भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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८५४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २६

| स्नानायोष्णजलं मह्यं पर्वताय च शीतलम्।<br>दधि मह्यं तथा तक्रं पर्वतायाप्यकल्पयत्॥ २६ | स्नानके लिये मुझे उष्ण जल तथा पर्वतमुनिके लिये शीतल जल और इसी प्रकार मेरे लिये दही तथा पर्वतमुनिके लिये मट्ठेकी व्यवस्था करती थी॥ २६॥ | | शयनास्तरणं शुभ्रं मदर्थे पर्यकल्पयत्।<br>प्रीत्या परमया यद्वत्पर्वताय न तादृशम्॥ २७ | वह मेरे लिये अत्यन्त प्रेमपूर्वक जैसा धवल आस्तरण (बिछौना) बिछाती थी, वैसा पर्वतके लिये नहीं॥ २७॥ | | विलोकयति मां प्रेम्णा सुन्दरी न च पर्वतम्।<br>ततोऽस्यास्तादृशं दृष्ट्वा पर्वतः प्रेमकारणम्॥ २८<br><br>मनसा चिन्तयामास किमेतदिति विस्मितः।<br>पप्रच्छ मां रहः सम्यग्ब्रूहि नारद सर्वथा॥ २९<br><br>राजपुत्री त्वयि प्रेम करोति मुदिता भृशम्।<br>ददाति भक्ष्यभोज्यानि स्नेहयुक्ता समन्ततः॥ ३०<br><br>न तथा मयि भेदोऽत्र सन्देहं जनयत्यसौ।<br>मन्यते त्वां पतिं कर्तुं सर्वथा सञ्जयात्मजा॥ ३१ | वह सुन्दरी मुझे अत्यन्त प्रेमपूर्ण भावसे देखती थी, किंतु पर्वतमुनिको नहीं। तब मुनि पर्वत उस प्रकारका प्रेम-भेद देखकर मन-ही-मन विस्मित होकर सोचने लगे कि ऐसा क्यों हो रहा है? एकान्तमें उन्होंने मुझसे पूछा—हे नारद! मुझे भलीभाँति बताइये, यह राजकुमारी अत्यन्त प्रसन्न होकर आपसे अत्यधिक प्रेम करती है और स्नेहयुक्त होकर आपको नानाविध भोज्य-पदार्थ देती है, किंतु वैसा मेरे साथ नहीं करती है; यह भेद-भाव मेरे मनमें सन्देह उत्पन्न कर रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि राजा संजयकी पुत्री आपको निश्चय ही पति बनाना चाहती है॥ २८-३१॥ | | तवापि तादृशं भावं जानामि लक्षणैरहम्।<br>नेत्रवक्त्रविकारैश्च ज्ञायते प्रीतिकारणम्॥ ३२ | आपकी चेष्टाओंसे आपका भी वैसा ही भाव मुझे परिलक्षित हो रहा है; क्योंकि नेत्र तथा मुखके विकारोंसे प्रेमके कारणका पता चल जाता है॥ ३२॥ | | सत्यं वद न ते मिथ्या वक्तव्यं वचनं मुने।<br>स्वर्गतः समयं कृत्वा चलितौ संस्मराधुना॥ ३३ | हे मुने! सच-सच कहिये। मिथ्या वचन मत बोलिये। स्वर्गसे प्रस्थान करते समय हम दोनोंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे इस समय याद कीजिये॥ ३३॥ | | नारद उवाच<br>पृष्टोऽहं पर्वतेनेदं कारणं तु हठाद्यदा।<br>तदाहं ह्रीसमाक्रान्तः सञ्जातश्चाब्रुवं पुनः॥ ३४<br><br>पर्वतैषा विशालाक्षी पतिं मां कर्तुमुद्यता।<br>ममापि मानसो भावो वर्ततेऽस्यां विशेषतः॥ ३५ | **नारदजी बोले—**जब पर्वतमुनिने हठपूर्वक इसका कारण मुझसे पूछा तब मैं अत्यन्त लज्जित हो गया और पुनः बोला—हे पर्वत! विशाल नयनोंवाली यह राजकुमारी मुझे पति बनानेके लिये उद्यत है और उसके प्रति मेरे भी मनमें विशेष अनुराग भाव उत्पन्न हो गया है॥ ३४-३५॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं सत्यं पर्वतः कोपसंयुतः।<br>मामुवाच मुनिर्वाक्यं धिग्धिगिति पुनः पुनः॥ ३६<br><br>प्रथमं शपथान्कृत्वा वञ्चितोऽहं त्वया यतः।<br>भव वानरवक्त्रस्त्वं शापाच्च मम मित्रध्रुक्॥ ३७ | मेरा यह सत्य वचन सुनकर पर्वतमुनि कुपित हो उठे और उन्होंने मुझसे कहा, ‘तुम्हें बार-बार धिक्कार है; क्योंकि प्रतिज्ञा करके पहले तुमने मुझे धोखा दिया है, अतएव हे मित्रद्रोही! मेरे शापसे तुम अभी बन्दरके मुखवाले हो जाओ’॥ ३६-३७॥ | | इति शप्तस्तु तेनाहं कुपितेन महात्मना।<br>सहसा ह्यभवं क्रूरः शाखामृगमुखस्तदा॥ ३८ | उस कुपित महात्मा पर्वतके ऐसा शाप देते ही मैं तत्काल भयंकर बन्दरकी मुखाकृतिवाला हो गया॥ ३८॥ |