भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| अ० २५ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८४७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कुपितोऽहं तदा दृष्ट्वा कामिनीं निशि सङ्गताम्।<br>वेपमानां स्थितां पार्श्वे ह्यब्रुवं तामहं रुषा॥ ८<br><br>दृष्ट्वा मां यदि गर्वेण पाण्डुवर्णा समावृता।<br>अतस्ते तनयः पाण्डुर्भविष्यति सुमध्यमे॥ ९तत्पश्चात् रात्रिमें सम्पर्कके लिये आयी हुई उस सुन्दरीको अपने पासमें बैठी देखकर मैं कुपित हो गया और रोषपूर्वक बोला—सुमध्यमे! मुझे देखकर यदि तुम अभिमानसे पीली पड़ गयी हो तो तुम्हारा पुत्र भी पीतवर्णका होगा॥ ८-९॥
इत्युक्त्वा निशि तत्रैव स्थितोऽम्बालिकया युतः।<br>भुक्त्वा तां निशि निर्यातः स्थानमापृच्छ्य मातरम्॥ १०ऐसा कहकर मैं उस अम्बालिकाके साथ रातभर वहीं रहा और फिर मातासे आज्ञा लेकर अपने आश्रमके लिये प्रस्थित हो गया॥ १०॥
ततस्ताभ्यां सुतौ काले प्रसूतावन्धपाण्डुरौ।<br>धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च प्रथितौ सम्बभूवतुः॥ ११तदनन्तर समय आनेपर उन दोनोंने अन्धे तथा पाण्डुवर्णके दो पुत्र उत्पन्न किये। वे दोनों धृतराष्ट्र तथा पाण्डु नामसे प्रसिद्ध हुए॥ ११॥
माता मे विमना जाता तादृशौ वीक्ष्य तौ सुतौ।<br>ततः संवत्सरस्यान्ते मामाहूय तदाब्रवीत्॥ १२<br><br>द्वैपायन सुतौ जातौ राज्ययोग्यौ न तादृशौ।<br>अन्यं मनोहरं पुत्रं समुत्पादय मे प्रियम्॥ १३उन दोनों राजकुमारोंको इस प्रकारका देखकर मेरी माता खिन्नमनस्क हो गयीं। तत्पश्चात् एक वर्षके अनन्तर मुझे बुलाकर उन्होंने कहा—हे द्वैपायन! इस प्रकारके दोनों पुत्र राज्य करनेके योग्य नहीं हैं, अतएव तुम एक अन्य मनोहर पुत्र उत्पन्न करो, जो मुझे अत्यन्त प्रिय हो॥ १२-१३॥
तथेति सा मया प्रोक्ता मुदिता जननी तदा।<br>अम्बिकां प्रार्थयामास सुतार्थे काल आगते॥ १४<br><br>पुत्रि व्यासं समालिङ्ग्य पुत्रमुत्पादयाद्भुतम्।<br>कुरुवंशस्य कर्तारं राज्ययोग्यं वरानने॥ १५'वैसा ही होगा'—मेरे इस प्रकार कहनेपर माता अत्यन्त प्रसन्न हो गयीं। इसके बाद ऋतुकाल आनेपर माताने पुत्रहेतु अम्बिकासे प्रार्थना की—हे पुत्रि! हे सुमुखि! व्यासके साथ समागम करके तुम कुरुवंश चलानेवाला तथा राज्य करनेयोग्य एक अद्वितीय पुत्र उत्पन्न करो॥ १४-१५॥
वधूर्लज्जान्विता किञ्चिन्नोवाच वचनं तदा।<br>गतोऽहं शयनागारे मातुस्तद्वचनान्निशि॥ १६उस समय लज्जासे युक्त वधू अम्बिकाने कुछ भी नहीं कहा और मैं माताकी वह बात मानकर रातमें शयनागारमें चला गया॥ १६॥
दासी विचित्रवीर्यस्य रूपयौवनसंयुता।<br>प्रेषिताम्बिकया तत्र विचित्राभरणाम्बरा॥ १७तत्पश्चात् अम्बिकाने विचित्रवीर्यकी रूप-यौवनसम्पन्न दासीको सुन्दर आभूषण तथा वस्त्र पहनाकर मेरे पास भेज दिया॥ १७॥
चन्दनारक्तदेहा सा पुष्पमालाविभूषिता।<br>आयाता हावसंयुक्ता सुकेशी हंसगामिनी॥ १८शरीरपर चन्दन लगाये, फूलकी मालाओंसे विभूषित तथा सुन्दर केशोंवाली वह सुन्दरी हंसकी भाँति मन्द-मन्द चलती हुई बड़े हाव-भावसे मेरे पास आयी॥ १८॥
पर्यङ्के मां समावेश्य संस्थिता प्रेमसंयुता।<br>प्रसन्नोऽहं तदा तस्या विलासेनाभवं मुने॥ १९मुझे पलंगपर बैठाकर वह भी प्रेमपूर्वक मेरे पास बैठ गयी। हे मुने! उसके इस प्रेमपूर्ण हाव-भावसे मैं अत्यन्त प्रसन्न हुआ॥ १९॥