भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० १३ ] ३५ चिकित्सितस्थानम् ५४५ श्यामाकं कोरदूषं वा पयसाऽलवणं नरः¹ ॥ १६१ ॥ संवत्सरेणैव जयेत् प्राप्तं चैव जलोदरम् । प्रयोगाणां च सर्वेषामनुक्षीरं प्रयोजयेत् ॥ १६२ ॥ पानी के निकल जाने पर रोगी को लङ्घन कराके स्नेह और लवण से रहित पेया पिलानी चाहिये । इसके पीछे छः मास तक केवल दूध पर ही निर्वाह करे। तीन मास तक दूध के साथ पेया पीना चाहिये । शेष तीन मासो मे श्यामाक, कोदो आदि लघु अन्न दूध के साथ, थोडे नमक के साथ खाये । इस प्रकार से एक साल की चिकित्सा से जलोदर की चिकित्सा करनी चाहिये² ॥१६०-१६२॥ दोषानुबन्धरक्षार्थं बलस्थैर्यार्थमेव च प्रयोगापचिताङ्गानां हितं ह्युदरिणां पयः । सर्वधातुक्षयार्तानां देवानाममृतं यथा ॥ १६३ ॥ दोष-अनुबन्ध की निवृत्ति और बल तथा धातुओ की स्थिरता के लिये सब प्रयोगो के पीछे दूध पीना चाहिये । क्योंकि विरेचनादि प्रयोगों से क्षीण अंगों वाले और सब धातुओं का क्षय होने से उदर-रोगी के लिये दूध अमृत के समान हितकारी है ॥ १६३ ॥ तत्र श्लोकौ—हेतुं प्राग्रूपमष्टानां लिङ्गं व्याससमासतः । उपद्रवान् गरीयस्त्वं साध्यासाध्यत्वमेव च ॥ १६४ ॥ जाताजाताम्बुलिङ्गानि चिकित्सा चोक्तवानृषिः । समासव्यासनिर्देशैरुदराणां चिकित्सिते ॥ १६५ ॥ उपसहार—आठो प्रकार के उदर रोगा के विस्तार और सक्षेप मे कारणों, पूर्वरूपो, लक्षणो और उपद्रवो तथा प्राधान्य-अप्राधान्य, साध्यासाध्य, जातोदक और अजातोदक के लक्षण और चिकित्सा का भगवान् आत्रेय ने इस उदररोग- चिकित्सा-अध्याय मे कह दिया ॥ १६४-१६५ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने उदर- चिकित्सितं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ १. 'कोरदूष्यं वा क्षीरेण लघुभोजन' इति च पाठः । २. सुश्रुत मे— २. निःस्रुते च दोषे गाढतरमाविककौशेयकचर्मणामन्यतमेन परिवेष्टयेदुदरम्। तथा नाध्मापयति वायु । षण्मासांश्च पयसा भोजयेत् जांगलरसेन वा । तत्र त्रीन् मासान् अर्द्धोदकेन पयसा फलाम्लेन जांगलरसेन वा । अवशिष्टमासत्रयमन्नं लघु हितं वा सेवेत । एव संवत्सरेणागदो भवति ॥ सु० चि० १४ ॥