भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन


अवतरण - नदी तट पर पहुंच कर नागरजी ने बहुत दूर तक दृष्टि दौड़ाई किन्तु उन्हें कुछ न दिखाई पड़ा । तब उन्हों ने जल में प्रवेश किया और कमर तक पानी में खड़े होकर उत्सुक नेत्रों से वे जल - प्रवाह को देखते रहे कि कमल पुष्प आ रहा है या नहीं । फिर भी कमल का कहीं पता न था । अधीर मन में शंका की एक क्षीण रेखा उभरी, किन्तु उनके आस्तिक भाव ने तत्काल उस रेखा को मिटा कर विश्वास जगाया कि एक दिव्य संत के वचन असत्य नहीं हो सकते । वास्तव में, पुत्र पाने की आतुरता में नागरजी यह भूल ही गए कि एक दिव्य शिशु को स्पर्श करने के पहले उनका स्नान करके पवित्र हो जाना बहुत आवश्यक है । भक्त की भूल को भगवान सुधार देते हैं । दैवी प्रेरणा हुई । लोधीरामजी ने श्री हरि कह कर जल में डुबकी लगाई और जैसे ही उन्हों ने अपना सिर बाहर निकाला कि उन्हें एक विशाल कमल पुष्प जल में तैरता हुआ दिखाई पड़ा । उनका चित्त प्रफुल्लित होगया । जब उन्हों ने कमल को अपनी ओर आते देखा तो उनका हर्ष सीमा पार करने लगा । निकट आने पर उन्हों ने देखा कि कमल पर लेटा हुआ शिशु उनकी ओर देखकर मन्द - मन्द मुस्कुरा रहा है । फिर तो नागरजी सुध - बुध भूलकर आनंदमग्न हो गए । नागरजी ने देखा कि वह दिव्य तेजस्वी शिशु अपनी मुस्कान चतुर्दिश बिखेर रहा है । फिर क्या था, लोधीरामजी ने बड़े प्यार से शिशु को उठा लिया । नागरजी के हाथों में शिशु के पहुँचते ही आकाश में देव - गंधर्व - किंन्नर प्रकट होकर जय - जयकार करने लगे । साथ ही में दिव्य पुष्प एवं केशर की वर्षा करने लगे । अप्सराएं नृत्य करती हुई यशोगान करने लगीं । दिव्य वाद्य यंत्रों की झंकार से सारा वातावरण गुंजारित हो उठा । आसपास में स्नान करते हुए सभी लोगों ने इस अलौकिक दिव्य दृश्य को देखा और उनके मुख से यह उच्चारण हुआ “नागर के भाग्य धन्य हैं, नागर के भाग्य धन्य हैं ।” लोधीरामजी समझ गए कि कोई दिव्य विभूति उनको कृतार्थ करने उनके यहां पधारी है । वे

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