भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 110

चाहियें। वर्षा काल में खान पान के अन्दर प्रायः करके शहद का उपयोग करना चाहिये। बरसात के दिनों में जिस दिन वायु और बरसात जोर का पड़ रहा हो और सर्दी बहुत हो, उस दिन वायु को शान्त करने के लिये अम्ल, लवण रस तथा स्नेह घी जिस अन्न में स्पष्ट दीखता हो, उसे विशेष करके खाना चाहिये। अग्नि की रक्षा करने के लिये जौ, गेहूँ, चावल (पुराने), जंगली- वन के पशुओं का मांस एवं घी आदि से संस्कृत यूष खाने चाहिये। पित्त को शान्त करने के लिये थोड़ा शहद मिला माध्वीकारिष्ट (द्राक्षासव), अथवा पानी में शहद (थोड़ा) मिलाकर पीना चाहिये। वर्षा ऋतु में या तो आकाश से गिरा स्वच्छ पानी पीना चाहिये अथवा कुएं या तालाब के पानी को गरम करके ठण्डा करके पीना चाहिये। तैल का मर्दन, उबटन लगाना, स्नान करना सुगन्ध धारण करना, माला पहिनना, हल्का और साफ़ वस्त्र पहिनना, तथा सूखे स्थान पर रहना चलना आदि कार्य वर्षा ऋतु में करना चाहिये ।।३३-४०।।

शरद् ऋतु की परिचर्या— वर्षा-शीतोचिताङ्गानां सहसैवार्करश्मिभिः । तप्तानामाचितं पित्तं प्रायः शरदि कुप्यति ॥ ४१ ॥ तत्रान्नपानं मधुरं लघु शीतं सतिक्तकम् । पित्त-प्रशमनं सेव्यं मात्रया सुप्रकाङ्क्षितैः ॥ ४२ ॥ लावान् कपिञ्जलान् हरिणानुरभ्राञ्छरभाञ्छशान् । शालीन् सयवगोधूमान् सेव्यानाहुर्घनात्यये ॥ ४३ ॥ तिक्तस्य सर्पिषः पानं विरेको रक्तमोक्षणम् । धाराधरात्यये कार्यमातपस्य च वर्जनम् ॥ ४४ ॥ वसां तैलमवश्यायमौदकानूपमामिषम् । क्षारं दधि दिवास्वप्नं प्राग्वातं चात्र वर्जयेत् ॥ ४५ ॥

वर्षा ऋतु में काल स्वभाव से संचित हुआ पित्त शरद् काल में बादलों के हट जाने से, सूर्य के किरणों के ताप से सहसा कुपित होता है। इसलिये इस ऋतु में मधुर, लघु, शीत और तिक्त, पित्तशामक खान पान परिमाण में खाना चाहिये। बटेर, कटफोड़ा, हरिण, मेढ़ा, बारहसींगा और खरगोश इनका मांस, चावल, जौ, गेहूँ इनको शरद् काल में खाना चाहिये। तिक्त औषधियों से संस्कृत घृत (पंचतिक्त घृत), विरेचन, रक्तमोक्षण, शिरावेध, जोंक आदि से रक्त का निकलवाना और धूप का सेवन न करना ये काम बादलों के चले जाने पर शरद् ऋतु में करने चाहिये। इस ऋतु में चर्बी, तेल, ओस, जलचर प्राणि...