भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६६ उपशान्त मण्ड ( माड ) पीना उत्तम है । अथवा सब ( घी, तैल, वसा और मज्जा ) के पीछे गरम पानी पीना श्रेयस्कर है ॥ २०-२२ ॥ स्नेह की विचारणाएं— ओदनश्च विलेपी च रसो मांसं पयो दधि । यवागूः सूपशाकौ च यूषः काम्बलिकः खडः ॥ २३ ॥ सक्तवस्तिलपिष्टं च मद्यं लेहास्तथैव च । भक्ष्यमभ्यञ्जनं बस्तिस्तथा चोत्तरबस्तयः ॥ २४ ॥ गण्डूषः कर्णतैलं च नस्यं कर्णाक्षिपूरणम् । चतुर्विंशतिरित्येताः स्नेहस्य प्रविचारणाः ॥ २५ ॥ स्नेह की विचारणा ( उपयोग-प्रयोग विधि ) २४ चौबीस प्रकार की है । जैसे—( १ ) ओदन—चावल पांच गुणे जल में पकानां, ( २ ) विलेपी अर्थात् दरकच किये चावलों को चार गुणे जल में पकाने से बहुत मांडयुक्त यवागू बनता है ( ३ ) रस ( मांस रस ) ठीक तरह से पका मांस, ( ४ ) यवागू ( दरकच किये चावलों को छः गुणे जल में पकाने से मांड युक्त द्रव हो ) । ( ५ ) सूप—दाल को १६ या १४ या १८ गुणे जल में पका कर चतुर्थांश शेष रखें, ( ६ ) शाक, ( ७ ) यूष—अन्न को दल कर १४ या १८ गुणे जल में पकावे आधा पानी शेष रखे । काम्बलिक, खड, सत्तू, तिलपिष्ट ( तिलकुट या खल ) मदिरा, चाटन, भक्ष्य, ( मालपूआ, पूरणपोली आदि ), अभ्यंजन मालिश, बस्ति, उत्तर बस्ति, गण्डूष ( गराले ), अर्थात् मुख में तैल का रखना, कान मे तैल डालना, नस्य कर्म, नेत्र के अन्दर स्नेह प्रदान करके आंख की तृप्ति करना, यह स्नेह की चौबीस प्रकार की प्रविचारणा अर्थात् सेवन विधि है* ॥ २३-२५ ॥ अच्छपेयस्तु यः स्नेहो न तामाहुर्विचारणाम् । स्नेहस्य स भिषग्दृष्टः कल्पः प्राथमकल्पिकः ॥ २६ ॥ शुद्ध स्नेहपीने को 'विचारणा' नहीं कहते । यह तो स्नेह का सर्व प्रथम श्रेष्ठ रूप है । इसके पीछे प्रकृति, देह, दोष आदि देखकर पाचन शक्ति की विवेचना करके ओदन आदि सेवन विधि करनी चाहिये ॥ २६ ॥ रसश्चार्णहितः स्नेहः समास-व्यास-योगिभिः । षड्भिर्द्विषाष्टधा संख्यां प्राप्नोत्येकश्च केवलः ॥ २७ ॥ एवमेषा चतुःषष्टिः स्नेहानां प्रविचारणाः ।

  • प्रविचार्यतं अवचार्येतऽनुकल्पेनाप्युज्यतेऽनयेति प्रविचारणा ।