छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 938, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| आत्मनः सत्तामात्र एव ज्ञानकर्तृत्वं न तु व्यापृततया। यथा सवितुः सत्तामात्रमेव प्रकाशनकर्तृत्वं न तु व्यापृततयेति, तद्वत्। <br><br> मनोऽस्यात्मनो दैवमप्राकृतमितरेन्द्रियैरसाधारणं चक्षुश्चष्टे पश्यत्यनेनेति चक्षुः। वर्तमानकालविषयाणि चेन्द्रियाण्यतोऽदैवानि तानि। मनस्तु त्रिकालविषयोपलब्धिकरणं मृदितदोषं च सूक्ष्मव्यवहितादिसर्वोपलब्धिकरणं चेति दैवं चक्षुरुच्यते। <br><br> स वै मुक्तः स्वरूपापन्नोऽविद्याकृतदेहेन्द्रियमनोवियुक्तः सर्वात्मभावमापन्नः सन्नेषः व्योमवद्विशुद्धः सर्वेश्वरो मनउपाधिः सन्नेतेनैवेश्वरेण मनसैतान्कामान्सवितृप्रकाशवन्नित्यप्रततेन दर्शनेन पश्यन्रमते ॥ ५ ॥ | का जो ज्ञानकर्तृत्व है वह केवल सत्तामात्रमें है, उसकी व्याप्तताके कारण नहीं है। जिस प्रकार सूर्यका प्रकाशन-कर्तृत्व उसकी सत्तामात्रमें ही है किसी व्यापारप्रवणताके कारण नहीं है, इसी प्रकार इसे समझना चाहिये। <br><br> मन इस आत्माका दैव—अप्राकृत अर्थात् अन्य इन्द्रियोंसे असाधारण चक्षु है; 'चष्टे अनेन'—जिससे देखता है उसे चक्षु कहते हैं। इन्द्रियाँ वर्तमानकालविषयक हैं, इसलिये वे अदेव हैं; किंतु मन तीनों कालोंके विषयोंकी उपलब्धिका करण, क्षीणदोष और सूक्ष्म एवं व्यवहित सभी पदार्थोंकी उपलब्धिका साधन है, इसलिये वह दैव चक्षु कहा जाता है। तथा वह आत्मा स्वरूपस्थित होनेपर मुक्त तथा अविद्याकृत देह, इन्द्रिय और मनसे वियुक्त है, सर्वात्मभावको प्राप्त होनेपर वह आकाशके समान विशुद्ध और सर्वेश्वर है तथा मनरूप उपाधिवाला होनेपर वही इस इन्द्रियोंके स्वामी मनसे ही सूर्यके प्रकाशके समान अपनी नित्य प्रसृत दृष्टिसे इन भोगोंको देखता हुआ रमण करता है ॥ ५ ॥ |
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