देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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८४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २४
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स्मृतमात्रस्तु मात्रा वै ज्ञात्वा भावं मनोगतम्।<br>तरसैवागतश्चाहं नगरं नागसाह्वयम्॥ ३५<br><br>प्रणम्य मातरं मूर्ध्ना संस्थितोऽथ कृताञ्जलिः।<br>तामब्रुवं सुतप्ताङ्गीं पुत्रशोकेन कर्शिताम्॥ ३६ | इस प्रकार माताके स्मरण करते ही उनके मनोगत भावको जानकर शीघ्र ही मैं हस्तिनापुरमें आ गया। सिर झुकाकर माताको प्रणाम करके मैं हाथ जोड़कर उनके समक्ष खड़ा हो गया और पुत्रशोकके कारण अत्यन्त दुर्बल तथा तप्त अंगोंवाली उन मातासे मैंने कहा—॥ ३५-३६॥ |
| मातस्त्वया किमाहूतो मनसाहं तपस्विनि।<br>आज्ञापय महत्कार्यं दासोऽस्मि करवाणि किम्॥ ३७ | हे माता! आपने अपने मनमें स्मरण करके यहाँ मुझे किसलिये बुलाया है? हे तपस्विनि! बड़े-से-बड़े कार्यके लिये मुझे आदेश दीजिये; मैं आपका दास हूँ, मैं क्या करूँ?॥ ३७॥ |
| त्वं मे तीर्थं परं मातर्देवश्च प्रथितः परः।<br>आगतश्चिन्तितश्चात्र ब्रूहि कृत्यं तव प्रियम्॥ ३८ | हे माता! मेरा परम तीर्थ तथा महान् परम देव आप ही हैं। आपके स्मरण करते ही मैं यहाँ उपस्थित हो गया हूँ। अब आप अपना प्रिय कार्य बताइये॥ ३८॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वाहं स्थितस्तत्र मातुरग्रे यदा मुने।<br>तदा सा मामुवाचेदं पश्यन्ती भीष्ममन्तिके॥ ३९ | व्यासजी बोले—हे मुने! ऐसा कहकर जब मैं माताके आगे खड़ा हो गया तब पास ही बैठे हुए भीष्मको देखती हुई वे मुझसे यह कहने लगीं॥ ३९॥ |
| पुत्र तेऽद्य मृतो भ्राता पीडितो राजयक्ष्मणा।<br>तेनाहं दुःखिता जाता वंशच्छेदभयादिह॥ ४० | हे पुत्र! राजयक्ष्मा रोगसे ग्रस्त होकर तुम्हारे भाई विचित्रवीर्य मृत्युको प्राप्त हो गये हैं। अतएव वंशके नष्ट होनेके भयसे मैं दुःखी हूँ॥ ४०॥ |
| तस्मात्त्वमद्य मेधाविन् मयाहूतः समाधिना।<br>गाङ्गेयस्य मतेनात्र पाराशर्यार्थसिद्धये॥ ४१ | हे प्रतिभाशाली पराशरनन्दन! इसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिये मैंने भीष्मके परामर्शसे समाधिद्वारा तुम्हें यहाँ बुलाया है॥ ४१॥ |
| कुलं स्थापय नष्टं त्वं शन्तनोर्नामकारणात्।<br>रक्ष मां दुःखतः कृष्ण वंशच्छेदोद्भवाद् द्रुतम्॥ ४२ | इस नष्ट होते हुए वंशको तुम स्थापित करो, जिससे महाराज शन्तनुका नाम बना रहे। हे द्वैपायन कृष्ण! वंशच्छेदजन्य दुःखसे मेरी शीघ्र रक्षा करो॥ ४२॥ |
| काशिराजसुते भार्ये भ्रातुस्तव यवीयसः।<br>साधोर्विचित्रवीर्यस्य रूपयौवनभूषिते॥ ४३ | तुम्हारे सदाचारी लघुभ्राता विचित्रवीर्यकी रूप-यौवनसम्पन्न दो भार्याएँ हैं, जो काशिराजकी पुत्रियाँ हैं॥ ४३॥ |
| ताभ्यां सङ्गम्य मेधाविन् पुत्रोत्पादनकं कुरु।<br>रक्षस्व भारतं वंशं नात्र दोषोऽस्ति कर्हिचित्॥ ४४ | हे मेधाविन्! उन दोनोंके साथ संसर्ग करके तुम पुत्र उत्पन्न करो, भरतवंशकी रक्षा करो; इसमें कोई दोष नहीं है॥ ४४॥ |
| व्यास उवाच<br>इति मातुर्वचः श्रुत्वा जातंश्चिन्तातुरो ह्यहम्।<br>लज्जयाकुलचित्तस्तामब्रुवं विनयानतः॥ ४५ | व्यासजी बोले—[हे नारद!] माताका यह वचन सुनकर मैं चिन्तामें पड़ गया और लज्जासे व्याकुल मनवाला होकर मैंने उनसे विनयपूर्वक कहा—हे माता! |