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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन

DevanagariHindipublished213 pages
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२५।२० ] भिक्खुवग्गो [ १६७ जेतवन पाँच सौ भिक्षु ३७७-वस्सिका विय पुप्फानि मद्दवानि पमुञ्चति । एवं रागञ्च दोसञ्च विप्पमुञ्चेथ भिक्खवो ॥१८॥ ( वर्षिका इव पुष्पाणि मर्दितानि प्रमुंचति । एवं रागं च द्वेषं च विप्रमुंचत भिक्षवः ॥१८॥ अनुवाद—जैसे जूही कुम्हलाये फूलोंको छोड़ देती है, वैसे ही हे भिक्षुओ ! ( तुम ) राग और द्वेषको छोड़ दो । जेतवन ( शान्तकाय थेर ) ३७८-सन्तकायो सन्तवाचो सन्तवा सुसमाहितो । वन्तलोकामिसो भिक्खू उपसन्तो 'ति वुच्चति ॥१९॥ (शान्तकायो शान्तवाक् शान्तिमान् सुसमाहितः । वान्तलोकाऽऽमिषो भिक्षुः 'उपशान्त' इत्युच्यते ॥१९॥ अनुवाद—काया (और) बचनसे शान्त, भली प्रकार समाधियुक्त, शान्ति सहित (तथा) लोकके आमिषको वमन कर दिये हुए भिक्षुको 'उपशान्त' कहा जाता है । जेतवन लङ्कगूल (थेर) ३७६-अत्तना चोदय'त्तानं पटिवासे अत्तमत्तना । सो अत्तगुत्तो सतिमा सुखं भिक्खू विहाहिसि ॥२०॥ ( आत्मना चोदयेदात्मानं प्रतिवसेदात्मानं आत्मना । स आत्मगुप्तः स्मृतिमान् सुखं भिक्षो! विहरिष्यसि ॥२०

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१६८ ] धम्मपदं [ २५।२३ अनुवाद—(जो) अपने ही आपको प्रेरित करेगा, अपने ही आपको संलग्न करेगा; वह आत्म-गुप्त (=अपने द्वारा रक्षित) स्मृति-संयुक्त भिक्षु सुखसे विहार करेगा ! ३८०—अत्ता हि अत्तनो नाथो अत्ता हि अत्तनो गति । ’ तस्मा सञ्ञममत्तानं अस्सं भद्रं'व वाणिजो ॥२१॥ (आत्मा ह्यात्मनो नाथ आत्मा ह्यात्मनो गतिः । तस्मात् संयमयात्मानं अश्वं भद्रमिव वणिक् ॥२१॥ अनुवाद—(मनुष्य) अपने ही अपना स्वामी है, अपने ही अपनी गति है; इसलिये अपनेको संयमी बनावे, जैसे कि सुन्दर घोड़ेको बनिया (संयत करता है) । राजगृह (वेणुवन) वक्कलि (थेर) ३८१—पामोज्जबहुलो भिक्खू पसन्नो बुद्धसासने । अधिगच्छे पदं सन्तं सङ्खारूपसमं सुखं ॥२२॥ (प्रामोद्यबहुलो भिक्षुः प्रसन्नो बुद्धशासने । अधिगच्छेत् पदं शान्तं संस्कारोपशमं सुखम् ॥२२॥ अनुवाद—बुद्धके उपदेशमें प्रसन्न बहुत प्रमोद्युक्त भिक्षु संस्कारोंको उपशमन करनेवाले सुखमय शान्त पदको प्राप्त करता है। श्रावस्ती (पूर्वाराम) सुमन (सामनेर) ३८२—यो ह वे दहरो भिक्खू युञ्जते । बुद्धसासने । सो इमं लोकं पभासेति अब्भा मुत्तो 'व चन्दिमा ॥२३॥

