चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
२ चरकसंहिता [ अ० १ ब्रह्मणा हि यथा प्रोक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः । जग्राह निखिलेनाऽऽदावश्विनौ तु पुनस्ततः ॥ ४ ॥ अश्विभ्यां भगवान्छक्रः प्रतिपेदे ह केवलम् १ । ऋषिप्रोक्तो भरद्वाजस्तस्माच्छक्रमुपागमत् ॥ ५ ॥ आरम्भ में ब्रह्मा ने यथावत् आयुर्वेद का उपदेश किया उसको प्रजापति [दक्ष] ने पूर्ण रूप से ग्रहण किया । दक्ष से दोनों अश्विनीकुमारोंने, अश्विनी- कुमारों से इन्द्र ने ग्रहण किया । इसी कारण ऋषियों से प्रेरित होकर भरद्वाज मुनि इन्द्र के पास आये २ ॥ ४-५ ॥ विघ्नभूता यदा रोगाः प्रादुर्भूताः शरीरिणाम् । तपोपवासाध्ययनब्रह्मचर्यव्रतायुषाम् ॥ ६ ॥ तदा भूतेष्वनुक्रोशं पुरस्कृत्य महर्षयः । समेताः पुण्यकर्माणः पार्श्वे हिमवतः शुभे ॥ ७ ॥ जब तप, उपवास, ब्रह्मचर्य, अध्ययन, व्रत और आयु, इन में विघ्न करनेवाले रोग उत्पन्न हो गये; तब प्राणियों पर दया कर के पुण्यात्मा महर्षिगण पवित्र हिमालय के पार्श्व में एकत्र हुए ॥ ६-७ ॥ अङ्गिरा जमदग्निश्च वसिष्ठः कश्यपो भृगुः । आत्रेयो गौतमः सांख्यः पुलस्त्यो नारदोऽसितः ॥ ८ ॥ अगस्त्यो वामदेवश्च मार्कण्डेयाश्वलायनौ । पारीक्षिर्भिक्षुरात्रेयो भरद्वाजः कपिञ्जलः ॥ ९ ॥ पुरुष के स्वास्थ्य की रक्षा करना है। जैसा कि सुश्रुत ने कहा है:— “व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः स्वस्थस्य परिरक्षणञ्च” । अभिधेय-सम्बन्ध—हेतु, दोष और द्रव्य ये स्कन्धत्रय और रोगों के उत्पन्न न होने की विधि का बतलाना । शास्त्र और प्रयोजन का उपेय-उपाय सम्बन्ध है । भगवान् का लक्षण—“उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥” १—अश्विनीकुमारों से इन्द्र ने पढ़ा ही था, पढ़ाया नहीं था, इन्द्र को शिष्य की चाह थी, क्योंकि बिना पढ़ाये विद्या संशय रहित नहीं बनती । २. सुश्रुत में—“ब्रह्मा प्रोवाच, ततः प्रजापतिरधिजगे, तस्मादश्विनौ, अश्विभ्यामिन्द्रः ।”
विश्वामित्राश्वत्थ्यौ च भार्गवश्च्यवनोऽभिजित्। गार्ग्यः शाण्डिल्यकौण्डिन्यौ वार्क्षिर्देवलगालवौ ॥ १० ॥ सांकृत्यो वैजवापिश्च कुशिका बादरायणः। बडिशः शरलोमा च काप्यकात्यायनावुभौ ॥ ११ ॥ काङ्कायनः कैकशेशो धौम्यो मारीचिकाश्यपौ। शर्कराक्षो हिरण्याक्षो लोकाक्षः पैङ्गिरेव च ॥ १२ ॥ शौनकः शाकुनेयश्च मैत्रेयो मैमतायनिः। वैखानसा वालखिल्यास्तथा चान्ये महर्षयः ॥ १३ ॥ ब्रह्मज्ञानस्य निधयो यमस्य नियमस्य च। तपसस्तेजसा दीप्ता हूयमाना इवाग्नयः ॥ १४ ॥ सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। अंगिरा, जमदग्नि, वसिष्ठ, कश्यप, भृगु, आत्रेय, गौतम, सांख्य, पुलस्त्य नारद, असित, अगस्त्य, वामदेव, मार्कण्डेय, आश्वलायन, पारीक्षि, भिक्षु, आत्रेय, भरद्वाज, कपिञ्जल, विश्वामित्र, आश्वत्थ्य, भार्गव, च्यवन, अभिजित्, गार्ग्य, शाण्डिल्य, कौण्डिन्य, वार्क्षि, देवल, गालव, साङ्कृत्य, वैजवापि, कुशिक, बादरायण, बडिश, शरलोमा, काप्य, कात्यायन, काङ्कायन, कैकशेश, धौम्य, मारीचि, काश्यप, शर्कराक्ष, हिरण्याक्ष, लोकाक्ष, पैङ्गि, शौनक, शाकुनेय, मैत्रेय, मैमतायनि, वैखानस, वालखिल्य और अन्य ब्रह्मज्ञान, यम, १ नियम और तप के तेज से चमकते हुए, आहुति से उज्ज्वल अग्नि के समान तेजस्वी महर्षि लोग वहां सुख से विराज कर, इस पुण्यशाली कथा को इस प्रकार कहने लगे ॥ ८-१५ ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् ॥ १५ ॥ रोगास्तस्यापहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च। प्रादुर्भूतो मनुष्याणामन्तरायो महानयम् ॥ १६ ॥ कः स्यात्तेषां शमोपाय इत्युक्त्वा ध्यानमास्थिताः। अथ ते शरणं शक्रं ददृशुर्ज्ञानचक्षुषा ॥ १७ ॥ स वक्ष्यति शमोपायं यथावदमरप्रभुः। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का मूल कारण आरोग्य १. यम—अहिंसा सत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥ यो० सू० ॥ नियम—शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥यो०सू० ॥
ही है। १ रोग इस आरोग्य, अभ्युदय तथा जीवन (आयु) को नाश करने वाले हैं। मनुष्यों के लिए ये रोग बड़े विघ्नरूप हो गये हैं। इसलिए इन रोगों की शान्ति का उपाय क्या होना चाहिए ? ऐसा कहकर वे सब ऋषि ध्यान मग्न हो गये। उन्होंने अन्तश्चक्षु से इन्द्र को अपनेको शरण देने वाले के रूप से देखा और जान लिया कि देवों का राजा इन्द्र ही शान्ति का उपाय कहेगा ॥१६-१७॥ कः सहस्राक्षभवनं गच्छेत्प्रष्टुं शचीपतिम् ॥ १८ ॥ अहमर्थे नियुज्येयमत्रेति प्रथमं वचः । भरद्वाजोऽब्रवीत्तस्मादृषिभिः स नियोजितः ॥ १६ ॥ प्रश्न उपस्थित हुआ कि शचीपति इन्द्र से पूछने के लिये इन्द्र के भवन तक कौन जाय ? ऋषि भरद्वाज ने सबसे प्रथम कहा कि—इस कार्य में मुझको नियुक्त किया जाये। इसलिए आंगरा आदि ऋषियों ने भरद्वाज ऋषि को ही इस कार्य में नियुक्त कर दिया ॥ १८-१६ ॥ स शक्रभवनं गत्वा सुरर्षिगणमध्यगम् । ददर्श बलहन्तारं दीप्यमानमिवानलम् ॥ २० ॥ इन्द्र के भवन में जाकर, उन्होंने देवर्षियों के मध्य में प्रदीप्त अग्नि के समान तेजस्वी, बल नाम असुर को मारने वाले इन्द्र को देखा ॥ २० ॥ सोऽभिगम्य जयाशीर्भिरभिनन्द्य सुरेश्वरम् । प्रोवाच भगवान्धीमानृषीणां वाक्यमुत्तमम् ॥ २१ ॥ बुद्धिमान भरद्वाज ने इन्द्र के सम्मुख जाकर जयसूचक आशीर्वादों से इन्द्र का अभिनन्दन करके, ऋषियों का उत्तम वचन प्रस्तुत किया ॥ २१ ॥ व्याधयो हि समुत्पन्नाः सर्वप्राणिभयंकराः । तद् ब्रूहि मे शमोपायं यथावदमरप्रभो ॥ २२ ॥ हे अमरप्रभो ! सब प्राणियों को भय देने वाली व्याधियां उत्पन्न हो गई हैं इसलिये आप इनकी शान्ति का उपाय उपदेश करें ॥ २२ ॥ तस्मै प्रोवाच भगवान्नायुर्वेदं शतक्रतुः । पदैरल्पैर्मतिं बुद्ध्वा विपुलां परमर्षये ॥ २३ ॥ १ कहा भी है— "आयतनं विद्यानां मूलं धर्मार्थकाममोक्षाणाम् । श्रेयः परं किमन्यत् शरीरमजरामरं विधायैकम् ॥” रसहृदयतंत्र ॥ २ योग्य शिष्य ही विनयपूर्वक गुरु से शास्त्रों को सुनने का अधिकारी है। यथा:—तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ गीता ॥
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ५
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ५ भगवान् इन्द्रने महर्षि भरद्वाज को महामति जान कर थोड़े ही शब्दों में संक्षेप से आयुर्वेद का उपदेश किया ॥ २३ ॥ हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम् । त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः ॥ २४ ॥ सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामतिः । यथावदचिरात् सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ॥ २५ ॥ तेनाऽऽयुरमितं लेभे भरद्वाजः सुखान्वितम् । ऋषिभ्योऽनधिकं तच्च शशंसानवशेषयन् ॥२६॥ ऋषयश्च भरद्वाजाज्जगृहुस्तं प्रजाहितम् । दीर्घमायुश्चिकीर्षन्तो वेदं वर्धनमायुषः ॥ २७ ॥ हेतु ( रोगों का कारण ), लिंग ( रोगों के चिन्ह ), औषध, (संशोधन और संशमन रूप चिकित्सा ), स्वस्थ एवं रोगी दोनों के लिए परम गति और जिस का पितामह ( ब्रह्मा ) ने प्रथम ज्ञान किया था, उस तीन सूत्र १ वाले पुण्य, श्रेष्ठ और नित्य, सनातन २ आयुर्वेद का इन्द्र ने उपदेश किया । महामति भर- द्वाज मुनि ने एकाग्रचित्त होकर इस अनन्त और अपार ३ और तीन स्कन्धों वाले आयुर्वेद को यथावत् शीघ्र ही सम्पूर्ण जान लिया । भरद्वाज मुनि ने इस १ त्रिःसूत्र—हेतु, दोष और द्रव्य संग्रह रूप: हेतुसंग्रह—कालबुद्धीन्द्रियार्थानां योगो मिथ्या न चाति च । द्वयाश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधो हेतुसंग्रहः ॥ दोषसंग्रह—वातः पित्तं कफश्चोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः । मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ॥ द्रव्यसंग्रह—किंचिद्दोषप्रशमनं किंचिद् धातु-प्रदूषणम् । स्वस्थवृत्तौ मतं किंचित् त्रिविधं द्रव्यमुच्यते ॥ अथवा 'त्रिसूत्र' शब्द से वात, पित्त और कफ का ग्रहण करना चाहिये । क्योंकि सम्पूर्ण आयुर्वेद शास्त्र इन्हीं में ओत-प्रोत है । जैसा कि सुश्रुत में— “वातपित्तश्लेष्माण एव देहसंभवहेतवः । तैरेवाव्यापन्नैरधो मध्योर्ध्वसंनिविष्टैः शरीरारमदं धार्यत-आगारमिव स्थूणाभिः । अतः त्रिस्थूणाभिरित्येके ।” २—सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादित्वात् । चरक ॥ ३- नास्ति आयुर्वेदस्य पारम्, तस्मादप्रमत्तः शश्वदभियोगमस्मिन् गच्छेत् । ॥ चरक ॥
६ चरकसंहिता [ अ० १ आयुर्वेद के द्वारा ही सुख से युक्त दीर्घ आयु प्राप्त की। और उसने ऋषियों को न अधिक और न कुछ कम, ज्यों का त्यों ही सम्पूर्ण शास्त्र का उपदेश किया। दीर्घ आयु करने की इच्छा वाले ऋषियों ने भी लोक की हितकामना से इस आयुर्वधक आयुर्वेद को भरद्वाज से ग्रहण किया ॥ २४-२७ ॥ महर्षयस्ते ददृशुर्यथावज्ज्ञानचक्षुषा। सामान्यं च विशेषं च गुणान् द्रव्याणि कर्म च ॥ २८ ॥ समवायं च, तज्ज्ञात्वा तन्त्रोक्तं विधिमास्थिताः। लेभिरे परमं शर्म जीवितं चाप्यनश्वरम् ॥ २६ ॥ ज्ञान की चक्षु से ऋषियों ने सामान्य, विशेष, गुण, द्रव्य, कर्म, समवाय का यथावत् पूर्णरूप से दर्शन किया। इन को यथावत् जानकर आयुवद विधि से हितकारक पदार्थों का सेवन और अहितकारी पदार्थों का त्याग कर परम सुख, आरोग्य और दीर्घ जीवन प्राप्त किया १ ॥ २८-२६ ॥ अथ मैत्रीपरः पुण्यमायुर्वेदं पुनर्वसुः। शिष्येभ्यो दत्तवान् षड्भ्यः सर्वभूतानुकम्पया ॥ ३० ॥ अग्निवेशश्च भेडश्च जतूकर्णः पराशरः। हारीतः क्षारपाणिश्च जगृहुस्तन्मुनेर्वचः ॥ ३१ ॥ तत्पश्चात् सब प्राणियों में मैत्री बुद्धि रखने वाले पुनर्वसु आत्रेय ने सब प्राणियों पर दया का अनुभव करके इस पवित्र आयुर्वेद का छः शिष्यो को उपदेश किया। अग्निवेश, भेड, जतूकर्ण, पराशर, हारीत और क्षारपाणि इन छः शिष्यों ने मुनि के उस उपदेशवचन को ग्रहण किया ॥। ३०-३१ ॥ बुद्धेर्विशेषस्तत्रासीन्नोपदेशान्तरं मुनेः। तन्त्रस्य कर्ता प्रथममग्निवेशो यतोऽभवत् ॥ ३२ ॥ अथ भेडादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं कृतानि च। श्रावयामासुरात्रेयं सर्षिसंघं सुमेधसः ॥ ३३ ॥ श्रुत्वा सूत्रणमर्थानाम्मृषयः पुण्यकर्मणाम्। यथावत्सूत्रितमिति प्रहृष्टास्तेऽनुमेनिरे ॥ ३४ ॥ सर्व एवास्तुवंस्तांश्च सर्वभूतहितैषिणः। साधु भूतेष्वनुक्रोश इत्युच्चैरब्रुवन् समम् ॥ ३५ ॥ तं पुण्यं शुश्रुवुः शब्दं दिवि देवर्षयः स्थिताः। सामराः परमर्षीणां श्रुत्वा मुमुदिरे परम् ॥ ३६ ॥ १—धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम् । वैशेषिक०
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ७
