चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 373, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३५८ चरकसंहिता [ अ० ५ शुण्ठी १ पल, पिप्पली १॥ पल, धान्य १ कुडव, दाडिम २ कुडव, घृत २० पल और दूध एक साथ पकावे ] । घृतसाधन के लिये जिन आषधियो के गुण कहे है, उनका चूर्ण, वर्त्ति और कषाय के रूप मे भी गुल्म रोगियो पर प्रयोग करे ॥ ७४-७६ ॥ कोलदाडिमघर्माम्बुसुरामण्डाम्लकाञ्जिकैः ॥ ७७ ॥ शूलानाहनुदः पेया बीजपूररसेन वा । चूर्णानि मातुलुङ्गस्य भावितानि रसेन वा ॥ ७८ ॥ कुर्याद्वर्तीः सगुडिका गुल्मानाहातिशान्तये । इन औषधि गणो के चूर्णो को बेर का रस, अनार का रस, गरम पानी, सुरा, मण्ड, खट्टी काजी या बिजौरे के रस के साथ पीवे । इससे शूल और आनाह नष्ट होते है । उपरोक्त चूर्णो को बिजौरे के रस से भावना देकर वर्त्तिया और गुटिकाये बनावे । ये वर्त्तिया गुल्म और आनाह (अफारा) को नष्ट करती है ॥ ७७-७८ ॥ हिंगु त्रिकटुकं पाठा हबुषामभया शटीम् ॥ ७९ ॥ अजमोदाजगन्धे च तिन्तिडीकाम्लवेतसौ । दाडिमं पुष्करं धान्यमजाजी चित्रकं वचाम् ॥ ८० ॥ द्वौ क्षारौ लवणे द्वे च चव्यं चैकत्र चूर्णयेत् । चूर्णमेतत्प्रयोक्तव्यमनुपानेष्वनत्ययम् ॥ ८१ ॥ प्राग्भक्तमथवा पेयं मद्येनोष्णोदकेन वा । पार्श्वहृद्-बस्तिशूलेषु गुल्मे वातकफात्मके ॥ ८२ ॥ आनाहे मूत्रकृच्छ्रे च शूले च गुदयोनिजे । ग्रहण्यर्शोविकारेषु प्लीहि पाण्ड्वामयेऽरुचौ ॥ ८३ ॥ उरोविबन्धे कासे च हिक्काश्वासे गलग्रहे । (७) हिग्वादि चूर्ण—हीग, त्रिकटु, पाठा, हाऊबेर, हरड़, कचूर, अजवायन, अजगन्धा ( अजवायन का भेद ), तिन्तिडीक ( इमली ), अम्ल- वेतस, अनारदाना, पोहकरमूल, धनिया, श्वेत जीरा, चीता, वच, यवक्षार, सर्जिक्षार, सेन्धा नमक, सचलनमक और चविका इनको समान भाग मे लेकर चूर्ण करना चाहिये । [ मात्रा १ मासे से ३ मासे तक । ] इस चूर्ण को भोजन से पूर्व [ यदि पेट मे अम्ल अधिक हो तो ] मद्य या गरम पानी से पीवे । भोजन के तत्काल पीछे [ यदि क्षार अधिक हो तो ] उष्ण जल या तक्र से ले । यह चूर्ण पार्श्वशूल, बस्तिशूल, कफजन्य और वातजन्य