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२५।२३ ] भिक्खुवग्गो [ १६९ (यो ह वै दहरो भिक्खुयुंक्ते बुद्धशासने। स इमं लोकं प्रभासयत्यभ्रान् मुक्त इव चन्द्रमा ॥२३॥) अनुवाद—जो भिक्षु यौवनमें बुद्ध-शासन (=बुद्धोपदेश, बुद्ध-धर्म ) में संलग्न होता है, वह मेघसे मुक्त चन्द्रमाकी भाँति इस लोकको प्रकाशित करता है। २५–भिक्षुवर्ग समाप्त

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२६—ब्राह्मणवग्गो जेतवन ( एक बहुत श्रद्धालु ब्राह्मण ) ३८३-छिन्द सोतं परक्कम कामे पनुद ब्राह्मण ।। संखारानं खयं ञत्वा अकतञ्ञूसि ब्राह्मण ! ॥१॥ ( छिन्धि स्रोतः पराक्रम्य कामान् प्रणुद ब्राह्मण ! । संस्काराणां क्षयं ज्ञात्वाऽकृतज्ञोऽसि ब्राह्मण ! ॥१॥ ) अनुवाद—हे ब्राह्मण ! ( तृष्णा रूपी ) स्रोतको छिन्न करदे, पराक्रम कर, ( और ) कामनाओंको भगादे । संस्कृत (=कृत वस्तुओ, ५ उपादानस्कन्धो ) के विनाशको जानकर, तू अकृत (=न कृत, निर्वाण ) को पानेवाला हो जायेगा । जेतवन ( बहुतसे भिक्षु ) ३८४-यदा द्वयेसु धम्मेसु पारगू होति ब्राह्मणो । अथस्स सब्बे संयोगा अत्यं गच्छन्ति जानतो ॥२॥ ( यदा द्वयोर्धर्मयोः पारगो भवति ब्राह्मणः । अथाऽस्य सर्वे संयोगा अस्तं गच्छन्ति जानतः ॥२॥ ) १७० ]

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२६।४ ] ब्राह्मणवग्गो [ १७१ अनुवाद—जब ब्राह्मण दो धर्मों (—चित्त-संयम और भावना) में पारंगत हो जाता है, तब उस जानकारके सभी संयोग (=बंधन ) अस्त हो जाते हैं । जेतवन मार ३८५-यस्स पारं अपारं वा पारापारं न विज्जति । वीतद्दरं विसञ्जुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणम् ॥३॥ ( यस्य पारं अपारं वा पारापारं न विद्यते । वीतदरं विसंयुक्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३॥ ) अनुवाद—जिसके पार (=आँख, कान, नाक, जीभ, काया, मन ), अपार (=रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श, धर्म ) और पारापार (=मैं और मेरा ) नहीं हैं, ( जो ) निर्भय और अनासक्त है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । जेतवन ( कोई ब्राह्मण ) ३८६-झायिं विरजमासीनं कतकिच्चं अनासवं । उत्तमत्थं अनुप्पत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥४॥ ( ध्यायिनं विरजसमासीनं कृतकृत्यं अनास्रवम् । उत्तमार्थमनुप्राप्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥४॥ ) अनुवाद—( जो ) ध्यानी, निर्मल, आसनबद्ध (=स्थिर ), कृतकृत्य आस्रव (=चित्तमल)-रहित है, जिसने उत्तम अर्थ (=सत्य) को पा लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।

२४. तण्हावग्गो (तृष्णा वर्ग)