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ७ अहो साध्विति घोषश्च लोकाँस्त्रीनन्वनादयत् । नभसि स्निग्धगम्भीरो हर्षाद् भूतैरुदीरितः ॥ ३७ ॥ शिवो वायुर्ववौ सर्वा भाभिरुन्मीलिता दिशः । निपेतुः सजलाश्चैव दिव्याः कुसुमवृष्टयः ॥ ३८ ॥ अथाग्निवेशप्रमुखान् विविशुर्ज्ञानदेवताः । बुद्धिः सिद्धिः स्मृतिर्मेधा धृतिः कीर्तिः क्षमा दया ॥ ३९ ॥ तानि चानुमतान्येषां तन्त्राणि परमर्षिभिः । भवाय भूतसंघानां प्रतिष्ठां भुवि लेभिरे ॥ ४० ॥ अग्निवेश की बुद्धि विशेष थी, मुनि आत्रेय के उपदेशमें कोई अन्तर नहीं था । अग्निवेश ही सब से प्रथम आयुर्वेद-तंत्र का कर्त्ता हुआ । इसके पीछे भेड आदि बुद्धिमान् शिष्यों ने भी अपने अपने तंत्र बना कर बहुत से ऋषियों के साथ विराजमान आत्रेय मुनि को सुनाये । पुण्यकर्मा अग्निवेश आदि ऋषियों द्वारा भली प्रकार से सूत्र रूप से गुंथे हुए आयुर्वेद शास्त्र को सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका प्रसन्नता से अनुमोदन भी किया कि ठीक प्रकार से ग्रथित ( गुंथा ) हुआ है । सब प्राणियों पर दयालु उन ऋषियों की सब ने ही प्रशंसा की । सब ने एक साथ उच्चस्वर से कहा कि आपने प्राणियों पर बहुत उत्तम रूप से दया की है । स्वर्ग में स्थित देवों के सहित नारद आदि देव-ऋषियों ने भी उन परम ऋषियों के पुण्य शब्द को सुना । इस को सुनकर वे भी बहुत प्रसन्न हुए । समस्त प्राणियों ने हर्ष से अति स्नेह युक्त एवं गम्भीर शब्द से साधुवाद दिया । इस साधुवाद की ध्वनि आकाश में फैल कर तीनों लोकों को गुंजा दिया । सुखदायक वायु बहने लगा, सब दिशायें प्रकाश से चमकने लगीं, जल से भी दिव्य कुसुम बरसने लगे । ( बुद्धि ) उपलब्धि, ( सिद्धि ) साध्य-साधन, ( स्मृति ) पूर्व अनुभूत अर्थ का स्मरण, ( मेधा ) धारण करने की शक्ति, ( धृति ) मन की संतुष्टि, ( कीर्ति ) यश, ( क्षमा ) अपकारी के प्रति अनपकार की इच्छा, ( दया ) प्राणियों के दुःख हटाने की इच्छा, ये ज्ञानमय देवता अग्निवेश आदि ऋषियों में प्रविष्ट हुए अर्थात् ये शुभ गुण इन में आये । महर्षियों द्वारा अनुमोदित उक्त ऋषियों के शास्त्र लोगों के परम कल्याण के लिये पृथिवी पर प्रतिष्ठा को प्राप्त हुए ॥ ३२-४० ॥ आयुर्वेद का लक्षण— हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम् । मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते ॥ ४१ ॥
८ चरकसंहिता [ अ० १ हित, अहित, सुख और दुःख यह चार प्रकार की 'आयु' है। इस आयु का हित-अहित, पथ्यापथ्य, और इस आयु का मान-परिमाण यह सब जिस शास्त्र में कहा हो, तथा आयु का लक्षण जिसमें हो, उसे 'आयुर्वेद'१ कहते हैं। हित आयु, अहित आयु, सुखी आयु, दुःखी आयु, चार प्रकारकी आयु है ॥४१॥ आयु का लक्षण— शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो, धारि जीवितम् । नित्यगश्चानुबन्धश्च पर्यायैरायुरुच्यते ॥ ४२ ॥ (शरीर) पंच महाभूतों से बना, आत्मा का अधिष्ठान, (इन्द्रिय) भौतिक इन्द्रियां, (सत्त्व) मन, (आत्मा) द्रष्टा, भोक्ता, जीव और ईश्वर, इनके संयोग का नाम 'आयु' है। आयु निरन्तर चलने वाला होने से 'आयु' कहाता है [ एति गच्छतोति आयुः । ] आयु अर्थात् जीवन के पर्यायवाची शब्द—(धारि) शरीर को धारण करता है, (जीवित) प्राणों को धारण करता है, (नित्यग) निरन्तर चलता है, (अनुबन्ध) प्राणों के साथ सम्बन्धित है, और 'चेतनानुवृत्ति' इन पर्यायों से बतलाया जाता है२ ॥ ४२ ॥ तस्याऽऽयुषः पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः । वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम् ॥ ४३ ॥ यह आयुर्वेद सब से अधिक श्रेष्ठ पुण्यजनक है [ क्योंकि अन्य ज्ञान पार- लौकिक हित को ही बतलाते हैं ] यह आयुर्वेद इहलोक और परलोक दोनों के हितों को कहता है, ऐसा ज्ञानियों का मत है३ ॥ ४३ ॥ सामान्य और विशेष— सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् । ह्रासहेतुर्विशेषश्च प्रवृत्तिरुभयस्य तु ॥ ४४ ॥ सामान्यमेकत्वकरं विशेषस्तु पृथक्त्वकृत् । तुल्यार्थता हि सामान्यं विशेषस्तु विपर्ययः ॥ ४५ ॥ सब पदार्थों का सब कालों में 'सामान्य'—समान [ गुण आदि ] धर्म ही वृद्धिका कारण होता है, और 'विशेष'—अर्थात् विभेद या विपरीत होना ही ह्रास का कारण होता है। दोनों का शरीर के साथ सम्बन्ध सब पदार्थों की १—“आयुरस्मिन्विन्दति वेत्ति वा आयुर्वेदः ।” सुश्रुत ॥ २—तत्रायुश्चेतनानुवृत्तिः जीवितमनुबन्धो धारि चेत्येकार्थः ॥ सु० ॥ ३—अत्राऽऽयत्तमैहिकमामुष्मिकं च श्रेयः ॥ सुश्रुत० ॥
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ६
