चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 519, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५३५ यथार्हं१ स्निग्धकोष्ठेन पेयमेतद्विरेचनम् । इति नारायणचूर्णम् । भगन्दर, पाण्डुरोग, श्वास, कास, गलग्रह, हृदयरोग, ग्रहणीरोग, कूठ, अग्निमान्द्य, ज्वर, दंष्ट्रा-विष ( जागम विष ), मूल विष ( स्थावर विष ), सगर ( निर्विष द्रव्य सयोगज विष ) मे और कृत्रिम ( विष द्रव्य सयोगज विष ) मे यथायोग अनुपान के साथ पीना चाहिये२ ॥ १३०-१३१ ॥ हपुषा काञ्चनक्षीरी त्रिफला कटुरोहिणी ॥ १३२ ॥ नीलिनी त्रायमाणा च शातला त्रिवृता वचा । सैन्धवं काललवणं पिप्पली चेति चूर्णयेत् ॥ १३३ ॥ दाडिमत्रिफलामासरसमूत्रसुखोदकैः । पेयोऽयं सर्वगुल्मेषु प्लीह्नि सर्वोदरेषु च ॥ १३४ ॥ कुष्ठे श्वित्रे सरुजके सवाते विषमाग्निषु । शोथार्शःपाण्डुरोगेषु कामलाया हलीमकै ॥ १३५ ॥ वातं पित्त कफ चाऽऽशु विरेकात्सप्रसाधयेत् । इति हपुषाद्य चूर्णम् । ( ४ ) हपुषाद्य-चूर्ण—हपुषा ( हऊबेर ), स्वर्ण क्षारी, त्रिफला, कुटकी, नीलिनी, त्रायमाणा, सातला, निशोथ, वच, सैन्वा नमक, काला लवण ( सचल या बिड् नमक ), पिप्पली ये सब समान भाग लेकर चूर्ण कर ले । इस चूर्ण को सब प्रकार के गुल्मो मे, प्लीहा मे उदर-रोगो मे, कुष्ठ मे, श्वित्र-रोग में, दर्द युक्त उदर-रोग मे, वातयुक्त उदर विकार मे, अग्नि के विषम होने पर, शोथ, अर्श, पाण्डुरोग, कामला और हलीमक-राग मे, अनार, त्रिफला, मास रस, मूत्र और गरम पानी जो योग्य अनुपान इनमे से दीखे उसके साथ लेना चाहिये । अनार का रस ओर त्रिफला का क्वाथ बरतना चाहिये । इस प्रकार लेने से यह चूर्ण विरेचन द्वारा वात, पित्त, कफ का साधन कर देता है ॥१३२-१३५॥ नीलिनी निचुलं व्योषं द्वौ क्षारौ लवणानि च ॥ १३६ ॥ चित्रक च पिबेच्चूर्णं सर्पिषोदरगुल्मनुत् । इति नीलिल्याद्यं चूर्णम् । १ 'यथार्थ' इति वा पाठः । २ स्थावर जागमं चेति विष प्रोक्तमकृत्रिमम् । कृत्रिम गरसज्ञन्तु क्रियते विविधौषधैः ॥ सयोगे द्विविध प्रोक्तं तृतीय विषमुच्यते । गरं स्यादविषं तत्र सविष कृत्रिमं मतम् ॥