चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 479, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४६५ दन्तीतृवृत्त्र्यूषणचित्रकैर्वा पयः शृतं दोषहरं पिबेन्ना । द्विप्रस्थमात्रं च पलार्धिकैस्तैरर्धावशिष्टं पवने सपित्ते ॥ २४ ॥ (४) वातजन्य और पित्तजन्य शोथ मे-दन्ती, निशोथ, सोठ, मरिच, पिप्पली और चीता इनके चूर्ण के साथ दूध पका कर पीवे । दन्ती आदि प्रत्येक का आधा २ पल लेकर दूध दो प्रस्थ पकावे । जब आधा रह जाये तब इस दूध को पिये यह दूध दोषनाशक है ॥ २४ ॥ सशुण्ठि पीतद्रुरसं प्रयोज्यं श्यामोरुबूकोपषणसाधितं वा । त्वग्दारुवर्षाभूमहौषधैर्वा गुडूचिकानागरदन्तिभिर्वा ॥ २५ ॥ (५) चार योग—(१) साठ, पीतद्रु (हल्दू) इनके क्वाथ से साधित दूध । (२) श्यामा (निशोथ), एरण्ड इनको मूल और ऊषण (मरिच) इनसे साधित । (३) दालचीनी, देवदार (या दारुहल्दी), पुनर्नवा और सोठ इनसे साधित दूध । (४) गिलोय, सोठ और दन्ती इनसे साधित दूध वातजन्य और पित्तजन्य शोथ मे पीना चाहिये । प्रत्येक द्रव्य आधा पल, दूध दो प्रस्थ जब आधा रह जाये तब प्रयोग करे ॥ २५ ॥ सप्ताहमौष्ट्रं त्वथवाऽपि मासं पयः पिबेद्भोजनवारिवर्जी । गव्यं समूत्रं महिषीपयो वा क्षीराशनं मूत्रमथो गवा वा ॥२६॥ (६) भोजन और पानी छोड़ कर सात दिन तक अथवा एक मास तक केवल ऊटनी का दूध पीवे । अथवा गाय का मूत्र और भैंस का दूध पीवे अथवा केवल गाय या भैंस के दूध वा मूत्र पर ही गुजारा करे ॥ २६ ॥ तक्रं पिबेद्वा गुरुभिन्नवर्चाः सव्योषसौवर्चलमाक्षिकं वा । गुडामया वा गुडनागरां वा सदोपभिन्नामविबद्धवर्चाः ॥ २७ ॥ (७) शोथ रोगी को अतिसार और भारीपन हो तो सोठ, मरिच, पिप्पली, संचल नमक और शहद के साथ तक्र (मठा) पीवे । यदि रोगी का दोष के कारण या आम से युक्त मल आता हो तो हरड़ और गुड को समान मात्रा मे अथवा सोठ और गुड को समान भाग मे लेकर खावे ॥ २७ ॥ विड्वातसङ्गे पयसा रसैर्वा प्राग्भुक्तमद्यादुरुबूकतैलम् । स्रोतोविबन्धेऽग्निरुचिप्रणाशे मद्यान्यरिष्टांश्च पिबेत्सुजातान् ॥२८॥ (८) यदि वायु और मल का अवरोध हो तो भोजन से पूर्व मास रस या दूध के साथ एरण्ड तैल पीवे । स्रोतो के रुकने पर, जाठराग्नि मन्द और भोजन की इच्छा न हो तो अच्छी प्रकार बने अरिष्टो का पान करे ॥ २८ ॥ गण्डीरभल्लातकचित्रकाश्च व्योषं विडङ्गं बृहतीद्वयं च । द्विप्रस्थिकं गोमयपावकेन द्रोणे पचेत्कूर्चिकमस्तुनस्तु ॥ २९ ॥