छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 76, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २ |
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उद्गीथाक्षरोंमें द्युलोकादि तथा सामवेदादिदृष्टि
| त्रयाणां श्रुत्युक्तानि सामान्यानि तानि तेनानुरूपेण शेषेष्वपि द्रष्टव्यानि— | इन तीनोंकी समानता श्रुतिने बतलायी है। उन्हींके अनुसार शेष स्थानोंमें भी समझनी चाहिये— |
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द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्थँ सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गीरृग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्गीथ इति ॥ ७ ॥
द्यौ ही 'उत' है, अन्तरिक्ष 'गी' है और पृथिवी 'थ' है। आदित्य ही 'उत' है, वायु 'गी' है और अग्नि 'थ' है। सामवेद ही 'उत' है, यजुर्वेद 'गी' है और ऋग्वेद 'थ' है। इन अक्षरोंको इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् 'उद्गीथ' इस प्रकार इन उद्गीथाक्षरोंकी उपासना करता है उसके लिये वाणी, जो [ऋग्वेदादि] वाक्का दोह है, उसका दोहन करती है तथा वह अन्नवान् और अन्नका भोक्ता होता है ॥ ७ ॥
| द्यौरेव उत्, उच्चैःस्थानात् । | ऊँचे स्थानवाला होनेके कारण द्युलोक ही 'उत्' है, | | अन्तरिक्षं गीर्गिरणाल्लोकानाम् । | लोकोंका गिरण करने (निगलने) से अन्तरिक्ष 'गी' है और | | पृथिवीथं प्राणिस्थानात् । आदित्य एव उत्; ऊर्ध्वत्वात् । वायुर्गीर- | प्राणियोंका स्थान होनेके कारण पृथिवी 'थ' है। ऊँचा होनेके कारण आदित्य ही 'उत्' है, | | ग्न्यादीनां गिरणात् । अग्निस्थं यज्ञकर्मावस्थानात् । सामवेद एव उत्, स्वर्गसंस्तुतत्वात् । यजुर्वेदो | अग्नि आदिको निगलनेके कारण वायु 'गी' है और यज्ञसम्बन्धी कर्मका अवस्थान (आश्रय) होनेसे अग्नि ही 'थ' है तथा स्वर्गमें स्तुत होनेके कारण सामवेद ही 'उत्' है, यजुर्वेद 'गी' है, क्योंकि |