भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १५५ इस लोक में और परलोक में बड़े भारी कल्याण से युक्त करते हैं, जिस प्रकार की विकृत हुई तीनों ऋतुएं ( शीत, ग्रीष्म और वर्षा ) संसार को प्रलयकाल में कष्टों से पीड़ित करते हैं । इसी प्रकार कुपित हुए वात पित्त और कफ पुरुष को बड़े भारी विपरीत बल, वर्ण, सुख से हीन तथा अल्पायु बनाते हैं ॥ १३ ॥ तदृषयः सर्व एवानुमेनिरे वचनमात्रेयस्य भवगतोऽभिननन्दु- श्चेति ॥ १४ ॥ भवति चात्र । तदात्रेयवचः श्रुत्वा सर्व एवानुमेनिरे । ऋषयोऽभिननन्दुश्च यथेन्द्रवचनं सुराः ॥ १५ ॥ भगवान् आत्रेय के कथन को सब ऋषियों ने अनुमोदन किया । जिस प्रकार कि देवता इन्द्र के वचनों को सराहते हैं, इस प्रकार ऋषियों ने आत्रेय के वचनों की प्रशंसा की ॥ १४-१५ ॥ तत्र श्लोकौ-गुणाः षड् द्विविधो हेतुर्विविधं कर्म यत्पुनः । वायोश्चतुर्विधं कर्म पृथक्च कफपित्तयोः ॥ १६ ॥ महर्षीणां मतिर्या या पुनर्वसुमतिश्च या । कलाकलीये वातस्य तत्सर्वं संप्रकाशितम् ॥ १७ ॥ इति । वायु के छः गुण, दो प्रकार के कारण कुपित और अकुपित, वायु के नाना प्रकार के कर्म; कफ और पित्त के पृथक् कर्म, महर्षियों एवं पुनर्वसु आत्रेय की संमति, ये सब इस 'वात-कलाकलीय' अध्याय में सम्पूर्ण रूप में कह दिया । इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के वातकलाकलीयो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इति निर्देशचतुष्कस्तृतीयः ॥ ३ ॥ त्रयोदशोऽध्यायः । अथातः स्नेहाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे स्नेह-अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवानात्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