चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 165, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ११ ] सूत्रस्थानम् १४७ सीवन ( सीना ), एषण ( नाड़ी या गति व्रण को ढूंढना ), क्षार ( द्रव्यों को भस्मकर क्षरण होने वाला सार भाग ), जलौका ( जोंक ) इनके उपयोग को शस्त्र-प्रणिधान कहते हैं ॥ ५६ ॥ प्राज्ञो रोगे समुत्पन्ने बाह्येनाऽऽभ्यन्तरेण वा । कर्मणा लभते शम शस्त्रोपक्रमणेन वा ॥ ५७ ॥ बालस्तु खलु मोहाद्वा प्रमादाद्वा न बुध्यते । उत्पद्यमानं प्रथमं रोगं शत्रुमिवाबुधः ॥ ५८ ॥ अणुर्हि प्रथमं भूत्वा रोगः पश्चाद्विवर्धते । स जातमूलो मुष्णाति बलमायुश्च दुर्मतेः ॥ ५९ ॥ न मूढो लभते संज्ञां तावद्यावन्न पीड्यते । पांडितस्तु मति पश्चात्कुरुते व्याधिनिग्रहे ॥ ६० ॥ अथ पुत्रांश्च दारांश्च ज्ञातींश्चाऽऽहूय भाषते । सर्वस्वेनापि मे कश्चिद्भिषगानीयतामिति ॥ ६१ ॥ तथाविधं च कः शक्तो दुर्बलं व्याधिपीडितम् । कृशं क्षीणेन्द्रियं दीनं परित्रातुं गतायुषम् ॥ ६२ ॥ स त्रातारमनासाद्य बालस्त्यजति जीवितम् । गोधा लाङ्गूलबद्धेवाऽऽकृष्यमाणा बलीयसा ६३ ॥ तस्मात्प्रागेव रोगेभ्यो रोगेषु तरुणेषु वा । भेषजैः प्रतिकुर्वीत य इच्छेत्सुखमात्मनः ॥ ६४ ॥ बुद्धिमान् रोग के होने पर 'बहिःपरिमार्जन' अथवा 'अन्तःपरिमार्जन' या 'शस्त्र-क्रिया' से शान्ति प्राप्त करता है। परन्तु बाल, अनभिज्ञ पुरुष मोह वश अथवा प्रमाद से उत्पन्न होते हुए रोग को पहिले से उसी प्रकार नहीं जानता; जिस प्रकार मूर्ख अपने उत्पन्न होते हुए शत्रु को नहीं पहिचानता । रोग प्रथम सूक्ष्म रूप में होता है, और पीछे बढ़ जाता है। बढ़ने पर इस रोग की जड़ जम जाती है, जड़ पकड़ लेने पर रोग मूढ़ व्यक्ति की आयु और बल दोनों को हर लेता है । जब तक मनुष्य रोग से पीड़ित नहीं होता, तब तक प्रतीकार का विचार नहीं करता और जब दुःखित हो जाता है, तब रोग के निराकरण सोचा करता है। सब पुत्रों, स्त्रियों और जाति सम्बन्धियों को बुला कर कहता है कि 'मेरा सर्वस्व देकर भी किसी वैद्य को लाओ' इस प्रकार के रोगग्रस्त, दुर्बल, क्षीणेन्द्रिय, दीन, मरणासन्न व्यक्ति की कौन वैद्य रक्षा कर सकता है ? वह मूढ़ रक्षा करने वाले को न पाकर प्राण त्याग देता है, जिस प्रकार पूंछ में