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१७२ ] धम्मपदं [ २६।६ श्रावस्ती ( पूर्वाराम ) आनन्द ( थेर ) ३८७-दिवा तपति आदिच्चो रत्तिं आभाति चन्दिमा । सन्नद्धो खत्तियो तपति झायी तपति ब्राह्मणो । अथ सब्बमहोरत्तिं बुद्धो तपति तेजसा ॥५॥ ( दिवा तपत्यादित्यो रात्रावाभाति चन्द्रमा । सन्नद्धः क्षत्रियस्तपति ध्यायी तपति ब्राह्मणः । अथ सर्वमहोरात्रं बुद्धस्तपति तेजसा ॥५॥ ) अनुवाद—दिनमें सूर्य तपता है, रातको चन्द्रमा प्रकाशता है, कवचबद्ध ( होनेपर ) क्षत्रिय तपता है, ध्यानी ( होनेपर ) ब्राह्मण तपता है, और बुद्ध रात-दिन ( अपने ) तेजसे सब- ( से अधिक ) तपता है । जेतवन ( कोई प्रव्रजित ) ३८८-वाहितपापो 'ति ब्राह्मणो समचरिया समणो'ति वुच्चति । पब्बाजयमत्तनो मलं तस्मा पब्बजितो'ति वुच्चति ॥६॥ ( वाहितपाप इति ब्राह्मणः समचर्य्यः श्रमण इत्युच्यते । प्राब्राजयन्नाऽऽत्मनो मलं तस्मात् प्रव्रजित इत्युच्यते ॥६॥ ) अनुवाद—जिसने पापको ( धोकर ) बहा दिया वह ब्राह्मण है, जो समताका आचरण करता है, वह समण (=श्रमण= संन्यासी ) है, ( चूँकि ) उसने अपने ( चित्त-) मलोको हटा दिया, इसीलिये वह प्रव्रजित कहा जाता है।

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२६।८ ब्राह्मणवग्गो [ १७३ जेतवन सारिपुत्त (थेर) ३८६-न ब्राह्मणस्स पहरेय्य नास्स मुंचेय ब्राह्मणो । धि ब्राह्मणस्स हन्तारं ततो धि यस्स मुञ्चति ॥७॥ (न ब्राह्मणं प्रहरेत् नाऽस्मै मुञ्चेद् ब्राह्मणः । धिग् ब्राह्मणस्य हन्तारं ततो धिग् यस्मै मुंचति ॥७॥ ) अनुवाद—ब्राह्मण (=निष्पाप) पर प्रहार नहीं करना चाहिये, और ब्राह्मणको भी उस (प्रहारदाता) पर (कोप) नहीं करना चाहिये, ब्राह्मणको जो मारता है, उसे धिक्कार है, और धिक्कार उसको भी है, जो (उसके लिये) कोप करता है। ३६०-न ब्राह्मणस्सेतदकिञ्चि सेय्यो यदा निषेधो मनसो पियेहि । यतो यतो हिंसमनो निवत्तति ततो ततो सम्मति एव दुक्खं ॥८॥ (न ब्राह्मणस्यैतद् अकिञ्चित् श्रेयो यदा निषेधो मनसा प्रियेभ्यः । यतो यतो हिंस्रमनो निवर्तते ततस्ततः शाम्यत्येव दुःखम् ॥८॥ ) अनुवाद—ब्राह्मणके लिये यह बात कम कल्याण(कारी) नहीं है, जो वह प्रिय (पदार्थों) से मनको हटा लेता है, जहाँ जहाँ मन हिंसासे मुड़ता है, वहाँ वहाँ दुःख (अवश्य) ही शान्त हो जाता है।

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१७४ ] धम्मपद [ २६।११ जेतवन महापजापती गोतमी ३६१-यस्स कायेन वाचाय मनसा नत्थि दुक्कतं । संवृतं तीहि ठानेहि तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥६॥ ( यस्य कायेन वाचा मनसा नाऽस्ति दुष्कृतम् । संवृतं त्रिभिः स्थानैः, तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥६॥) अनुवाद-जिसके मन वचन कायसे दुष्कृत (=पाप ) नहीं होते, ( जो इन ) तीनो ही स्थानोसे संवर (=संयम )-युक्त है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूं । जेतवन सारिपुत्त (थेर) ३६२-यम्हा धम्मं विजानेय्य सम्मासम्बुद्धदेसितं । सक्कचं तं नमस्सेय्य अग्गिहुतं 'व ब्राह्मणो ॥१०॥ ( यस्माद् धर्मं विजानीयात् सम्यक्-संबुद्ध-देशितम् । सत्कृत्य तं नमस्येद् अग्निहोत्रमिव ब्राह्मणः ॥१०॥) अनुवाद-जिस (उपदेशक ) से सम्यक्संबुद्ध (=बुद्ध ) द्वारा उपदिष्ट धर्मको जाने, उसे (वैसेही ) सत्कारपूर्वक नमस्कार करे, जैसे अग्निहोत्रको ब्राह्मण । जेतवन जटिल ब्राह्मण ३६३-न जटाहि न गोत्तेहि न जच्चा होति ब्राह्मणो । यम्हि सच्चञ्च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो ॥११॥ ( न जटाभिर्न गोत्रेर्न जात्या भवति ब्राह्मणः । यस्मिन् सत्यं च धर्मश्च स शुचिः स च ब्राह्मणः ॥११॥)

