भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 837, कुल 978 में से

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पृष्ठ 837
खण्ड ३ ]शाङ्करभाष्य८३३
संस्कृतहिन्दी
रूपसम्पद्य स्वास्थ्यमुपगम्येत्ये-<br>तत् । स्वेनात्मीयेन रूपेणाभि-<br>निष्पद्यते। प्रागेतस्याः स्वरूपसम्प-<br>त्तेरविद्यया देहमेवापरं रूपमा-<br>त्मत्वेनोपगत इति तदपेक्षयेद-<br>मुच्यते स्वेन रूपेणेति ।हो अर्थात् आत्मस्थितिमें पहुँचकर स्वकीय अर्थात् अपने रूपसे सम्पन्न हो जाता है। इस स्वरूपप्राप्तिसे पूर्व वह अपररूप देहको ही अविद्याके कारण आत्मभावसे समझता था । उसीकी अपेक्षासे 'स्वेन रूपेण' (अपने स्वरूपसे) ऐसा कहा गया है।
अशरीरता ह्यात्मनः स्वरूपम् । यत्स्वं परं ज्योतिःस्वरूपमापद्यते सम्प्रसाद एष आत्मेति होवाच । स ब्रूयादिति यः श्रुत्या नियुक्तोऽन्तेवासिभ्यः । किञ्चैतदमृतमविनाशि भूमा "यो वै भूमा तदमृतम्” (छा० उ० ७।२४।१) इत्युक्तम् । अत एवाभयं भूम्नो द्वितीयाभावादत एतद्ब्रह्मेति ।अशरीरता ही आत्माका स्वरूप है। जिस अपने परञ्ज्योतिःस्वरूपको सम्प्रसाद प्राप्त होता है वही आत्मा है—ऐसा आचार्यने कहा । तात्पर्य यह है कि श्रुतिने जिसे नियुक्त किया है उस आचार्यको शिष्योंके प्रति ऐसा कहना चाहिये। तथा यही अमृत—अविनाशी भूमा है, क्योंकि “जो भूमा है वही अमृत है” ऐसा कहा जा चुका है। इसीसे यह अभय है, क्योंकि भूमासे भिन्न दूसरी वस्तुका अभाव है; इसलिये यह ब्रह्म है।
तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नामाभिधानम् । किं तत् ? सत्यमिति । सत्यं ह्यवितथं ब्रह्म । तत्सत्यं स आत्मेति ह्युक्तम् ।उस इस ब्रह्मका यह नाम—अभिधान है। वह क्या है?—सत्य । सत्य ही अवितथ (असद्विलक्षण) ब्रह्म है, क्योंकि 'वह सत्य है, वह आत्मा है' ऐसा पहले (छा० ६।८।७ में) कहा जा