भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 766
अ० ७ ]षष्ठ स्कन्ध७५७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यदयं निहतः शत्रुर्वञ्चयित्वातिसाहसात् ।<br>को नाम वचनं दत्त्वा विपरीतमथाचरेत् ॥ २९<br>विना शक्रं हरिं वापि यथायं विनिपातितः ।<br>एवंविधाः कथाश्चान्याः समाजेष्वभवन्भृशम् ॥ ३०मार डाला। वचन देकर भी जिस प्रकार [छलपूर्वक] यह वृत्रासुर मारा गया, वैसा विपरीत आचरण इन्द्र और विष्णुके अतिरिक्त कौन होगा, जो कर सकता है ! इस प्रकारकी कथाएँ तथा और भी बातें लोगोंमें व्यापक रूपसे होने लगीं ॥ २८–३० ॥
शुश्रावेन्द्रोऽपि विविधाः स्वकीर्तेर्हानिकारकाः ।<br>यस्य कीर्तिर्हृता लोके धिक्कस्यैव कुजीवितम् ॥ ३१<br>यं दृष्ट्वा पथि गच्छन्तं शत्रुः स्मेरमुखो भवेत् ।<br>इन्द्रद्युम्नोऽपि राजर्षिः पतितः कीर्तिसंक्षयात् ॥ ३२<br>स्वर्गादकृतपापोऽसौ पापकृत्किं न पात्यते ।<br>स्वल्पेऽपराधेऽपि नृपो ययातिः पतितः किल ॥ ३३<br>नृपः कर्कटतां प्राप्तो युगानष्टादशैव तु ।<br>भृगुपत्नीशिरश्छेदाद्भगवान्हरिरच्युतः ॥ ३४<br>ब्रह्मशापात्पशोर्योनौ सञ्जातो मकरादिषु ।<br>विष्णुश्च वामनो भूत्वा याचनार्थं बलेर्गृहे ॥ ३५<br>गतः किमपरं दुःखं प्राप्नोति दुष्कृती नरः ।<br>रामोऽपि वनवासेषु सीताविरहजं बहु ॥ ३६<br>दुःखं च प्राप्तवान्घोरं भृगुशापेन भारत ।<br>तथेन्द्रोऽपि ब्रह्महत्याकृतं प्राप्य महद्भयम् ॥ ३७<br>न स्वास्थ्यं प्राप गेहेऽसौ सर्वसिद्धिसमन्विते ।<br>पौलोमी तं सभाहीनं दृष्ट्वा प्रोवाच वासवम् ॥ ३८<br>निःश्वसन्तं भयत्रस्तं नष्टसंज्ञं विचेतसम् ।<br>किं प्रभोऽद्य भयार्तोऽसि मृतस्ते दारुणो रिपुः ॥ ३९<br>का चिन्ता वर्तते कान्त तव शत्रुनिषूदन ।<br>कस्माच्छोचसि लोकेश निःश्वसन्नाकृतो यथा ॥ ४०<br>नान्योऽस्ति बलवाञ्छत्रुर्यैन चिन्तापरो भवान् ।इन्द्र भी अपनी कीर्ति नष्ट करनेवाली तरह-तरहकी बातें सुनते रहे। संसारमें जिसकी कीर्ति नष्ट हो गयी, उसके कलुषित जीवनको धिक्कार है। रास्तेमें जाते हुए ऐसे व्यक्तिको देखकर शत्रु हँस पड़ता है। राजर्षि इन्द्रद्युम्नने कोई पाप नहीं किया था फिर भी कीर्ति नष्ट हो जानेसे वे स्वर्गसे गिर गये थे; तब पाप करनेवाला कैसे नहीं गिरेगा ? राजा ययातिका बहुत थोड़ेसे अपराधपर पतन हो गया था। इसी प्रकार एक राजाको अठारह युगोंतक केकड़ेकी योनिमें रहना पड़ा था। भृगुकी पत्नीका मस्तक काटनेके कारण अच्युत भगवान् श्रीहरिको ब्रह्मशापसे मकर आदि रूपोंमें पशुयोनिमें जन्म लेना पड़ा। विष्णुको भी वामन होकर याचनाके लिये बलिके घर जाना पड़ा; तब यदि कुकर्मी मनुष्य दुःख पाये तो क्या आश्चर्य है ! हे भारत! श्रीरामचन्द्रजीको भी भृगुके शापसे वनवासकालमें सीतासे वियोगका महान् कष्ट उठाना पड़ा। उसी प्रकार इन्द्रको भी ब्रह्महत्याजनित महान् भय प्राप्त करके समस्त सिद्धियोंसे युक्त भवनमें भी सुख नहीं प्राप्त होता था। उन्हें दीर्घ श्वास लेते, भयग्रस्त, चेतनारहित, खिन्नमनस्क और सभामें न जाते देखकर शचीने पूछा—हे प्रभो! आजकल आप भयभीत क्यों रहते हैं, आपका भयंकर शत्रु तो मर गया है। हे कान्त! हे शत्रुहन्ता! आपको क्या चिन्ता है? हे लोकेश! साधारण मनुष्यकी भाँति लम्बी-लम्बी साँसें लेते हुए आप शोक क्यों करते हैं? आपका कोई बलवान् शत्रु भी तो नहीं है, जिससे आप चिन्ताकुल हों ॥ ३१–४० ½ ॥
इन्द्र उवाच<br>नारातिर्बलवान्मेऽस्ति न शान्तिर्न सुखं तथा ॥ ४१<br>ब्रह्महत्याभयाद्राज्ञि बिभेमि सततं गृहे ।<br>न नन्दनं सुखकरं नामृतं न गृहं वनम् ॥ ४२**इन्द्र बोले—**हे राज्ञि! यद्यपि अब मेरा कोई बलवान् शत्रु नहीं है तथापि ब्रह्महत्याके भयसे मैं निरन्तर डरता रहता हूँ। घरमें रहते हुए भी मुझे न सुख है और न शान्ति। नन्दनवन, अमृत, घर तथा वन—कुछ भी मुझे सुखकर नहीं लगता। गन्धर्वोंका