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२६।१३ ] ब्राह्मणवग्गो [ १७५ अनुवाद—न जटासे, न गोत्रसे; न जन्मसे ब्राह्मण होता है, जिसमें सच्य और धर्म हैं, वही, शुचि (=पवित्र ) है, और वही ब्राह्मण है । वैशाली ( कूटागारशाला ) ( पाखण्डी ब्राह्मण ) ३६४-किं ते जटाहि दुम्मेध ! किं ते अजिनसाटिया । अब्भन्तरं ते गहनं बाहिरं परिमज्जसि ॥१२॥ (किं ते जटाभिः दुर्भेध ! किं तेऽजिनशाट्या । आभ्यन्तरं ते गहनं बाहिः परिमार्जयसि ? ॥१२॥) अनुवाद—हे दुर्बुद्धि ! जटाओसे तेरा क्या (बनेगा), (और) मृग- चर्मके पहिननेसे तेरा क्या ? भीतर (दिल) तो तेरा (राग आदि मलोंसे) परिपूर्ण है, बाहर क्या धोता है ? राजगृह ( गृध्रकूट ) किसा गोतमी ३६५-पंसुकूलधरं जन्तुं किसं धमनिसन्थतं । एकं वनस्मिं झायन्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥१३॥ (पांशुकूलधरं जन्तुं कृशं धमनिसन्ततम् । एकं वने ध्यायन्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥१३॥) अनुवाद—जो प्राणी फटे चीथड़ोको धारण करता है, जो दुबला पतला और नसोंसे मढ़े शरीरवाला है, जो अकेला वनमें ध्यानरत रहता है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।

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२६।१७ ] ब्राह्मणवग्गो [ १७७ भय नहीं खाता, जो संग और आसक्तिसे विरत है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । जेतवन ( दो ब्राह्मण ) ३९८-छेत्वा नन्दिं वरत्तञ्च सन्दानं सहनुक्कमं । उक्खित्तपलिघं बुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥१६॥ ( छित्त्वा नन्दिं वरत्रां च सन्दानं सहनुक्रमम् । उत्क्षिप्तपरिघं बुद्धं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥१६॥ ) अनुवाद-नन्दी (=क्रोध), वरत्रा (=तृष्णा रूपी रस्सी), सन्दान (=६२ प्रकारके मतवादरूपी पगहे), और हनुक्रम (=मुँहपर बाँधनेके जावे)को काट एवं परिघ (=जूए)को फेंक जो बुद्ध (=ज्ञानी) हुआ, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । ` राजगृह (वेणुवन) ' ( अक्कोस) भारद्वाज ३९९-अक्कोसं वधबन्धञ्च अदुट्ठो यो तितिक्खति । खन्तिबलं बलानीकं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥१७॥ ( अक्रोशन् वध-बंधं च अदुष्टो यस्तितिक्षति । क्षान्तिबल बलानीकं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥१७॥ ) अनुवाद-जो विना दूषित (चित्त) किये गाली, वध और बंधनको सहन करता है, क्षमा बलही जिसके बल(=सेना) का सेनापति है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । १२

