चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 293, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २५ ] सूत्रस्थानम् २७५ पञ्चविंशतितमोऽध्यायः । अथातो यज्जःपुरुषीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब 'यज्जःपुरुषीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥१-२॥ पुरा प्रत्यक्षधर्माणं भगवन्तं पुनर्वसुम् । समेतानां महर्षीणां प्रादुरासीदियं कथा१ ॥ ३ ॥ आत्मेन्द्रियमनोर्थानां योऽयं पुरुषसंज्ञकः । राशिरस्यामयानां च प्रागुत्पत्तिविनिश्चये ॥ ४ ॥ अथ काशिपतिर्वाक्यं वामकोऽर्थवदन्तरा । व्याजहारर्षिसमितिमभिसृत्याभिवाद्य च ॥ ५ ॥ किं नु स्यात् पुरुषो यज्जस्तज्जास्तस्याऽऽमयाः स्मृताः । न वेत्युक्ते नरेन्द्रेण प्रोवाचर्षीन् पुनर्वसुः ॥ ६ ॥ सर्व एवामित-ज्ञान-विज्ञान-च्छिन्न-संशयाः । भवन्तश्छेत्तुमर्हन्ति काशिराजस्य संशयम् ॥ ७ ॥ धर्म के प्रत्यक्ष किये हुए महर्षि आत्रेय एक बार महर्षियों के साथ मिलकर बातचीत करने लगे कि—'आत्मा, इन्द्रिय, मन और विषय' इन से युक्त जो 'पुरुष' बनता है इसकी तथा रोगों की उत्पत्ति किस प्रकार और कहां से होती है ? इस प्रसंग में काशि के राजा वामक ऋषिसभा के सम्मुख अभिवादन करके बोलने लगे—हे भगवन् ! जिन कारणों से पुरुषों की उत्पत्ति होती है, उन्हीं कारणों से रोग उत्पन्न होते हैं, यह मानना संगत है या नहीं ? ऋषि पुनर्वसु ने कहा कि—हे महर्षियों ! तुम सब अपार ज्ञान रखते हो, विज्ञान से तुम्हारे सब सन्देह मिट चुके हैं। आप लोग इन काशिपति के सन्देह को दूर करें ॥७॥ पारीक्षित्स्तत्परीक्ष्याग्रे मौद्गल्यो वाक्यमब्रवीत् । आत्मजः पुरुषो रोगाश्चाऽऽत्मजाः कारणं हि सः ॥ ८ ॥ स चिनोत्युपभुङ्क्ते च कर्म कर्मफलानि च । नह्यते चेतनाधातोः प्रवृत्तिः सुखदुःखयोः ॥ ६ ॥ पारीक्षि मौद्गल्य कहने लगे कि—पुरुष आत्मा से उत्पन्न होता है और रोग भी आत्मा से ही उत्पन्न होते हैं। वही आत्मा आहार-विहारादि कर्मों को १. महर्षय उपासीना प्रादुश्चकुरिमां कथामिति वा पाठः ।