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ६ वृद्धि और ह्रास का कारण है। सब कालों में शरीर के अन्दर दोनों ही धर्म रह सकते हैं। इसलिये शरीरमें वृद्धि और क्षय शरीरका बनना (Metabolism) और शरीर का टूटना ( Ketabolism ) दोनों क्रियायें हर समय होती रहती हैं। एकत्व बतलाने वाला धर्म 'सामान्य' है। और 'पृथग्-भाव' बतलाने वाला धर्म 'विशेष' है।¹ क्योंकि समान धर्म का होना यह सामान्य है, और इससे विपरीत होना विशेष है ॥ ४४-४५ ॥ सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत्त्रिदण्डवत् । लोकस्तिष्ठति संयोगात्तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ४६ ॥ स पुमांश्चेतनं तच्च तच्चाधिकरणं स्मृतम् । वेदस्यास्य तदर्थं हि वेदोऽयं संप्रकाशितः ॥ ४७ ॥ (सत्त्व) मन, (आत्मा) चेतना और 'शरीर' इन तीनों से बने हुए को "लोक"² कहते हैं। यह तीनों मिलकर तिकन्टी, या तिपाई की तरह 'लोक' को धारण किये हुए हैं। इस संयोग से बने हुए पुरुष में जन्म-मरण आदि १ समान गुण वाले—इसका अर्थ यह है कि द्रव्य, गुण, कर्म, इनमें सम्पूर्ण रूप मे समान गुण वाले पदार्थ ही ग्रहण करने चाहिये। जिस प्रकार खट्टा आंवला भी खट्टे पित्त को नहीं बढ़ाता, अपितु शीतवीर्य होने से पित्त का शमन करता है, क्योंकि पित्त उष्ण है। द्रव्यसमान से विपरीत प्रभाव—तैजस क्षार से श्लेष्मा का क्षय गुण ” ” ” ”—द्रव कांजी से श्लेष्मा का लघु-रूक्ष गुण के कारण क्षय, कर्म ” ” ” ”—नींद से वायु का नाश, भागने से कफ का क्षय होना, सामान्य और विशेष का स्वरूप—तुल्यार्थता अर्थात् समानार्थक होने का नाम सामान्य और विपर्यय का अर्थ 'विशेष' है। "सामान्यं विशेष इति बुद्धयपेक्षम्" । वैशेषिक द० ॥ कहा भी है— सर्वेषां सर्वदा वृद्धिः तुल्यद्रव्यगुणक्रियैः। भावैर्भवति भावानां विपरीतेर्विपर्ययः ॥ २. "षड्धातुसमुदिता लोक इति शब्दं लभन्ते ।" तिकन्टी—में एक बल्ली या स्तम्भ के निकाल लेने से वह खड़ी नहीं रह सकती, इसी प्रकार इन तीनोंमें से एकके न होनेसे 'पुरुष' स्थिर नहीं रह सकता।
१० चरकसंहिता [ अ० १ सब स्थित हैं । यह सत्त्वादि समुदाय पुरुष कहलाता है, और वह चेतन द्रव्य है, यही आयुर्वेद का अधिकरण है और इसी के लिये यह आयुर्वेद प्रकाशित किया गया है ॥ ४६-४७ ॥ खादीन्यात्मा मनः कालो दिशश्च द्रव्यसंग्रहः । सेन्द्रियं चेतनं द्रव्यं निरिन्द्रियमचेतनम् ॥ ४८ ॥ आकाश आदि (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी—ये पांच महाभूत), आत्मा, मन, काल, और दिशा ये द्रव्यों का संग्रह है । इन्द्रियों सहित द्रव्य चेतन हैं और इन्द्रियों से रहित द्रव्य अचेतन हैं १ ॥ ४८ ॥ अत्र कर्म्मफलं चात्र ज्ञानं चात्र प्रतिष्ठितम् । अत्र मोदः सुखं दुःखं जीवितं मरणं स्वता ॥ पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः 'पुरुष' उच्यते । तस्मिन् क्रियाः । सोऽधिष्ठानम् । १. “पृथ्व्यापस्तेजोवायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि।” वैशे० शरीरं हि गते तस्मिन् शून्यागारमचेतनम् । पञ्चभूतावशेषत्वात् पञ्चत्वं गतमुच्यते ॥ चरक ॥ “तत्र आकाशं शब्दगुणम्, शब्दस्पर्शगुणो वायुः शब्दस्पर्शरूपगुणोऽग्निः । शब्दस्पर्शरूपरसगुणा आपः, शब्दस्पर्शरूपरसगन्धगुणा पृथिवी । तेषामेकगुणः पूर्वे, गुणवृद्धिः परे परे । पूर्वपूर्वो गुणश्चैव क्रमश्रो गुणिषु स्मृतः ॥ आत्मा का रूप— प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः । इन्द्रियान्तरसंचारः प्रेरणं धारणं च यत् । देशान्तरगतिः स्वप्ने पञ्चत्वग्रहणं तथा । दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमस्तथा ॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः । बुद्धिः स्मृतिरहंकारो लिङ्गानि परमात्मनः ॥ मन का लक्षण— आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य भावोऽभावो मनसो लिङ्गमिति कणादः लक्षणं मनसो ज्ञानस्याभावो भाव एव च । सति ह्यात्मेन्द्रियार्थानां सन्निकर्षेण वर्त्तते । वैधुत्यान्मनसो ज्ञानं सान्निध्याच्च वर्त्तते ॥ चरक ॥
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ११
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ११ गुण— सार्था गुर्वादयो बुद्धिः प्रयत्नान्ताः परादयः । गुणाः प्रोक्ताः, अर्थ ( इन्द्रिय और मन के ग्राह्य विषय ), गुरु आदि, बुद्धि, इच्छा से लेकर प्रयत्न तक और पर आदि अभ्यास पर्यन्त गुण हैं । इन्द्रियों के अर्थ—शब्द, स्पर्श, रूप,रस और गन्ध—मन के अर्थ चिन्तन, विचार, दुहना, ध्यान, संकल्प, गुरुत्व, लघुत्व, शीत, उष्ण, स्निग्ध रूक्ष, मन्द, तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु, कठिन, विशद, पिच्छिल, श्लक्ष्ण, खर, स्थूल, सूक्ष्म, सान्द्र, द्रव, ये बीस, तथा इच्छा, द्वेष, सुख दुःख और प्रयत्न, पर, अपर युक्ति, संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परिणाम, संस्कार और अभ्यास ये गुण हैं । “रूपरसगन्धस्पर्शाः संख्यापरिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परपरत्वे बुद्धयः सुखदुखे इच्छा द्वेषौ प्रयत्नाश्च गुणाः ॥” वै० द० कर्म— प्रयत्नादि कर्म चेष्टितमुच्यते ॥ ४९ ॥ प्रयत्न जन्य चेष्टा शरीर का व्यापार कर्म कहाता है । उत्क्षेपणमपक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति कर्माणि ॥ वैशे० भ्रमणं रेचनं स्पन्दनोर्ध्वज्वलनमेव च । तिर्यग् गमनमप्यत्र गमनादेव लभ्यते ॥ प्रयत्नपूर्वक अर्थात् चेष्टापूर्वक क्रिया का नाम 'कर्म' है । “आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्यां हस्ते कर्म” ॥ वै० ॥ ४६ ॥ समवाय का लक्षण— समवायोऽपृथग्भावो भूम्यादीनां गुणैर्मतः । स नित्यो,यत्र हि द्रव्यं न तत्रानियतो गुणः ॥ ५० ॥ पृथिवी आदि द्रव्यों का ( आत्रेय भद्रकाप्यीय २६ वें अध्याय में कहे हुए ) काल का लक्षण—सूक्ष्मामपि कलां न लीयते, संकलयति वा भूतानि इति कालः । वैशे० दिशा का लक्षण—अस्मादिदं पूर्वेण अस्मादिदं पश्चिमेन इत्यादयः प्रत्यया यतो भवन्ति सा दिक् । इत इदमिति यतस्तद्दिशां लिङ्गम् । वैशे० जिससे यह व्यवहार किया जाय कि यह इससे पूर्व या पश्चिम में है, उसका नाम 'दिशा' है ।