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२६।२३ ] ब्राह्मणवग्गो [ १७९ जान लेता है, जिसने अपने बोझको उतार फेंका, और जो आसक्तिरहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । राजगृह ( गृध्रकूट ) खेमा ( भिक्षुणी ) ४०३-गम्भीरपञ्ञं मेधाविं मग्गामग्गस्स कोविदं । उत्तमत्थं अनुप्पत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२१॥ ( गंभीरप्रज्ञं मेधाविनं मार्गामार्गस्य कोविदम् । उत्तमार्थमनुप्राप्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२१॥ अनुवाद-जो गम्भीर प्रज्ञावाला, मेधावी, मार्ग-अमार्गका ज्ञाता, उत्तम पदार्थ (=सत्य) को पाये है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । जेतवन ( पब्भारवासी ) तिस्स ( थेर ) ४०४-असंसट्ठं गहट्ठेहि अनागारेहि चूभयं । अनोकसारिं अप्पिच्छं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२२॥ ( असंसृष्टं गृहस्थैः, अनागारैश्चोभाभ्याम् । अनोकःसारिणं अल्पेच्छं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२२॥ अनुवाद-घरवाले (=गृहस्थ ) और बेघरवाले दोनों हीमें जो लिप्त नहीं होता, जो बिना ठिकानेके घूमता तथा बेचाह है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । जेतवन ( कोई भिक्षु ) ४०५-निधाय दण्डं भूतेसु तसेसु थावरेसु च । यो न हन्ति न घातेति तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२३॥

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१८० ] धम्मपदं [ २६।२५ (निधाय दण्डं भूतेषु त्रसेषु स्थावरेषु च । यो न हन्ति न घातयति तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२३॥) अनुवाद—चर-अचर ( सभी ) प्राणियोंमें प्रहारविरत हो, जो न मारता है, न मारनेकी प्रेरणा करता है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । जेतवन चार श्रामणेर ४०६-अविरुद्धं विरुद्धेसु अत्तदण्डेसु निब्बुतं । सादानेसु अनादानं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२४॥ ( अविरुद्धं विरुद्धेषु, आत्तदण्डेषु निवृत्तम् । सादानेष्वनादानं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२४॥) अनुवाद—जो विरोधियोंके बीच विरोधरहित रहता है, जो दंड- धारियोंके बीच ( दण्ड-)रहित है, सग्राहियोंमें जो सग्रहरहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । राजगृह ( वेणुवन ) महापन्थक ( थेर ) ४०७-यस्स रागो च दोसो च मानो मक्खो च पातितो । सासपोरिव आरग्गा तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२५॥ ( यस्य रागश्च द्वेषश्च मानो म्रक्षश्च पातितः । सर्षप इवाऽऽराग्रात् तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२५॥) अनुवाद—आरके ऊपर सरसोकी भांति, जिसके ( चित्तसे ) राग, द्वेष, मान, डाह, फेंक दिये गये हैं, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।

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२६।२८ ] ब्राह्मणवग्गो [ १८१ राजगृह ( वेणुवन ) पिळिन्द वच्छ ( थेर ) ४०८-अकक्कसं विञ्ञापनिं गिरं सच्चं उदीरये । याय नाभिसजे किञ्चि तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२६॥ ( अकर्कशां विज्ञापनीं गिरं सत्यां उदीरयेत् । यथा नाऽभिसजेत् किञ्चित् तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२६॥) अनुवाद-( जो इस प्रकार की ) अकर्कश, आदरयुक्त ( तथा ) सच्ची वाणीको बोले; कि, जिससे कुछ भी पीडा न होवे, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । जेतवन कोई स्थविर ४०६-यो 'ध दीघं वा रस्सं वा अणुं थूलं सुभासुभं । लोके अदिन्नं नादियते तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२७॥ ( य इह दीर्घं वा ह्रस्वं वाऽणुं स्थूलं शुभाऽशुभम् । लोकेऽदत्तं नादत्ते तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२७॥) अनुवाद-( चीज ) चाहे दीर्घ हो या ह्रस्व, मोटी हो या पतली, शुभ हो या अशुभ, जो संसारमें ( किसी भी ) बिना दी चीजको नहीं लेता, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । जेतवन सारिपुत्त ( थेर ) ४१०-आसा यस्स न विज्जन्ति अस्मिं लोके परम्हि च । निरासयं विसंयुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२८॥ ( आशा यस्य न विद्यन्तेऽस्मिन् लोके परस्मिन् च । निराशयं विसंयुक्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२८॥)

