भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अपस्मार-विषोन्माद-कृत्यालक्ष्मीज्वरापहः ॥ ७८ ॥ भूतेभ्यश्च भयं हन्ति राजद्वारे च शस्यते । ( ६ ) सिद्धार्थ ( श्वेत सरसो ), वच, हींग, करञ्ज, देवदारु, मजीठ, त्रिफला, श्वेता ( श्वेत अपराजिता ), कटभी ( वापुभा ), त्वक् ( दालचीनी ), त्रिकटु ( सोठ, मरिच, पिप्पली ), प्रियङ्गु, शिरीष के बीज, हल्दी, दारुहल्दी इन सबका समान भाग लेकर बकरी के मूत्र मे पीस ले। यह अगद पान, नस्य, आलेपन, अञ्जन, उद्वर्त्तन ओर स्नान मे प्रयोग करने पर अपस्मार, विष, उन्माद, कृत्या ( मारण क्रिया ), अलक्ष्मी ओर ज्वर को नष्ट करता है। इस अगद के पानादि से भूतो से भय नहीं रहता। राजसभा मे सफलता मिलता है ॥ ७६-७८ ॥ सर्पिरेतेन सिद्ध वा सगोमूत्रं तदर्थकृत् ॥ ७९ ॥ प्रसेके पीनसे गन्धैर्धूमवर्ति कृता पिबेत् । वैरेचनिकधूमोक्तेः श्वेताद्यैर्वा सहिङ्गुभिः ॥ ८० ॥ ( १० ) सिद्धार्थक आदि वस्तुओ द्वारा गोमूत्र मे सिद्ध किया घृत भी यही फल देता है, मुख से पानी बहने पर, पीनस मे, उन्माद मे गन्ध-वस्तुओ ( दाह ज्वर चिकित्सा मे कथित अगरु आदि वस्तुओ ) से बनी धूमवर्त्ति तथा सूत्र- स्थान मे कथित श्वेता, ज्योतिष्मती आदि वैरेचनिक वस्तुओ को हींग के साथ धूमवर्त्ती करके प्रायोगिक धूम विधि से पीवे १ ॥ ७६-८० ॥ शल्लकालूकमार्जारजम्बूकवृकबस्तजैः । मूत्र-पित्तःशकृल्लोम-नखैश्चर्मभिरेव च ॥ ८१ ॥ सेकाञ्जनं प्रधमनं नस्यं धूमं च कारयेत् । वातश्लेष्मात्मके प्रायः— ( ११ ) शल्लक ( शजार ), उल्लू, बिल्ली, गीदड, भेडिया, बकरा इन पशुओ के मूत्र, पित्त, शकृत् ( मल ), लोम, नख, चमडे से परिषेक, अञ्जन, प्रधमन ( विरेचन चूर्ण रूप नस्य ), नस्य, धूम, वातजन्य और कफजन्य उन्माद मे प्रायः करके करना चाहिये ॥८१-॥ पैत्तिके च प्रशस्यते ॥ ८२ ॥ तिक्तकं जीवनीय च सर्पिः स्नेहश्च मिश्रकः । शीतानि चान्नपानानि मधुराणि मृदूनि च ॥ ८३ ॥ १ वैरेचनिक धूम—'श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितालमन शिला। गन्धाश्चागुरुपत्राद्या धूमो मूर्धविरेचने' ॥