भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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२ चरकसंहिता [ अ० १ ब्रह्मणा हि यथा प्रोक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः । जग्राह निखिलेनाऽऽदावश्विनौ तु पुनस्ततः ॥ ४ ॥ अश्विभ्यां भगवान्छक्रः प्रतिपेदे ह केवलम् १ । ऋषिप्रोक्तो भरद्वाजस्तस्माच्छक्रमुपागमत् ॥ ५ ॥ आरम्भ में ब्रह्मा ने यथावत् आयुर्वेद का उपदेश किया उसको प्रजापति [दक्ष] ने पूर्ण रूप से ग्रहण किया । दक्ष से दोनों अश्विनीकुमारोंने, अश्विनी- कुमारों से इन्द्र ने ग्रहण किया । इसी कारण ऋषियों से प्रेरित होकर भरद्वाज मुनि इन्द्र के पास आये २ ॥ ४-५ ॥ विघ्नभूता यदा रोगाः प्रादुर्भूताः शरीरिणाम् । तपोपवासाध्ययनब्रह्मचर्यव्रतायुषाम् ॥ ६ ॥ तदा भूतेष्वनुक्रोशं पुरस्कृत्य महर्षयः । समेताः पुण्यकर्माणः पार्श्वे हिमवतः शुभे ॥ ७ ॥ जब तप, उपवास, ब्रह्मचर्य, अध्ययन, व्रत और आयु, इन में विघ्न करनेवाले रोग उत्पन्न हो गये; तब प्राणियों पर दया कर के पुण्यात्मा महर्षिगण पवित्र हिमालय के पार्श्व में एकत्र हुए ॥ ६-७ ॥ अङ्गिरा जमदग्निश्च वसिष्ठः कश्यपो भृगुः । आत्रेयो गौतमः सांख्यः पुलस्त्यो नारदोऽसितः ॥ ८ ॥ अगस्त्यो वामदेवश्च मार्कण्डेयाश्वलायनौ । पारीक्षिर्भिक्षुरात्रेयो भरद्वाजः कपिञ्जलः ॥ ९ ॥ पुरुष के स्वास्थ्य की रक्षा करना है। जैसा कि सुश्रुत ने कहा है:— “व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः स्वस्थस्य परिरक्षणञ्च” । अभिधेय-सम्बन्ध—हेतु, दोष और द्रव्य ये स्कन्धत्रय और रोगों के उत्पन्न न होने की विधि का बतलाना । शास्त्र और प्रयोजन का उपेय-उपाय सम्बन्ध है । भगवान् का लक्षण—“उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥” १—अश्विनीकुमारों से इन्द्र ने पढ़ा ही था, पढ़ाया नहीं था, इन्द्र को शिष्य की चाह थी, क्योंकि बिना पढ़ाये विद्या संशय रहित नहीं बनती । २. सुश्रुत में—“ब्रह्मा प्रोवाच, ततः प्रजापतिरधिजगे, तस्मादश्विनौ, अश्विभ्यामिन्द्रः ।”

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