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[१८२ ] धम्मपदं [ २६।३०

अनुवाद—इस लोक और परलोकके विषयमें जिसकी आशायें (=चाह) नहीं रहगई हैं, जो आशारहित और आसक्तिरहित है, उसे , मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।

जेतवन महामोग्गलान (थेर) ४११—यस्सालया न विज्जन्ति अञ्ञाय अकथंकथी । अमतोगधं अनुपत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२६॥ (यस्याऽऽलया न विद्यन्त आज्ञायाऽकथंकथी । अमृतावगाधमनुप्राप्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२९॥) अनुवाद—जिसको आलय (=तृष्णा) नहीं है, जो भली प्रकार जानकर अकथ(-पद)का कहनेवाला है, जिसने गाढे अमृतको पालिया, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।

श्रावस्ती (पूर्वाराम) रेवत (थेर) ४१२—यो'ध पुञ्ञञ्च पापञ्च उभो सङ्गं उपच्चगा । असोकं विरजं सुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३०॥ (य इह पुण्यं च पापं चोभयोः संगं उपात्यगात् । अशोकं विरजं शुद्धं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३०॥) अनुवाद—जिसने यहाँ पुण्य और पाप दोनोंकी आसक्तिको छोड दिया, जो शोकरहित, निर्मल, (और) शुद्ध है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।

२५. भिक्खुवग्गो (भिक्षु वर्ग)

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२६।३२ ] ब्राह्मणवग्गो [ १८३ जेतवन चन्दाभ ( थेर ) ४१३–चन्दं'व विमलं सुद्धं विप्पसन्नमनाविलं । नन्दीभवपरिक्खीणं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३१॥ ( चन्द्रमिव विमलं शुद्धं विप्रसन्नमनाविलम् । नन्दीभवपरीक्षीaction? नन्दीभवपरीक्षीणं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३१॥ ) अनुवाद—जो चन्द्रमाकी भाँति विमल, शुद्ध, स्वच्छ=अनाविल है, ( तथा जिसकी ) सभी जन्मोंकी तृष्णा नष्ट हो गई है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । कुण्डिया ( कोलिय ) सीवलि ( थेर ) ४१४–यो इमं पळिपथं दुग्गं संसारं मोहमच्चगा । तिण्णो पारगतो झायी अनेजो अकथंकथी । अनुपादाय निब्बुतो तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३२॥ ( य इमं प्रतिपथं दुर्गं संसारं मोहमत्यगात् । तीर्णः पारगतो ध्याय्यनेजोऽकथंकथी । अनुपादाय निर्वृतः तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३२॥ ) अनुवाद—जिसने इस दुर्गम संसार, (=जन्म मरण )के चक्करमें डालने- वाले मोह( रूपी ) उलटे मार्गको त्याग दिया, जो ( संसारसे ) पारंगत, ध्यानी तथा तीर्ण (=तर गया ) है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।

