देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 483, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| तानुवाच सुरान्देवी प्रसन्नवदना गिरा।<br>भयं त्यजन्तु भो देवाः शं विधास्ये किलाधुना ॥ २४ | प्रसन्न मुखमण्डलवाली भगवतीने उन देवताओंसे कहा—हे देवताओ! आपलोग भयका त्याग कर दें, अब मैं आपलोगोंका कल्याण अवश्य करूँगी ॥ २४ ॥ | | इत्युक्त्वा सा तदा देवी सिंहारूढातिसुन्दरी।<br>जगाम तरसा तत्र यत्र दैत्या मदान्विताः ॥ २५ | तब ऐसा कहकर सिंहपर सवार वे परम सुन्दर भगवती तुरंत वहाँ चल पड़ीं, जहाँ अभिमानी दानव विद्यमान थे ॥ २५ ॥ | | प्रह्लादप्रमुखाः सर्वे दृष्ट्वा देवीं पुरःस्थिताम्।<br>ऊचुः परस्परं भीताः किं कर्तव्यमितस्तदा ॥ २६ | प्रह्लाद आदि सभी प्रमुख दानव भगवतीको सामने स्थित देखकर भयभीत हो आपसमें कहने लगे कि अब हमें क्या करना चाहिये ? ॥ २६ ॥ | | देवं नारायणं चात्र सम्प्राप्ता चण्डिका किल।<br>महिषान्तकरी नूनं चण्डमुण्डविनाशिनी ॥ २७ | सम्भवतः यह चण्डिका भगवान् नारायणसे मिलकर यहाँ आयी है। इसीने महिषासुरका वध किया था तथा चण्ड-मुण्डका विनाश किया था। | | निहनिष्यति नः सर्वानम्बिका नात्र संशयः।<br>वक्रदृष्ट्या यया पूर्वं निहतौ मधुकैटभौ ॥ २८ | जिसने पूर्वकालमें अपनी वक्रदृष्टिसे मधु-कैटभका संहार कर डाला था, वह अम्बिका हम सबको अवश्य मार डालेगी ॥ २७-२८ ॥ | | एवं चिन्तातुरान्वीक्ष्य प्रह्लादस्तानुवाच ह।<br>योद्धव्यं नाथ गन्तव्यं पलाय्य दानवोत्तमाः ॥ २९ | इस प्रकार उन्हें चिन्तासे व्याकुल देखकर प्रह्लादने उनसे कहा—हे श्रेष्ठ दानवो! इस समय हमें युद्ध नहीं करना चाहिये, बल्कि भागकर यहाँसे चले जाना चाहिये ॥ २९ ॥ | | नमुचिस्तानुवाचाथ पलायनपरानिह।<br>हनिष्यति जगन्माता रुषिता किल हेतिभिः ॥ ३० | तब भागनेकी चेष्टा करनेवाले उन दैत्योंसे नमुचिने कहा—ये जगन्माता भगवती कुपित होकर शस्त्रोंसे हमलोगोंका संहार अवश्य कर देंगी। [इसके | | तथा कुरु महाभाग यथा दुःखं न जायते।<br>व्रजामोऽद्यैव पातालं तां स्तुत्वा तदनुज्ञया ॥ ३१ | बाद उसने प्रह्लादसे कहा—] हे महाभाग! आप ऐसा उपाय करें, जिससे हमलोगोंको दुःख न मिले। उन भगवतीकी स्तुति करके उनकी आज्ञासे हमलोग इसी क्षण पातालके लिये प्रस्थान कर दें ॥ ३०-३१ ॥ | | प्रह्लाद उवाच<br>स्तौमि देवीं महामायां सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम्।<br>सर्वेषां जननीं शक्तिं भक्तानामभयङ्करीम् ॥ ३२ | प्रह्लाद बोले—सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली, सभी प्राणियोंकी माता तथा भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाली शक्तिस्वरूपा भगवती महामायाकी मैं स्तुति करता हूँ ॥ ३२ ॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा विष्णुभक्तस्तु प्रह्लादः परमार्थवित्।<br>तुष्टाव जगतां धात्रीं कृताञ्जलिपुटस्तदा ॥ ३३ | व्यासजी बोले—ऐसा कहकर परमार्थवेत्ता विष्णुभक्त प्रह्लाद दोनों हाथ जोड़कर जगज्जननी भगवतीकी स्तुति करने लगे— ॥ ३३ ॥ | | मालासर्पवदाभाति यस्यां सर्वं चराचरम्।<br>सर्वाधिष्ठानरूपायै तस्यै ह्रींमूर्तये नमः ॥ ३४ | जिनमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत् मालामें सर्पकी भाँति प्रतीत हो रहा है, सबकी अधिष्ठानस्वरूपा उन ‘ह्रीं’ मूर्तिधारिणी भगवतीको नमस्कार है ॥ ३४ ॥ |