदनन्तर उसे आहवनीयाग्निने उपदेश किया—‘प्राण, आकाश, द्युलोक और विद्युत् [ ये मेरे चार शरीर हैं ] । यह जो विद्युत्में पुरुष दिखायो देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ’ ॥ १ ॥
स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥
वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इस ( चतुर्धा विभक्त अग्नि ) की उपासना करता है, पापकर्मको नष्ट कर देता है, लोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है तथा उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है । उसके पश्चाद्वर्ती पुरुष ( वंशज ) क्षीण नहीं होते तथा उसका हम इस लोक और परलोकमें भी पालन करते हैं जो कि इसे इस प्रकार जानकर इसको उपासना करता है ॥ २ ॥