भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ६१ पञ्चकषायशतानि पूर्यन्ते, तानि तानि ह्येवाङ्गानि संस्रवन्ते तेषु तेषु महाकषायेष्विति ॥ १६ ॥ इस प्रकार से कहते हुए 'भगवान् आत्रेय' के प्रति अग्निवेश बोले—हे भगवन् ! ये पांच सौ कषाय पूरे नहीं होते। क्योंकि वे ही द्रव्य उन उन महा कषायों में बार-बार आते हैं। अर्थात् एक द्रव्य भिन्न २ कषायों में बार-बार आता है । इस प्रकार से ५०० कषाय पूरे नहीं हो सकते ॥ १६ ॥ तमुवाच भगवानात्रेयः—नैतदेवं बुद्धिमता द्रष्टव्यमग्निवेश ! एकोऽपि ह्यनेकां संज्ञां लभते कार्यान्तराणि कुर्वन् । तद्यथा—पुरुषो बहूनां कर्मणां करणे समर्थो भवति । स यद्यत्कर्म करोति तस्य तस्य कर्मणः कर्तृकरणकार्यसंप्रयुक्तं तत्तद्गौणं नामविशेषं प्राप्नोति तद्व- दौषधद्रव्यमपि द्रष्टव्यम् । यदि त्वेकमेव किंचिद् द्रव्यमासादयामस्तथा- गुणयुक्तं यत्सर्वकर्मणां करणे समर्थं स्यात् कस्ततोऽन्यदिच्छे दुपधारयि- तुमुपदेष्टुं वा शिष्येभ्य इति ॥ १७ । अग्निवेश के प्रति भगवान् आत्रेय बोले हे अग्निवेश ! बुद्धिमान् व्यक्ति को इस प्रकार से नहीं देखना चाहिये । एक द्रव्य भी दूसरे २ काम करता हुआ भिन्न २ संज्ञा वाला हो जाता है । जिस प्रकार एक पुरुष बहुत से काम करने में समर्थ होता है । वह जो जो भी काम करता है, वह उस कर्म के वह कर्त्ता, करण (साधन) और कार्य के अनुसार वह गुणवाले नाम विशेष को प्राप्त होता है। इस प्रकार से औषध द्रव्य को भी कार्य साधन और कर्त्ता आदि दृष्टि से देखना चाहिये । और यदि किसी ऐसे एक ही द्रव्य को प्राप्त कर लें, जो द्रव्य सब काम करने में समर्थ हो,तो फिर कौन दूसरी औषध को पास में रखने अथवा शिष्यों को उपदेश करने के लिये झंझट करे, इसलिये काम करने में समर्थ शक्ति वाला ऐसा कोई एक द्रव्य नहीं है ॥१७॥ तत्र श्लोकाः । यतो यावन्ति यैर्द्रव्यैर्विरेचनशतानि षट् । उक्तानि संग्रहणेह तथैवेषां षडाश्रयाः ॥ १८ ॥ रसा लवणवर्ज्याश्च कषाय इति संज्ञिताः । तस्मात्पञ्चविधा योनिः कषायाणामुदाहृता ॥ १८ ॥ तथा कल्पनमप्येषामुक्तं पञ्चविधं पुनः । महतां च कषायाणां पञ्चाशत्परिकीर्तिताः ॥ २० ॥ पञ्च चापि कषायाणां शतान्युक्तानि भागशः ।