छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 839, कुल 978 में से
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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३५
| रस्तन्मर्त्यम् । अथ यद्यमक्षरं तेनाक्षरेणामृतमर्त्याख्ये पूर्वे उभे अक्षरे यच्छति यमयति नियमयति वशीकरोत्यात्मनेत्यर्थः । | वह मर्त्य है और जो 'यम्' अक्षर है उस अक्षरसे अमृत और मर्त्यसंज्ञक पहले दोनों अक्षरोंका प्रयोग करनेवाला उनका नियमन करता है अर्थात् उसके नियमन स्वभावसे उन्हें वशीभूत करता है । |
| यद्यस्मादनेन यमित्येतेनोभे यच्छति तस्माद्यम् । संयते इव ह्येतेन यमा लक्ष्येते ब्रह्मनामाक्षरस्यापीदममृतत्वादिधर्मवत्त्वं महाभाग्यं किमुत नामवत इत्युपास्यत्वाय स्तूयते ब्रह्मनामनिर्वचनेनैव । नामवतो वेत्तैवंवित् । अहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमेतीत्युक्तार्थम् ॥ ५ ॥ | क्योंकि इस अक्षरके द्वारा इन दोनोंको नियमन करता है इसलिये यह 'यम्' है । इस 'यम्' अक्षरके द्वारा वे पूर्वोक्त दोनों अक्षर संयत-से दिखायी देते हैं । ब्रह्मके नामके अक्षरोंका भी यह अमृतत्वादि धर्मवान् होना परम सौभाग्य है, फिर नामीके विषयमें तो कहना ही क्या है ? इस प्रकार उसके उपास्यत्वके लिये ब्रह्मके नामका निर्वचन करके ही उसकी स्तुति की जाती है । उस नामीको जाननेवाला 'एवंवित्' कहलाता है । वह एवंवित् ( इस प्रकार जाननेवाला ) नित्यप्रति स्वर्गलोकको जाता है—ऐसा अर्थ पहले कहा ही जा चुका ह ॥५॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदष्टमाध्याये तृतीयखण्ड- भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥
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छा० उ० २७—