भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 865, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 865
८५६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २७

| विवाहं विधिवत्पुत्र्याः करोमि किल साम्प्रतम्॥ ५० | पराक्रमी, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा सभीके लिये श्रेष्ठ हो। उसके साथ मैं अपनी पुत्रीका विधिवत् विवाह अभी कर दूँगा॥ ४८—५०॥ | | प्रधानस्त्वब्रवीद्राजन् राजपुत्रा ह्यनेकशः।<br>वर्तन्ते भुवि पुत्र्यास्ते योग्याः सर्वगुणान्विताः॥ ५१ | इसपर प्रधान सचिवने कहा—हे राजन्! आपकी कन्याके अनुरूप बहुतसे योग्य तथा सर्वगुणसम्पन्न राजकुमार इस पृथ्वीपर विद्यमान हैं॥ ५१॥ | | यस्मिन् रुचिस्ते राजेन्द्र समाहूय नृपात्मजम्।<br>देहि कन्यां धनं भूरि हस्त्यश्वरथसंयुतम्॥ ५२ | हे राजेन्द्र! जिसमें आपकी रुचि हो, उस राजपुत्रको बुलाकर बहुत-से हाथी, घोड़े, रथ और धनसहित अपनी कन्या उसे प्रदान कर दीजिये॥ ५२॥ | | नारद उवाच<br>पितुश्चिकीर्षितं ज्ञात्वा दमयन्ती तदा नृपम्।<br>धात्र्या मुखेन वाक्यज्ञा तमुवाच रहः स्थितम्॥ ५३ | नारदजी बोले—बातचीतमें परम कुशल दमयन्तीने पिताका अभिप्राय समझकर अपनी धायके मुखसे एकान्तमें स्थित राजासे कहलाया॥ ५३॥ | | धात्र्युवाच<br>दमयन्ती महाराज पुत्री ते मामथाब्रवीत्।<br>पितरं ब्रूहि धात्रेयि वचनान्मे सुखान्वितम्॥ ५४ | धात्रीने कहा—हे महाराज! आपकी पुत्री दमयन्तीने मुझसे ऐसा कहा है—हे धात्रेयि! तुम मेरे वचनसे मेरे पिताजीसे यह सुखकर बात कह दो— | | मया वृतोऽथ मेधावी नारदो महतीयुतः।<br>नादमोहितया कामं नान्यः कोऽपि प्रियो मम॥ ५५ | नादसे मोहित मैं महती वीणा धारण करनेवाले प्रतिभासम्पन्न नारदका वरण कर चुकी हूँ; अन्य कोई भी मुझे प्रिय नहीं है॥ ५४-५५॥ | | कुरु मे वाञ्छितं तात विवाहं मुनिना सह।<br>नान्यं वरिष्ये धर्मज्ञ नारदं तु पतिं विना॥ ५६ | हे तात! आप मेरी इच्छाके अनुरूप मुनिके साथ मेरा विवाह कर दीजिये। हे धर्मज्ञ! मैं नारदको छोड़कर किसी दूसरेको अपना पति नहीं बनाऊँगी॥ ५६॥ | | मग्नाहं नादसिन्धौ वै नक्रहीने रसात्मके।<br>अक्षारे सुखसम्पूर्णे तिमिङ्गिलविवर्जिते॥ ५७ | अब मैं घड़ियाल तथा भयंकर मत्स्य आदि जन्तुओंसे शून्य, खारेपनसे रहित, सुखसे परिपूर्ण एवं रसमय नादसिन्धुमें निमग्न हो गयी हूँ॥ ५७॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे दमयन्तीविवाहप्रस्ताववर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः॥ २६॥


अथ सप्तविंशोऽध्यायः

वानरमुख नारदसे दमयन्तीका विवाह, नारद तथा पर्वतका परस्पर शापमोचन

| नारद उवाच<br>तत्पुत्र्या वचनं श्रुत्वा राजा धात्रीमुखात्ततः।<br>भार्यां प्रोवाच कैकेयीं समीपस्थां सुलोचनाम्॥ १ | नारदजी बोले—धात्रीके मुखसे अपनी कन्याका वह वचन सुनकर राजा संजय पास ही बैठी सुन्दर नेत्रोंवाली अपनी भार्या कैकेयीसे कहने लगे—॥ १॥ | | राजोवाच<br>यदुक्तं वचनं कान्ते धात्र्या तत्तु त्वया श्रुतम्।<br>वृतोऽयं नारदः कामं मुनिर्वानरवक्त्रभाक्॥ २ | राजा बोले—हे प्रिये! धात्रीने जो बात कही है, वह तो तुमने सुन ही ली। बन्दरके समान मुखवाले नारदमुनिका उसने वरण कर लिया है॥ २॥ | | किमिदं चिन्तितं पुत्र्या बुद्धिहीनं विचेष्टितम्।<br>कथमस्मै मया देया कन्या हरिमुखाय सा॥ ३ | पुत्रीने यह कैसा मूर्खतापूर्ण कार्य सोच लिया। इस वानरमुख मुनिको मैं अपनी कन्या कैसे दे दूँ?॥ ३॥ |