धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० धनुर्वेदसंहिता प्रायो योज्यं धनुःशार्ङ्गं गजारोहाश्वसादिनाम् । रथिनां च पदातीनां वांशं चापं प्रकीर्त्तितम् ॥४७॥ बहुत करके शार्ङ्ग धनुष हाथी के सवार और घोड़ों के सवारों को धारण करना चाहिये, रथियों और पैदलों को बांस का चाप धारण करना योग्य है॥४७॥ विश्वामित्र शृणुष्वाथ धनुर्द्रव्यत्रयं क्रमात् । लोहं शृंगं च काष्ठं च गदितं शंभुना पुरा ॥४८॥ हे विश्वामित्र! अब धनुष के तीन द्रव्य क्रम से सुनो, एक तो लोह, दूसरा सींग तीसरा काष्ठ का धनुष श्रीमहादेवजी ने कहे हैं॥४८॥ लोहानि स्वर्णरजतताम्रकृष्णायसानि । शृङ्गाणि महिषशरभरोहितानाम् । शरभोऽष्टपाच्चतुरूर्ध्वपादो महाविषाण उष्ट्रमितो वनस्थः काश्मीरदेशप्रसिद्धो मृगाख्यः । दारूणि चन्दनवेतसधान्वन शालशाल्मलि- साकककुभवंशांजनानाम् ॥४९॥ लोह का अर्थ, सोना, चांदी, तांबा और कालालोहा इस्पात, सींग भैंस का शरभ (रोही) मृग का जिसके आठ पैर होते हैं चार ऊपर को चार नीचे और बड़े २ सींग होते हैं ऊँट के समान ऊँचा होता है वन में रहने वाला काश्मीर देश में उसको सब जानते हैं और काठ ये ग्रहण करने चंदन, वेत, धान्वन, शाल, सेमल, साक, ककुभ और बांस तथा अंजन वृक्ष इतनी वस्तुओं का धनुष बनता है॥४९॥ अथ गुणलक्षणानि गुणानां लक्षणं वक्ष्ये यादृशं कारयेद्गुणम् । पट्टसूत्रो गुणः कार्यः कनिष्ठामानसंमितः ॥५०॥ धनुःप्रमाणो निःसंधिः शुद्धैस्त्रिगुणतन्तुभिः । वर्तितः स्याद्गुणः श्लक्ष्णः सर्व- कर्मसहो युधि ॥५१॥ अभावे पट्टसूत्रस्य हरिणीस्नायु- रिष्यते । गुणाथमाप च ग्राह्याः स्नायवो महिषीभवाः