१२ चरकसंहिता [ अ० १ अपने गुणों से पृथक् न होना 'समवाय' १ है । अर्थात् द्रव्य गुणों के बिना नहीं रह सकते और गुण बिना द्रव्य के नहीं रह सकते । यह समवाय सम्बन्ध नित्य है, (संयोग की तरह अनित्य नहीं) क्योंकि जहां पर द्रव्य है, वहां पर गुण नहीं रहता ऐसा नहीं, अपितु निश्चित ही है। जहां द्रव्य है वहां गुण भी है। इस लिये द्रव्य और गुण का नियत सम्बन्ध होने से इनका सम्बन्ध भी नियत ही है ॥ ५० ॥ द्रव्य का लक्षण— यत्राऽऽश्रिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत् । तद् द्रव्यं, जिसमें कर्म और गुण आश्रित हैं, और जो समवायि कारण है, वह 'द्रव्य' है। गुण का लक्षण:— समवायी तु निश्चेष्टः कारणं गुणः ॥ ५१ ॥ द्रव्य के साथ समवाय सम्बन्ध वाला, निश्चेष्ट (निष्क्रिय) एवं कारणवान् गुण है। गुण-निर्गुण होते हैं, गुण में गुण नहीं होता, जैसा कि लिखा है— “गुणा गुणाश्रया नोक्ताः” ॥ ५१ ॥ कर्म्म का लक्षण - संयोगे च वियोगे च कारणं द्रव्यमाश्रितम् । कर्त्तव्यस्य क्रिया कर्म कर्म नान्यदपेक्षते ॥ ५२ ॥ जो कि द्रव्य का आश्रय लेकर रहता है, तथा संयोग और विभाग में कारण है, उसका नाम 'कर्म' है । कर्म किसी अन्य कर्म की अपेक्षा नहीं करता [द्रव्य और गुण परस्पर एक दूसरे के समवाय की अपेक्षा करके कारण बनते हैं] तथा—कर्त्तव्य कार्य का अनुष्ठान रूप कर्म है। “एकं द्रव्यमगुणं संयोगविभागेष्वनपेक्षं कारणमिति कर्म्मलक्षणम्” वैशे० किये हुवे सद्वृत्त, शान्ति, मंगल—पाठ आदि अनुष्ठान भी कर्म्म हैं, ये अध्यात्म कर्म हैं ॥ ५२ ॥ इत्युक्तं कारणं, कार्यं धातुसाम्यमिहोच्यते । धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम् ॥ ५३ ॥ १ समवाय का लक्षण - अयुतसिद्धानां [जो कभी भी पृथक् नहीं होते] आधाराधारभूतानां इहेति प्रत्ययहेतुः सम्बन्धः स समवायः । वैशे० जैसे तन्तु और वस्त्र का या मिट्टी और घड़े का समवाय सम्बन्ध है ।
अ० १ ] सूत्रस्थानम् १३
अ० १ ] सूत्रस्थानम् १३ इस प्रकार सामान्य आदि छः कारणों का वर्णन किया गया है। अब उनका कार्य कहा जाता है। इस शास्त्र में 'धातुओं का साम्य करना' ही कार्य्य है [ घट-पट आदि कार्य नहीं है ]। इस शास्त्र का—प्रयोजन भी धातुओं को समान रखना ही है। क्षीण हुए धातु बढ़ाने चाहिये, बढ़े हुए घटाने चाहिये और समान का रक्षण करना चाहिये। जैसा कि आगे कहेंगे— 'प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं, आतुरस्य विकारप्रशमनञ्च' ॥५३॥ धातुओं के विषम होने का कारण - कालबुद्धीन्द्रियार्थानां योगो मिथ्या न चाति च । द्वयाश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधो हेतुसंग्रहः ॥ ५४ ॥ काल [ शीत-वर्षा ग्रीष्म रूपी संवत्सर अथवा परिणाम ], बुद्धि, और इन्द्रि- यार्थ [ इन्द्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ] इन तीन के अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग होने से दोनों प्रकार की शारीरिक और मान- सिक व्याधियां उत्पन्न होती हैं ॥ ५४ ॥ शरीरं सत्त्वसंज्ञं च व्याधीनामाश्रयो मतः । तथा सुखानां योगस्तु सुखानां कारणं समः ॥ ५५ ॥ शरीर और सत्त्व ( मन ) ये दोनों ही [ पृथक् रूप से एवं सम्मिलित रूप में ] रोगों की अधिष्ठान भूमि हैं । और जिस प्रकार ये दोनों व्याधियों का आश्रय स्थान हैं, इसी प्रकार सुख का भी आश्रय स्थान यही हैं। सुख का कारण - काल, बुद्धि और इन्द्रियों के विषयों का, सम [ उचित रूप में ] योग होना ही आरोग्य का कारण है। कहा भी है— “सुखहेतुर्मतस्त्वेकः समयोगः सुदुर्लभः” ॥ ५५ ॥ आत्मा का स्वरूप कहते हैं— निर्विकारः परस्त्वात्मा सत्त्वभूतगुणेन्द्रियैः । चैतन्ये कारणं नित्यो द्रष्टा पश्यति हि क्रियाः ॥ ५६ ॥ १. “त्रीण्यायतनानीत्यर्थानां, कर्मणः कालस्य चातियोगायोगमिथ्यायोगाः । असात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः प्रज्ञापराधः परिणामश्चेति त्रयस्त्रिविधविकल्पा हेतवो विकारकारणम्” ॥ “समयोगयुक्तास्तु प्रकृतिहेतवो भवन्ति” । च० ॥ २. वेदनानामधिष्ठानं मनो देहश्च सेन्द्रियः । केशलोमनखाग्रान्तमलद्रवगुणैर्विना ॥ चरक ॥
१४ चरकसंहिता [ अ० १ निर्विकार१ और सूक्ष्म आत्मा, मन, शब्दादिगुण, इन्द्रियों द्वारा चैतन्य में कारण हैं, वह नित्य है, साक्षी है, क्योंकि वह सब क्रियाओं को देखता है । अचेतन शरीर और मनके चैतन्य में यह आत्मा ही कारण है; और वह नित्य है ! रोग प्रकृति— वायुः पित्तं कफश्चोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः । मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ॥ ५७ ॥ संक्षेप रूप में शारीरिक दोषों के कारण वात, पित्त और कफ हैं । और मानसिक दोषों के कारण रज और तम हैं२ । शारीरिक कोई भी रोग इन वात, पित्त, कफ के बिना नहीं हो सकता ॥ ५७ ॥ इनका प्रतीकार — प्रशाम्यत्यौषधैः पूर्वो दैवयुक्तिव्यपाश्रयैः । मानसो ज्ञानविज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः ॥ ५८॥ शारीरिक दोष दैव व्यपाश्रय और युक्ति-व्यपाश्रय औषधियों से शान्त हो जाते हैं । मानसिक दोष ज्ञान ( आत्मा आदि के ), विज्ञान अर्थात् शास्त्र ज्ञान, (धैर्य) चित्त की स्थिरता, (स्मृति) अनुभूत पदार्थ का स्मरण, (समाधि) विषयों से मन को हटा कर आत्मा में लगाना इनसे शान्त हो जाते हैं । दैव-व्यपाश्रय—मणि, मन्त्र, ओषधि, बलि, उपहार, होम, नियम प्रायश्चित्त आदि कर्म जो कि दैव को आश्रय कर किये जाते हैं । युक्ति-व्यपाश्रय अर्थात् योजना, युक्ति को आश्रय कर किये गये संशो- धन, संशमन आदि कर्म ॥ ५८ ॥ वायु का लक्षण— रूक्षः शीतो लघुः सूक्ष्मश्चलोऽथ विशदः खरः । विपरीतगुणैर्द्रव्यैर्मारुतः संप्रशाम्यति ॥ ५६ ॥ वायु-रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल अर्थात् गतिशील, विशद अर्थात् अवि- १. स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ॥ श्रुतिः । २ वायु को प्रथम लिखा है, क्योकि वात जन्य रोग ही सब से अधिक हैं, 'अशीतिर्वात-विकाराः' एवं 'वायुरेव भगवान्' वायु सबसे प्रबल है । सर्वेषाञ्च व्याधीनां वातपित्तश्लेष्माण एव मूलं तल्लिङ्गत्वत् दृष्टफलवादा- गमाच्च । यथा हि कृत्स्नं विकारजातं विश्वरूपेणावस्थितं सत्त्वरजस्तमांसि न व्यतिरिच्यते । एवमेव कृत्स्नं विकारजातं विश्वरूपेणावस्थितमव्यतिरिच्य वात- पित्तश्लेष्माणो वर्तन्ते ॥ सुश्रुत० ॥
अ० १ सूत्रस्थानम् १५
अ० १ सूत्रस्थानम् १५ च्छिल और खर (कठोर) है । वह इन से विपरीत गुण वाले स्निग्ध, उष्ण गुरु, स्थूल, स्थिर, पिच्छिल और मृदु द्रव्यों से शान्त होता है । शीत से वायु बढ़ता है और उष्णता से कम होता है, इसलिये वायु को वैद्यक शास्त्र में शीत-प्रकृति माना है । वैशेषिक दर्शन में इस को अनुष्णाशीत कहा है—'अनुष्णाशीतः स्पर्शस्तु पवने मतः' ॥ वै० ॥ ५६ ॥ पित्त का लक्षण— सस्नेहमुष्णं तीक्ष्णं च द्रवमम्लं सरं कटु । विपरीतगुणैः पित्तं द्रव्यैराशु प्रशाम्यति ॥ ६० ॥ स्नेहसहित अर्थात् थोड़ा स्निग्ध, उष्ण (गरम), तीक्ष्ण [ शीघ्र कार्य करने वाला, सूई की तरह तेज ], द्रव, अम्ल ( खट्टा ), सर ( गमनशील ), और कटु रस है । पित्त विपरीत गुण वाले द्रव्यों से शीघ्र ही शान्त हो जाता है ॥६०॥ कफ का लक्षण— गुरुशीतमृदुस्निग्धमधुरस्थिरपिच्छिलाः । श्लेष्मणः प्रशमं यान्ति विपरीतगुणैर्गुणाः ॥ ६१ ॥ गुरु, शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर, और पिच्छिल ये कफ के गुण हैं । इन से विपरीत गुण वाले पदार्थों से ये गुण शान्त होते हैं । [ इन गुणों के शान्त होने से गुणी कफ भी शान्त हो जाता है ] ॥ ६१ ॥ साध्य रोगों की शान्ति— विपरीतगुणैर्देशमात्राकालोपपादितैः । भेषजैर्विनिवर्त्तन्ते विकाराः साध्यसंमताः ॥ ६२ ॥ साधनं न त्वसाध्यानां व्याधीनामुपदिश्यते । भूयश्चातो यथाद्रव्यं गुणकर्म प्रवक्ष्यते ॥ ६३ ॥ विपरीत गुण वाले [ हेतु-विपरीत, व्याधि-विपरीत और हेतु और व्याधि दोनों के विपरीत और कार्य करनेवाले ] द्रव्यों की देश-मात्रा, काल के अनुसार योजना करने पर औषध से साध्य व्याधियां शान्त हो जाती हैं, असाध्य रोग अच्छे नहीं होते । और जो रोग औषधियों से असाध्य हैं उन के लिए औषध का उपदेश भी नहीं किया जाता । इसके आगे फिर विस्तार से एक-एक द्रव्य के गुण कर्म को आचार्य कहेंगे ॥ ६२-६३ ॥ रसों की उत्पत्ति— रसनार्थो रसस्तस्य द्रव्यमापः क्षितिस्तथा । निर्वृत्तौ च, विशेषे च प्रत्ययाः खादयस्त्रयः ॥ ६४ ॥
[header] १८ चरकसंहिता [ अ० १ [/header]
रसनेन्द्रिय से ग्राह्य गुण रस है। इस रस की उत्पत्ति में आधार कारण जल और पृथिवी हैं। इस रस के भेद करने में आकाश, वायु और अग्नि ये तीनों निमित्त कारण होते हैं। वास्तव में रस की उत्पत्ति स्थान जल है और पृथिवी इसका आधार है। क्योंकि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य से मिल जाता है। "विष्टं ह्यपरं परेण" न्याय०। जल और पृथ्वा म आकाश, वायु और अग्नि का भी अंश समाविष्ट रहता है। कहा भी है— तेषामेकगुणं पूर्वं गुणवृद्धिः परे परे। पूर्वः पूर्वो गुणश्चैव क्रमशो गुणिषु स्मृतः ॥ इसीलिए, इस एक रस के छः भेद हो जाते हैं। जैसे—पृथिवी और जल की अधिकता से मधुर, पृथिवी और अग्नि की अधिकता से अम्ल, जल और अग्नि की अधिकता से लवण, वायु और अग्नि की अधिकता से कटु, वायु और आकाश की अधिकता से तिक्त और वायु और पृथिवी की अधिकता से कषाय रस बनता है ॥ ६४ ॥ स्वादुरम्लोऽथ लवणः कटुकस्तिक्त एव च । कषायश्चेति षट्कोऽयं रसानां संग्रहः स्मृतः ॥ ६५ ॥ स्वादु मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय ये छः संक्षेप से रस हैं। विस्तार से इनके परस्पर संयोग से ६३ भेद हो जाते हैं ॥ ६५ ॥ रसों के द्वारा दोषों की शान्ति-- स्वाद्वम्ललवणा वायुं, कषायस्वादुतिक्तकाः । जयन्ति पित्तं, श्लेष्माणं कषायकटुतिक्तकाः ॥ ६६ ॥ स्वादु, अम्ल और लवण ये रस वायु का शमन करते हैं, कषाय, मधुर और तिक्त रस पित्त को, कषाय, कटु और तिक्त रस कफ को शान्त करते हैं। कटु, अम्ल और लवण रस पित्त को कुपित अर्थात् उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं, स्वादु, मधुर अम्ल और लवण रस कफ को, कटु, तिक्त और कषाय रस वायु को बढ़ाते हैं। इन रसों में प्रत्येक रस के द्रव्य, गुण और कर्म आगे (आत्रेय भद्रकाप्यीय नामक २६ वें अध्याय) में विस्तार से कहेंगे ॥ ६६ ॥ द्रव्य के भेद— किञ्चिद्दोषप्रशमनं किञ्चिद्धातुप्रदूषणम् । स्वस्थवृत्तौ हिते किञ्चित् त्रिविधं द्रव्यमुच्यते ॥ ६७ ॥ द्रव्य तीन प्रकार के हैं। (१) कुछ द्रव्य वात आदि दोषों का शोधन एवं शमन करते हैं। जैसे—तेल वायु का, घी पित्त का और मधु कफ का
