भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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१८४ चरकसंहिता [ अ० १४

धीसिकां तु करीषाणां यथोक्तानां प्रदीपयेत् । शयनान्तःप्रमाणेन शय्यामुपरि तत्र च ॥ ६१ ॥ सुदग्धायां विधूमायां यथोक्तामुपकल्पयेत् । स्ववच्छन्नः स्वपँस्तत्राभ्यक्तः स्विद्यति ना सुखम् ॥ ६२ ॥ होलाकस्वेद इत्येष सुखः प्रोक्तो महर्षिणा । इति त्रयोदशविधः स्वेदोऽग्निगुणसंश्रयः ॥ ६३ ॥ ( १३ ) होलाक स्वेद—हाथी, घोड़ा, गाय, गधा, ऊंट इनके छानों ( मल ) को लम्बी परन्तु गोलाकार ( धीतिका अर्थात् चिता के रूप में ) बना कर जला देना चाहिये और जब यह चिता धूम रहित हो जाय, तब इस पर यथोक्त शय्या आदि बिछाकर, वातहर तैल का मर्दन करके, उष्ण वस्त्र ओढ़कर सोने से सुखपूर्वक पसीना आता है । यह सुखकारक होलाकस्वेद है । ये तेरह प्रकार के स्वेद अग्नि के अधीन हैं, इनका महर्षि ने उपदेश किया है ॥६१-६३॥ व्यायाम उष्णसदनं गुरुप्रावरणं क्षुधा । बहुपानं भयक्रोधावुपनाहाहवातपाः ॥ ६४ ॥ स्वेदयन्ति दशैतानि नरमग्निगुणादृते । अग्निरहित स्वेद—व्यायाम ( शारीरिक श्रम ), उष्ण सदन ( वायु और शीत स्पर्श रहित तहखाना भूमि के नीचे के गरम घर ), कम्बल आदि भारी वस्त्र, क्षुधा ( भूख ), बहुपान ( गरम पानी या मद्य आदि का बहुत पीना ), भय, क्रोध, उपनाह ( पुलटिस ) आहव ( युद्ध ), आतप ( धूप ), ये दस अग्नि के बिना भी शरीर में स्वेदन करते हैं ॥ ६४ ॥ इत्युक्तो द्विविधः स्वेदः संयुक्तोऽग्निगुणैर्न च ॥ ६५ ॥ एकाङ्ग-सर्वाङ्ग-गतः स्निग्धो रूक्षस्तथैव च । इत्येतद् द्विविधं द्वन्द्वं स्वेदमुद्दिश्य कीर्तितम् ॥ ६६ ॥ स्निग्धः स्वेदैरुपक्रम्य स्विन्नः पथ्याशनो भवेत् । तदहः स्विन्नगात्रस्तु व्यायामं वर्जयेन्नरः ॥ ६७ ॥ इस प्रकार से दो प्रकार की स्वेद कह दिया; अग्नि गुण वाला और अग्नि- गुण रहित, एकांग और सर्वांग स्वेद, स्निग्ध एवं रूक्ष स्वेद, इस प्रकार तीन प्रकार के दो-दो स्वेदों को कह दिया, स्निग्ध मनुष्य की स्वेद द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । स्वेदन हो जाने पर पथ्य भोजन करना चाहिये । स्वेद दिया मनुष्य उस दिन व्यायाम को न करे ॥६५-६७॥ तत्र श्लोकाः । स्वेदो यथा कार्यकरो हितो येभ्यश्च यद्विधः । यत्र देशे यथा योग्यो देशो रक्ष्यश्च यो यथा ॥ ६८ ॥