भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 616 में से

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पृष्ठ 274

२६० चरकसंहिता [ अ० २ ( तृतीयः पादः ) अथातो माषपर्णभृतीय वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे 'माषपर्णभृतीय' नामक वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ माषपर्णभृतां धेनुं गृष्टिं पुष्टां चतुःस्तनीम् । समानवर्णवत्सां च जीवद्वत्सां च बुद्धिमान् ॥ ३ ॥ रोहिणीमथवा कृष्णामूर्ध्वशृङ्गीमदारुणाम् । इक्ष्वादामर्जुनादां वा सान्द्रक्षीरा च धारयेत् ॥ ४ ॥ केवलं तु पयस्तस्याः शृतं वाऽशृतमेव वा । शर्कराक्षौद्रसर्पिर्भिर्युक्तं तद् वृष्यमुत्तमम् ॥ ५ ॥ जो गाय उड़द के पत्तों पर पाली गई हो, प्रथम बार ही ब्याई हो, चार चार स्तनों वाली हो, जिसका कि बछड़ा जीता हो, बछड़े का रंग माता के समान हो, लाल या काले रग क हो, उन्नत ( खड़े ) सींग वाली हो, भयंकर या मारने वाला न हो, गन्ने के पत्ते या अर्जुन के पत्ते खाती हो, दूध गाढ़ा हो, बुद्धिमान् व्यक्ति को ऐसी गाय रखनी चाहिये । इस गाय का दूध ही अकेला चाहे धारोष्ण अवस्था में कच्चा ही अथवा गरम करके शर्करा, मधु तथा घी के साथ लेने से उत्तम वाजीकरण होता है। [ ये तीन योग हैं--उबला हुआ दूध, कच्चा दूध और घी आदि से मिला । गाय का भोजन भी तीन प्रकार का है । उड़द के पत्ते, गन्ने के पत्ते और अर्जुन के पत्त ] ॥३-५॥ शुक्रलैर्जीवनीयैश्च बृहणैर्बलवर्धनैः । क्षीरसर्जननैश्चैव पयः सिद्ध पृथक् पृथक् ॥ ६ ॥ युक्तं गोधूमचूर्णेन सघृतक्षौद्रशर्करम् । पर्यायेण प्रयोक्तव्यमिच्छता शुक्रमक्षयम् ॥ ७ ॥ इति वृष्यक्षीरप्रयोगः। वृष्य क्षीर प्रयोग—सूत्रस्थान के चतुर्थ अध्याय में वर्णित शुक्रवर्धक, जीव- नीय, बृंहणीय, बल्य और स्तन्यवर्धक इन पाच गणों से पृथक् पृथक् दूध सिद्ध करे । जब दूध सिद्ध हो जाये तब इसमें गेहूँ का आटा मिला कर घी में भून ले । इसमें शर्करा भी मिला दे । ठण्डा होने पर शहद मिला कर पृथक् पृथक प्रयोग करे । प्रथम दिन शुक्रवर्धक गण से सिद्ध, दूसरे दिन जीवनीय गण से,

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