अ० १ ] २ सूत्रस्थानम् १७
अ० १ ] २ सूत्रस्थानम् १७ शमन करता है और (२) कुछ द्रव्य शरीरको धारण करनेवाले वात आदि वा रस आदि को दूषित वा कुपित करते हैं और (३) कुछ द्रव्य स्वास्थ्य का रक्षण करते हैं, वे स्वस्थ अवस्था के लिए हितकारी हैं। जैसे- लाल चावल, सांठी के चावल, जौ, जीवन्ती शाक आदि। "शमनं कोपनं स्वस्थहितं द्रव्यमिति त्रिधा ॥" वाग्भटः ॥ तत्पुनस्त्रिविधं ज्ञेयं जाङ्गमौद्भिदपार्थिवम् । मधूनि गोरसाः पित्तं वसा मज्जासृगामिषम् ॥ ६८ ॥ विण्मूत्रं चर्म रेतोऽस्थि स्नायुः शृङ्गं खुरा नखाः । जङ्गमेभ्यः प्रयुज्यन्ते केशा लोमानि रोचनाः ॥ ६६ ॥ द्रव्य फिर तीन प्रकार के हैं ( १ ) (जांगम) प्राणियों से उत्पन्न होने वाले, और ( २ ) ( औद्भिद ) भूमि को भेदन करके पृथिवी में से उत्पन्न होने वाले वनस्पति आदि, ( ३ ) ( पार्थिव ) भूमि से उत्पन्न होने वाले, खनिज । जंगम द्रव्य— मधु (शहद) १ गोरस, दूध, घी, आदि, पित्त, वसा (चर्बी), मज्जा, रक्त, मांस, विष्ठा, मूत्र, चर्म, वीर्य, अस्थि, स्नायु, सींग, नख, खुर, (केश) शिर के बाल, ( रोम ) शरीर के बाल, रोचना अर्थात् गोरोचना, ये जांगम-प्राणियों से लेकर व्यवहार में लाये जाते हैं ॥ ६८-६६ ॥ भौम द्रव्य— सुवर्णं समलाः पञ्च लोहाः ससिकताः सुधा । मनःशिलाले मणयो लवणं गैरिकाञ्जने ॥ ७० ॥ भौममौषधमुद्दिष्टम्, औद्भिदं तु चतुर्विधम् । वनस्पतिर्वीरुधश्च वानस्पत्यस्तथौषधिः ॥ ७१ ॥ स्वर्ण, और इसका मल (शिलाजीत) पांच प्रकार के लोह जैसे रांगा, सीसा ताम्बा, चांदी और लोहा, (सिकता) बालू, (सुधा) चूना, पार्थिव विष, मनः शिला, (आल) हरताल, (मणि) स्फटिक आदि, लवण सैन्धव आदि, [ गैरिक ] गेरू, ( अंजन ) सुरमा, ये पार्थिव औषध कहे हैं औद्भिद द्रव्य चार प्रकार के हैं। वनस्पति, वीरुत् , वानस्पत्य और ओषधि ॥ ७०-७१ ॥ फलैर्वनस्पतिः, पुष्पैर्वानस्पत्यः फलैरपि । ओषध्यः फलपाकान्ताः, प्रतानैर्वीरुधः स्मृताः ॥ ७२ ॥ (१) जिनमें बिना पुष्प के फल आता है, वे 'वनस्पति' हैं, जैसे गूलर, वट १. माक्षिकं भ्रामरं क्षौद्रं पौत्तिकं मधुजातयः ।
१८ चरकसंहिता [ अ० १ पिलखन आदि, (२) जिनमें फल और पुष्प दोनों आते हैं उनको 'वानस्पत्य' अर्थात् वृक्ष कहते हैं, जैसे आम, जामुन आदि, (३) जो फल आने पर नष्ट हो जाते हैं, उनको 'ओषधि' कहते हैं जैसे धान, चावल, जौ, गेहूं आदि और (४) जो लता के समान फैलने वाली हैं उनको 'वीरुध्-कहते हैं जैसे गिलोय आदि ॥७२॥ औद्भिद पदार्थों के काम में आने वाले अंग:— मूलत्वक्सारनिर्यासनालस्वरसपल्लवाः । क्षाराः क्षीरं फलं पुष्पं भस्म तैलानि कण्टकाः ॥ ७३ ॥ पत्राणि शुङ्गाः कन्दाश्च प्ररोहाश्चौद्भिदो गणः । मूल, त्वचा, (सार) अन्दर का स्थिर सार भाग, (निर्यास) गोंद, (नाड़) नाल, (स्वरस) पीड़न करके द्रव्य से निकाला हुआ रस, ( पल्लव ) परों आम, जामुन आदि के, क्षार, (क्षीर) दूध, थोर आदि के फल, पुष्प, भस्म, तैल भिलावे आदि का; कांटे, पत्ते, शुंग अर्थात् छोटे २ कांटे जो वृक्ष पर होते हैं जैसे सिम्बल के, कन्द अर्थात् फलहीन ओषधियों के मूल, (प्ररोह) अंकुर यह 'औद्भिद गण' है । वनस्पतियों के ये उपरोक्त अंश काम में आते हैं ॥ ७३ ॥ मूलिन्यः षोडशैकोनाः फलिन्यो विंशतिः स्मृताः ॥ ७४ ॥ महास्नेहाश्च चत्वारः पञ्चैव लवणानि च । अष्टौ मूत्राणि सङ्ख्यातान्यष्टावेव पयांसि च ॥ ७५ ॥ शोधनार्थाश्च षड् वृक्षाः पुनर्वसुनिदर्शिताः । य एतान् वेत्ति संयोक्तुं विकारेषु स वेदवित् ॥ ७६ ॥ जिन वनस्पतियों का मूल प्रयोग करने योग्य है वे 'मूलिन' हैं । ऐसी वन- स्तियां सोलह हैं, और जिन वनस्पतियों का फल उपयोगी है वे 'फलिनी' हैं, ऐसी वनस्पतियां उन्नीस हैं । चार महास्नेह हैं जैसे घी, तैल, वसा, और मज्जा; पांच प्रकार के नमक हैं, आठ प्रकार के मूत्र और आठ ही प्रकार के दूध हैं और संशोधन के लिये छः वृक्ष पुनर्वसु आत्रेय ने कहे हैं । जो विद्वान् वैद्य रोगों में इन सब का प्रयोग करना जानता है वह आयुर्वेद को भली प्रकार से जानता है ॥ ७४-७६ ॥ सोलह 'मूलिनी' ओषधियों की गणना— हस्तिदन्ती हैमवती श्यामा त्रिवृदधोगुडा । सप्तला श्वेतनामा च प्रत्यक्श्रेणी गवाक्ष्यपि ॥ ७७ ॥ ज्योतिष्मती च बिम्बी च शणपुष्पी विषाणिका । अजगन्धा द्रवन्ती च क्षीरिणी चात्र षोडशी ॥ ७८ ॥
अ० १ ] सूत्रस्थानम् १६
