छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 520, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| ततः शेषेणेत्यादिस्मृतिविरोधश्च स्यात्। | 'ततः शेषेण' (भुक्तावशेष कर्मोंसे जन्म लेता है) इत्यादि स्मृतिसे भी विरोध होता है। | | नन्विष्टापूर्तदत्तव्यतिरेकेणापि मनुष्यलोके शरीरोपभोगनिमित्तानि कर्माण्यनेकानि संभवन्ति, न च तेषां चन्द्रमण्डल उपभोगः, अतोऽक्षीणाणि तानि। | सिद्धान्ती—इस मनुष्यलोकमें इष्ट, पूर्त और दत्त—इन कर्मोंसे भिन्न और भी अनेकों शरीरोपभोगके निमित्तभूत कर्म हो सकते हैं; उनका चन्द्रमण्डलमें फलोपभोग भी नहीं होता, इसलिये वे अक्षीण ही रहते हैं। जिन कर्मोंके कारण वह चन्द्रमण्डलपर आरूढ होता है | | यन्निमित्तं चन्द्रमण्डलमारूढस्तान्येव क्षीणानीत्यविरोधः। | उन्हींका वहाँ क्षय भी होता है—इस प्रकार इसमें कोई विरोध नहीं है। | | शेषशब्दश्च सर्वेषां कर्मत्वसामान्यादविरुद्धः। | सब कर्मोंका कर्मत्व समान होनेके कारण [उपर्युक्त स्मृतिमें] 'शेष' शब्दका प्रयोग किया गया है। इसलिये वह भी अविरुद्ध ही है। | | अत एव च तत्रैव मोक्षः स्यादिति दोषाभावः; विरुद्धानेकयोन्युपभोगफलानां च कर्मणामेकैकस्य जन्तोरारम्भकत्वसंभवात्। न चैकस्मिञ्जन्मनि सर्वकर्मणां क्षय उपपद्यते, ब्रह्महत्यादेश्चैकैकस्य कर्मणोऽनेकजन्मारम्भकत्वस्मरणात्। स्थाव- | इसलिये 'उसका वहीं मोक्ष हो जाना चाहिये' ऐसा भी दोष नहीं आ सकता, क्योंकि एक-एक जीवके ऐसे कर्मोंका आरम्भकत्व सम्भव हो ही सकता है जिनके फल अनेकों विरुद्ध योनियोंमें भोगे जायँ। एक ही जन्ममें समस्त कर्मोंका क्षय हो जाना सम्भव भी नहीं है, क्योंकि स्मृतियोंमें 'ब्रह्महत्या आदि एक-एक कर्म अनेक जन्मोंके आरम्भक हैं' ऐसा बतलाया गया है। तथा |