भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ३ चिकित्सितस्थानम् २६७ वमन करान से हृदय-रोग, श्वास, आनाह, मोह (मूर्च्छा), आदि उपद्रव हो जाते हैं। सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त, धातुओ मे स्थित साम दोष को निकालना ऐसे ही अति कठिन और खतरे से खाली नहीं जिस प्रकार कच्चे फलो से स्वरस को निकालना कठिन होता है, और कभी कभी इस मे फल का भी नाश हो जाता है। वमन या लङ्घन करने के पश्चात् उचित समय पर (भोजन काल मे औष- धियो से सिद्ध मण्ड और यवागू देनी चाहिये। अधिक द्रव होने से प्रथम मण्ड देना चाहिये, पीछे से यवागू (विलेपी) देनी चाहिये। इस समय पाचक औष- धियो से सिद्ध करके मण्ड देना चाहिये। जब तक ज्वर घटे नहीं अथवा छ दिनो तक मण्ड ओर यवागू का प्रयोग करना चाहिये। इसके प्रयोग से जिस प्रकार समिधाओ से अग्नि बढती है, जाठराग्नि प्रदीप्त होती है। औषधियो का सयोग होने से, लघु होने से, यवागू अग्नि को बढाती है, वायु, मल मूत्र ओर दोषो का अनुलोमन करती है, द्रव ओर उष्ण होने से पसीना लाती है, द्रव होने से प्यास बुझाती है, आहार होने के कारण प्राण बल देती है, खर होने से लघुता उत्पन्न करती है ज्वर मे सात्म्य होने से ज्वरनाशक है। इसलिये बुद्धिमान् को चाहिये कि प्रथम पेयाओ द्वारा ज्वर की चिकित्सा करे। यदि ज्वर मद्य मे उत्पन्न हुआ है तो पेया न देवे ॥ १४६-१५३ ॥ मदात्यये मद्यनित्ये ग्रीष्मे पित्तकफाधिके । ऊर्ध्वगे रक्तपित्ते च यवागूर्न हिता ज्वरे ॥ १५४ ॥ निम्न अवस्थाओ मे यवागू नहीं देनी चाहिये—मद्यपान से उत्पन्न ज्वर मे, मदात्यय मे, नित्य मद्यपान करने वाले को, ग्रीष्म ऋतु मे, पित्तकफ प्रधान ज्वर में, ऊर्ध्वग रक्त पित्त मे यवागू हितकर नहीं होती ॥ १५४ ॥ तत्र तर्पणमेवाग्रे प्रयोज्यं लाजसक्तुभिः । ज्वरापहैः फलरसैर्युक्तं समधुशर्करम् ॥ १५५ ॥ द्राक्षादाडिमखर्जूरप्रियालैः सपरूषकैः । तर्पणार्हेषु कर्त्तव्यं तर्पणं ज्वरशान्तये ॥ १५६ ॥ ततः सात्म्यबलापेक्षी भोजयेज्जीर्णतर्पणम् । तनुना मुद्गयूषेण जाङ्गलाना रसेन वा ॥ १५७ ॥ इन उपरोक्त अवस्थाओ मे—लाजा के सत्तूओ को मधु, खाड तथा अनार आदि फलो के रस के साथ देना चाहिये। यवागू के स्थान पर लाजाओ का तर्पण प्रथम देना चाहिये। जो रोगी तर्पण के योग्य हो उनको ज्वर की शान्ति के लिये अगूर, अनार, खजूर, पियाल, फालसा इनके रसो से