भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 628, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 628
६२४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| स्थितिमुत्पादयन्मनो भवति । मनोरूपेण विपरिणमन्मनस उपचयं करोति । | इन्द्रियसमूहकी स्थिति उत्पन्न करता हुआ मन हो जाता है । वह मनरूपसे विपरिणाम (विकार) को प्राप्त होता हुआ मनका उपचय करता है । | | ततश्चान्नोपचितत्वान्मनसो भौतिकत्वमेव; न वैशेषिकतन्त्रोक्तलक्षणं नित्यं निरवयवं चेति गृह्यते । यदपि 'मनोऽस्य दैवं चक्षुः' इति वक्ष्यति तदपि न नित्यत्वापेक्षया; किं तर्हि ? सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टादिसर्वेन्द्रियविषयव्यापकत्वापेक्षया । यच्चान्येन्द्रियविषयापेक्षयानित्यत्वम्, तदप्यापेक्षिकमेवेति वक्ष्यामः। “सत् ⋯ एकमेवाद्वितीयम्” (छा०उ० ६।२।१) इति श्रुतेः ॥ १ ॥ | इस कारण भौतिक होना ही सिद्ध होनेसे मनका भौतिक होना ही सिद्ध होता है । वह वैशेषिक दर्शनके कहे हुए लक्षणवाला नित्य और निरवयव है—ऐसा नहीं स्वीकार किया जाता । आगे (छा० ८।१२।५ में) जो कहा जायगा कि 'मन इसका दैव चक्षु है' वह भी मनके नित्यत्वकी अपेक्षासे नहीं है । तो फिर किस दृष्टिसे है ? वह कथन सूक्ष्म, व्यवहित और दूरवर्ती इत्यादि सभी प्रकारके इन्द्रियोंके विषयोंमें व्यापक होनेकी अपेक्षासे है । तथा जो अन्य इन्द्रियोंकी अपेक्षासे उसका नित्यत्व है वह भी आपेक्षिक ही है—ऐसा हम आगे चलकर कहेंगे, क्योंकि “सत् एकमात्र और अद्वितीय है” ऐसी श्रुति है [ अतः उसके सिवा और कोई परमार्थ-सत्य नहीं हो सकता] ॥१॥ |

| तथा— | इसी प्रकार— |

आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ २ ॥