अ० १ ] सूत्रस्थानम् १६ १ हस्तीदन्ती ( चका ), २ हैमवती ( श्वेत बच ), ३ श्यामा (त्रिवृत), ४ त्रिवृत् ( लाल जड़ वाली निशोथ ), ५ अधोगुडा ( विधारा ), ६ सप्तला ( शिका काई ), ७ श्वेतनाम ( श्वेत कोयल ), ८ प्रत्यक् श्रेणी ( दन्ती जमाल- गोटा ), ९ गवाक्षी ( इन्द्रायण ), १० ज्योतिष्मती ( माल कंगनी ), ११ बिम्बी (कन्दूरी ), १२ शणपुष्पी (झन झनियां), १३ विषाणिका ( उत्तरण ), १४ अजगन्धा ( डूंकू ), १५ द्रवन्ती ( जंगली एरण्ड ), १६ क्षीरिणी ( दिखौ ) ये सोलह हैं ॥ ७७-७८ ॥ इनके कर्म— शणपुष्पी च बिम्बी च छर्दने हैमवत्यपि । श्वेता ज्योतिष्मती चैव योज्या शीर्षविरेचने ॥ ७६ ॥ एकादशावशिष्टा याः प्रयोक्तव्यास्ता विरेचने । इत्युक्ता नामकर्मभ्यां मूलिन्यः, फलिनीः शृणु ॥ ८० ॥ ऊपर कही हुई सोलह मूलिनी औषधियों में, शणपुष्पी, बिम्बी, और हैम- वती ( श्वेतवचा ) ये तीन वमन कार्य में प्रयोग करनी चाहिये, श्वेत अपराजि- ता, ज्योतिष्मती ये दोनों शिरोविरेचन में, और शेष ग्यारह वनस्पतियां विरेचन कार्य में प्रयोग करना चाहिये । सब कामों में इनके मूल ही काम में लाने चाहिये। इस प्रकार से ये सोलह 'मूलवाली, वनस्पतियां नाम और कर्म सहित कह दी गयी हैं । 'फलिनी' वनस्पतियों का नाम सुनो ॥ ७६-८० ॥ शङ्खिन्यथ विडङ्गानि त्रपुषं मदनानि च । आनूपं स्थलजं चैव क्लीतकं द्विविधं स्मृतम् ॥ ८१ ॥ धामार्गवमथेक्ष्वाकु जीमूतं कृतवेधनम् । प्रकीर्या चोदकीर्या च प्रत्यक्पुष्पा तथाऽभया । अन्तः कोटरपुष्पी च हस्तिपर्ण्याश्च शारदम् ॥ ८२ ॥ कम्पिल्लकारग्वधयोः फलं यत्कुटजस्य च । धामार्गवमथेक्ष्वाकु जीमूतं कृतवेधनम् ॥ ८३ ॥ शंखिनी, विडङ्ग ( बायविडंग ), त्रपुष ( खीरा, ककड़ी ) मदन ( मैन- फल ), आनूप क्लीतक ( जल में पैदा होने वाली मुलहैटी ), स्थलज क्लीतक ( शुष्क भूमि में पैदा होने वाली मुलहैटी ), धामार्गव ( बड़ी तुरई ) इक्ष्वाकु ( कड़वी तुरई ), जीमूत ( वन्दाल ), कृतवेधन ( तुरई ), कडुवी प्रकीर्या और उदकीर्या ( दो प्रकार के करंज ), प्रत्यक् पुष्पा ( अपामार्ग ), अभया ( हरड़ ), अन्तःकोटरपुष्पी ( घाव पत्ता ), शारदा हस्तिपर्णी । ( हस्तिपर्णी के
२० चरकसंहिता [ अ० १ शरद् ऋतु में उत्पन्न फल ), कम्पिल्लक (कमीला), आरग्वध (अमलतास), कुटज ( कूड़े का फल, इन्द्र जौ ), ये १६ 'फलिनी' वनस्पतियां हैं ॥ ८१-८३ ॥ इनके कर्म— मदनं कुटजं चैव त्रपुषं हस्तिपर्णिनी । एतानि वमने चैव योज्यान्यास्थापनेषु च ॥ ८४ ॥ नस्तः प्रच्छर्दने चैव प्रत्यक्पुष्पा विधीयते । दश यान्यवशिष्टानि तान्युक्तानि विरेचने ॥ ८५ ॥ धामार्गव, इक्ष्वाकु, जीमूत, अमलतास, मैनफल, कूड़े का फल, खीरा, और हस्तिपर्णी के शरद् ऋतु में उत्पन्न फल ये आठ वनस्पतियां वमन, आस्थापन और निरूह बस्ति कर्म में प्रयोग करना चाहिये । अपामार्ग (चिरचिटे) का फल नस्य कर्म में प्रयोग करना चाहिये । और शेष दस वनस्पतियों का प्रयोग विरेचन कार्य में करना चाहिये । इस प्रकार से ये १६ 'फलिनी' वनस्पतियां नाम और कर्मों द्वारा कह दी हैं ॥ ८४-८५ ॥ चार प्रकार के स्नेह— नामकर्मभिरुक्तानि फलान्येकान्नविंशतिः । सर्पिस्तैलं वसा मज्जा स्नेहो दृष्टश्चतुर्विधः ॥ ८६ ॥ सर्पि ( घी ), तैल, वसा ( चर्बी ) और मज्जा ( अस्थि वा गुठलियों के भीतरी भाग का स्नेह, चिकनाई ) ये चार कहे हैं ॥ ८६ ॥ इनके कर्म कहते हैं:— पानाभ्यञ्जनबस्त्यर्थं नस्यार्थं चैव यौगिकः । स्नेहना जीवना बल्या वर्णोपचयवर्धनाः ॥ ८७ ॥ स्नेहा होते च विहिता वातपित्तकफापहाः । ये चारों स्नेह (पान) शरीर में मुख मार्ग से देने, शरीर पर मालिश करने, (बस्ती) गुदा या उपस्थमार्ग से देने, और (नस्य) नाक से देने में प्रयुक्त होते हैं। ये स्नेह शरीर का स्नेहन करते हैं, शरीर को जीवन देते हैं, शरीर का तर्पण करते हैं, बल और शक्ति को बढ़ाते हैं । ये स्नेह वात, पित्त और कफ को नष्ट करते हैं ॥ ८७ ॥ लवण— सौवर्चलं सैन्धवं च बिडमौद्भिदमेव च ॥ ८८ ॥ सामुद्रेण सहैतानि पञ्च स्युर्लवणानि च । पांच प्रकार के नमक हैं। (१) सैन्धव (सेन्धा नमक) सब नमकों में श्रेष्ठ
अ० १ ] सूत्रस्थानम् २१ है (२) सौवर्चल ( संचल ), (३) (विड) काला नमक, (४) ( औद्भिद ) काच नमक और (५) सामुद्र, समुद्र के पानी से तैयार किया हुआ, ये पांच प्रकार के लवण या नमक हैं॥ ८८ ॥ लवणों के कर्म - स्निग्धान्युष्णानि तीक्ष्णानि दीपनीयतमानि च ॥ ८९ ॥ आलेपनार्थे युज्यन्ते स्नेहस्वेदविधिषु तथा । अधोभागोर्ध्वभागेषु निरूहेष्वनुवासने ॥ ९० ॥ अभ्यञ्जने भोजनार्थे शिरसश्च विरेचने । शस्त्रकर्मणि वस्त्यर्थमञ्जनोत्सादनेषु च ॥ ९१ ॥ अजीर्णानाहवार्तेषु गुल्मे शूले तथोदरे । उक्तानि लवणानि, ऊर्ध्वं मूत्राण्यष्टौ निबोध मे ॥ ९२ ॥ ये नमक स्निग्ध, उष्ण, तीक्ष्ण और दीपनीय अर्थात् विशेष रूप से अग्नि बढ़ानेवाले हैं। ये नमक आलेपन में, स्नेहन में, और स्वेदन कार्य में, अधोभाग- विरेचन और ऊर्ध्व-विरेचन द्वारा दोषों को बाहर निकालने में, निरूहण में, अनु- वासन में, अभ्यङ्ग में, भोजन में, और शिर के विरेचन में, शस्त्र कर्म में, वर्त्ति अर्थात् फल वर्त्ति आदि में, अञ्जन में, उबटन में, अजीर्ण में, अफारे में, वायु रोग में, गुल्म में, शूल रोग में, और उदर रोगों में प्रयोग किये जाते हैं। ये पांचों प्रकार के नमक कह दिये ॥ ८९-९२ ॥ आठ मूत्र— मुख्यानि यानि ह्यष्टानि सर्याण्यात्रेयशासने । अविमूत्रमजामूत्रं गोमूत्रं माहिषं तथा ॥ ९३ ॥ हस्तिमूत्रमथोष्ट्रस्य हयस्य च खरस्य च । अब जो मुख्य आठ मूत्र आत्रेय ऋषि ने कहे हैं वे सुनिये— (१) भेड़ का मूत्र, (२) बकरी का मूत्र, (३) गाय का मूत्र, (४) भैंस का मूत्र, (५) हाथी का मूत्र, (६) ऊँट का मूत्र, (७) घोड़े का मूत्र और (८) गधे का मूत्र ये आठ प्रकार के मूत्र हैं१ ॥ ९३ ॥ मूत्रों के सामान्य गुण— उष्णं तीक्ष्णमथो रूक्षं कटुकं लवणान्वितम् ॥ ९४ ॥ मूत्रमुत्सादने युक्तं युक्तमालेपनेषु च । १. गोऽजाविमहिषीणां तु स्त्रीणां मूत्रं प्रशस्यते । खरोष्ट्रेभनराश्वानां पुंसां मूत्रं हितं स्मृतम्॥” भावप्रकाश ।