देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 858, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 858
अ० २५] षष्ठ स्कन्ध ८४९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| कुन्ती माद्री सुरूपे द्वे भार्ये तस्य बभूवतुः।<br>शूरसेनसुता कुन्ती मद्रराजसुतापरा ॥ ३१ | तत्पश्चात् सुन्दर रूपवाली कुन्ती तथा माद्री उनकी दो भार्याएँ हुईं। उनमें कुन्ती महाराज शूरसेनकी पुत्री थी तथा दूसरी रानी माद्री मद्रदेशके राजाकी कन्या थी ॥ ३१ ॥ |
| स शापं द्विजतः प्राप्य कामिनीद्वयसंयुतः।<br>पाण्डुर्निर्वेदमापन्नस्त्यक्त्वा राज्यं वनं गतः ॥ ३२ | ब्राह्मणसे शाप प्राप्त करके राजा पाण्डु अत्यन्त दुःखित हुए और वे राज्यका परित्याग करके अपनी दोनों रानियोंके साथ वन चले गये ॥ ३२ ॥ |
| तदा मामाविशच्छोकः श्रुत्वा पुत्रं वने स्थितम्।<br>गतोऽहं तत्र यत्रासौ भार्याभ्यां सह संस्थितः ॥ ३३ | अपने पुत्रको वनमें स्थित सुनकर मुझे महान् शोक हुआ। मैं वहाँ पहुँच गया, जहाँ वे अपनी दोनों पत्नियोंके साथ रह रहे थे ॥ ३३ ॥ |
| तमाश्वास्य वने पाण्डुं पुनः प्राप्तो गजाह्वये।<br>धृतराष्ट्रं समाभाष्य ह्यगमं ब्रह्मजातटे ॥ ३४ | वनमें उन पाण्डुको सान्त्वना देकर मैं पुनः हस्तिनापुर आ गया और वहाँ धृतराष्ट्रके साथ बातचीत करके सरस्वतीनदीके तटपर पुनः चला गया ॥ ३४ ॥ |
| क्षेत्रजान्यञ्चपुत्रान्स समुत्पाद्य वनाश्रमे।<br>धर्मतो वायुतः शक्रादश्विभ्यां पञ्च पाण्डवान् ॥ ३५<br><br>युधिष्ठिरो भीमसेनस्तथैवार्जुन इत्यपि।<br>कुन्तीपुत्राः समाख्याता धर्मानिलसुरेशजाः ॥ ३६<br><br>नकुलः सहदेवश्च मद्रराजसुतासुतौ। | वनमें अपने आश्रममें उन्होंने धर्म, वायु, इन्द्र तथा दोनों अश्विनीकुमारोंसे पाँच क्षेत्रज पुत्रोंको पाँच पाण्डवोंके रूपमें उत्पन्न कराया। धर्म, वायु तथा इन्द्रसे उत्पन्न हुए युधिष्ठिर, भीमसेन तथा अर्जुन—ये कुन्तीपुत्र कहे गये हैं। इसी तरह नकुल तथा सहदेव—ये दोनों माद्रीके पुत्र हुए ॥ ३५-३६ १/२ ॥ |
| कदाचित्तु रहो माद्रीं समालिङ्ग्य महीपतिः ॥ ३७<br><br>मृतः शापात्तु मुनिभिः संस्कृतो हुतभुङ्मुखे।<br>माद्री तत्र सती भूत्वा प्रविष्टा पतिना सह ॥ ३८<br><br>स्थिता पुत्रयुता कुन्ती ज्वलिते जातवेदसि।<br>मुनयः सुतसंयुक्तां शूरसेनसुतां तदा ॥ ३९<br><br>दुःखितां पतिहीनां तामानिन्युर्गजसाह्वये।<br>समर्पिताथ भीष्माय विदुराय महात्मने ॥ ४०<br><br>श्रुत्वाहं सुखदुःखाभ्यां पीडितस्तु परात्मभिः। | एक दिन महाराज पाण्डु एकान्तमें माद्रीका आलिंगन करके पूर्वशापके कारण मृत्युको प्राप्त हो गये। तत्पश्चात् मुनियोंने उनका दाह-संस्कार किया और माद्री सती होकर पतिके साथ प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट हो गयी और पुत्रोंसे युक्त कुन्ती वहीं स्थित रह गयी। तत्पश्चात् मुनिलोग पतिविहीन उस दुःखित शूरसेन-पुत्री कुन्तीको उसके पुत्रोंसहित हस्तिनापुर ले आये और उसे भीष्म तथा महात्मा विदुरको सौंप दिया। यह सुनकर मैं उन पाण्डुपुत्रोंके कारण सुख-दुःखसे पीड़ित हो गया। |
| भीष्मेण पालिताः पुत्राः पाण्डोरिति विचिन्त्य ते ॥ ४१<br><br>विदुरेण तथा प्रीत्या धृतराष्ट्रेण धीमता।<br>दुर्योधनादयस्तस्य पुत्रा ये क्रूरमानसाः ॥ ४२<br><br>एकत्र स्थितिमापन्ना विरोधं चक्रुरद्भुतम्।<br>द्रोणाचार्यस्तु सम्प्राप्तस्तत्र भीष्मेण मानितः ॥ ४३<br>अध्यापनाय पुत्राणां पुरे तस्मिन्निवासितः। | पाण्डुके ये पुत्र हैं—ऐसा सोचकर भीष्म, मतिमान् विदुर तथा धृतराष्ट्र प्रेमपूर्वक उनका पालन-पोषण करने लगे ॥ ३७-४१ १/२ ॥<br><br>धृतराष्ट्रके दुर्योधन आदि जो क्रूर हृदयवाले पुत्र थे, वे एक समूह बनाकर उनका घोर विरोध करने लगे। तत्पश्चात् द्रोणाचार्य वहाँ आये और भीष्मने उनका सम्मान किया। उन्होंने पुत्रोंको धनुर्विद्याकी शिक्षा देनेके लिये उन्हें उसी पुरमें रख लिया ॥ ४२-४३ १/२ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—28 A