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१८४ ] धम्मपदं [ २६।३५ जेतवन सुन्दर समुद्र ( थेर ) ४१५—यो 'ध कामे पहत्वान अनागारो परिव्वजे । कामभवपरिक्खीणं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३३॥ ( य इह कामान् प्रहायाऽनागारः परिव्रजेत् । कामभवपरिक्षीणं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३३॥ ) अनुवाद—जो यहाँ भोगोको छोड़, बेघर हो प्रव्रजित (=संन्यासी ) हो गया है, जिसके भोग और जन्म नष्ट हो गये, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । राजगृह ( वेणुवन ) जटिल ( थेर ) ४१६—यो'ध तण्हं पहत्वान अनागारो परिव्वजे । तण्हाभवपरिक्खीणं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३४॥ ( य इह तृष्णां प्रहायाऽनागारः परिव्रजेत् । तृष्णाभवपरिक्षीणं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३४॥ ) अनुवाद—जो यहाँ तृष्णाको छोड़, बेघर बन प्रव्रजित है, जिसकी तृष्णा और ( पुनर्-)जन्म नष्ट हो गये, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । राजगृह ( वेणुवन ) ( भूतपूर्व नट भिक्षु ) ४१७-हित्वा मानुसकं योगं दिब्वं योगं उपच्चगा । सब्बयोगविसंयुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३५॥ ( हित्वा मानुषकं योगं दिव्यं योगं उपात्यगात् । सर्वयोगविसंयुक्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३५॥ )

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२६।३८ ] ब्राह्मणवग्गो [ १८५ अनुवाद-मानुष(-भोगोंके) कामोंको छोड़, दिव्य (भोगोंके) कामको भी ( जिसने ) त्याग दिया, सारे ही कामोंमें जो आसक्त नहीं है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। ४१८-हित्वा रतिञ्च अरतिञ्च सीतीभूतं निरूपधिं । सब्बलोकाभिभुं वीरं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३६॥ (हित्वा रतिं चाऽरतिं च शीतीभूतं निरुपधिम् । सर्वलोकाऽभिभुवं वीरं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३६॥ ) अनुवाद-रति और अरति (=घृणा) को छोड़, जो शीतल-स्वभाव ( तथा ) क्लेशरहित है, ( जो ऐसा ) सर्वलोकविजयी, वीर है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । राजगह (वेणुवन) वङ्गीस (थेर) ४१९-चुतिं यो वेदि सत्तानं उपपत्तिञ्च सब्बसो । असत्तं सुगतं बुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३७॥ ( च्युतिं यो वेद सत्त्वानां, उपपत्तिं च सर्वशः । असक्तं सुगतं बुद्धं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३७॥ ) अनुवाद-जो प्राणियोंकी च्युति (=मृत्यु) और उत्पत्तिको भली प्रकार जानता है, (जो) आसक्तिरहित सुगत (=सुंदर गतिको प्राप्त) और बुद्ध (=ज्ञानी) है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । ४२०-यस्स गतिं न जानन्ति देवा गन्धव्वमानुसा । खीणासवं अरहन्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३८॥

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१८६ ] धम्मपदं [ २६।४० ( यस्य गतिं न जानन्ति देव-गंधर्व-मानुषाः । क्षीणास्रवं अरहन्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३८॥ ) अनुवाद—जिसकी गति(=पहुँच) को देवता, गंधर्व, और मनुष्य नहीं जानते, जो क्षीणास्रव (=रागादिरहित ) और अर्हत् है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । राजगृह ( वेणुवन ) धम्मदिन्ना ( थेरी ) ४२१-यस्स पुरे च पच्छा च मज्झे च नत्थि किञ्चनं । अकिञ्चनं अनादानं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३६॥ ( यस्य पुरश्च पश्चाच्च मध्ये च नाऽस्ति किंचन । अकिंचनं अनादानं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३९॥ ) अनुवाद— जिसके पूर्व, और पश्चात् और मध्यमें कुछ नहीं है, जो परिग्रहरहित=आदानरहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । जेतवन अङ्गुलिमाल ( थेर ) ४२२-उसभं पवरं वीरं महेसिं विजिताविनं । अनेजं नहातकं बुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥४०॥ ( ऋषभं प्रवरं वीर महर्षि विजितवन्तम् । अनेजं स्नातकं बुद्धं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥४०॥ ) अनुवाद—( जो ) ऋषभ (= श्रेष्ठ ), प्रवर, वीर, महर्षि, विजेता, अकम्प्य, स्नातक और बुद्ध है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।