भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

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हिन्दीटीकासमेता ७ अथ चापप्रमाणम् प्रथमं योगिकं चापं युद्धचापं द्वितीयकम् । निजबाहुबलोन्मानात्किंचिदूनं शुभं धनुः ॥३०॥ अब धनुष का प्रमाण कहते हैं, पहिले तो अभ्यास करने के लिये (योगिक) धनुष अर्थात् लेजम आदि जिससे बाहुबल बँधे और साधारण धनुष से निशाना आदि सीखना चाहिये, जैसे गुलेल आदि, फिर दूसरा सींग आदि का (युद्धचाप) अपने हाथों के बल के अनुमान से कुछ छोटा धनुष धारण करना श्रेष्ठ है॥३०॥ वरं प्राणाधिको धन्वी न तु प्राणाधिकं धनुः । धनुषा पीड्यमानस्तु धन्वी लक्ष्यं न पश्यति ॥३१॥ प्राणों से भी प्यारा धनुषधारी होता है, प्राणों से अधिक धनुष नहीं है, इस कारण ऐसे बल का धनुष धारण करे कि, जिससे सुखपूर्वक बाण फेंकता रहे, ऐसा बोझिल धनुष न धारण करे कि जिससे छाती फट जाय। क्योंकि धनुष से पीड़ित धनुषधारी लक्ष्य को भली भाँति नहीं ताक सकता, उसके ख