छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 699, कुल 978 में से
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खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९५
| संसारिणो यो मरणक्रमः स एवायं विदुषोऽपि सत्सम्पत्तिक्रम इत्येतदाह-- | संसारी जीवका जो मरणक्रम है वही विद्वान्की सत्सम्पत्तिका क्रम है--इसी बातको आरुणि बतलाता है-- |
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अथ यदास्य वाङ् मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ॥ २ ॥
फिर जिस समय उसकी वाणी मनमें लीन हो जाती है तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता है तब वह नहीं पहचानता ॥ २ ॥
| परस्यां देवतायां तेजसि सम्पन्नेऽथ न जानाति ।<br><br>सत्सम्पत्तिक्रमः<br>अविद्वांस्तु सत उत्थाय प्राग्भावितं व्याघ्रादिभावं देवमनुष्यादिभावं वा विशति । विद्वांस्तु शास्त्राचार्योपदेशजनितज्ञानदीपप्रकाशितं सद्ब्रह्मात्मानं प्रविश्य नावर्तत इत्येष सत्सम्पत्तिक्रमः ।<br><br>अन्ये तु मूर्धन्यया नाड्योत्क्रम्यादित्यादि-<br>मतान्तरनिरासः<br>द्वारेण सद्गच्छन्तीत्याहुः, तदसत्; देशकाल- | परदेवतामें तेजके लीन हो जानेपर फिर यह नहीं पहचानता। किंतु जो अविद्वान् होता है वह तो सत्से उत्थित होकर पहले भावना किये हुए व्याघ्रादि भाव और देव-मनुष्यादि भावमें प्रवेश करता है; किंतु विद्वान् शास्त्र और आचार्यके उपदेशजनित ज्ञानदीपकसे प्रकाशित सद्ब्रह्मरूप आत्मामें प्रवेशकर फिर नहीं लौटता—यही सत्प्राप्तिका क्रम है।<br><br>कुछ अन्य मतावलम्बियोंने जो कहा है कि मूर्धन्य नाडीसे उत्क्रमण कर आदित्यादिद्वारा सत्को प्राप्त होता है, वह ठीक नहीं है, क्योंकि इस प्रकारका गमन तो देश, काल, निमित्त और फलके अभिनिवेश- |
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