धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
१० धनुर्वेदसंहिता प्रायो योज्यं धनुःशार्ङ्गं गजारोहाश्वसादिनाम् । रथिनां च पदातीनां वांशं चापं प्रकीर्त्तितम् ॥४७॥ बहुत करके शार्ङ्ग धनुष हाथी के सवार और घोड़ों के सवारों को धारण करना चाहिये, रथियों और पैदलों को बांस का चाप धारण करना योग्य है॥४७॥ विश्वामित्र शृणुष्वाथ धनुर्द्रव्यत्रयं क्रमात् । लोहं शृंगं च काष्ठं च गदितं शंभुना पुरा ॥४८॥ हे विश्वामित्र! अब धनुष के तीन द्रव्य क्रम से सुनो, एक तो लोह, दूसरा सींग तीसरा काष्ठ का धनुष श्रीमहादेवजी ने कहे हैं॥४८॥ लोहानि स्वर्णरजतताम्रकृष्णायसानि । शृङ्गाणि महिषशरभरोहितानाम् । शरभोऽष्टपाच्चतुरूर्ध्वपादो महाविषाण उष्ट्रमितो वनस्थः काश्मीरदेशप्रसिद्धो मृगाख्यः । दारूणि चन्दनवेतसधान्वन शालशाल्मलि- साकककुभवंशांजनानाम् ॥४९॥ लोह का अर्थ, सोना, चांदी, तांबा और कालालोहा इस्पात, सींग भैंस का शरभ (रोही) मृग का जिसके आठ पैर होते हैं चार ऊपर को चार नीचे और बड़े २ सींग होते हैं ऊँट के समान ऊँचा होता है वन में रहने वाला काश्मीर देश में उसको सब जानते हैं और काठ ये ग्रहण करने चंदन, वेत, धान्वन, शाल, सेमल, साक, ककुभ और बांस तथा अंजन वृक्ष इतनी वस्तुओं का धनुष बनता है॥४९॥ अथ गुणलक्षणानि गुणानां लक्षणं वक्ष्ये यादृशं कारयेद्गुणम् । पट्टसूत्रो गुणः कार्यः कनिष्ठामानसंमितः ॥५०॥ धनुःप्रमाणो निःसंधिः शुद्धैस्त्रिगुणतन्तुभिः । वर्तितः स्याद्गुणः श्लक्ष्णः सर्व- कर्मसहो युधि ॥५१॥ अभावे पट्टसूत्रस्य हरिणीस्नायु- रिष्यते । गुणाथमाप च ग्राह्याः स्नायवो महिषीभवाः
हिन्दीटीकासमेता ११ ॥५२॥ तत्कालहतच्छागस्य तन्तुना वा गुणाः शुभाः । निर्लोमतन्तुसूत्रेण कुर्याद्वा गुणमुत्तमम् ॥५३॥ पक्ववं- शत्वचः कार्यो गुणस्तु स्थावरो दृढः । पट्टसूत्रेण सन्नद्धः सर्वकर्मसहो युधि ॥५४॥ प्राप्ते भाद्रपदे मासि त्वगर्कस्य प्रशस्यते । तस्यास्तत्र गुणः कार्यो पवित्रः स्थावरो दृढः ॥५५॥गुणाः कार्याः सुमुञ्जानां भंगस्नाय्वर्कवर्मिणाम् । अब गुणों के लक्षण कहते हैं हे विश्वामित्र! अब जैसी गुण करनी चाहिये उस गुण के लक्षण कहते हैं रेशम के सूतकी गुण करनी चाहिये छोटी अंगुली के समान मोटी धनुष के प्रमाण के अनुपात से स्वच्छ साफ किये तिहरा डोरों को बांटकर चिकनी गुणा बनाई हुई युद्ध में सब कामों को सहने वाली होती है चाहे उसको कितनी ही खैंचो टूटती नहीं यदि रेशम की डोरी न मिले तो हिरन की स्नायु नाड़ियों की तांत गुण के लिये लेले वा भैंस की आंतों की तांत ले अथवा उसी समय मारे हुए बकरे की तांत की गुण श्रेष्ठ होती है, रोम रहित तांत के सूत से गुण उत्तम बनती है, अथवा पके हुए बांस की छाल की दृढ़ गुण करे रेशम के सूत से बनी हुई गुण युद्ध में सब काम देती है, भादों का महीना आने पर आक की त्वचा भी गुण का काम दे सकती है, उसका वहां तथा सूत बांटकर गुण करे और क्षत्रियों को कपास मूंज भंग नाड़ी आक आदि की बनानी चाहिये॥५०-५५॥ अथ शरलक्षणानि अतः परं प्रवक्ष्यामि शराणां लक्षणं शुभम् । स्थूलं न चापि सूक्ष्मं च नापक्वं न कुभूमिजम् ॥५६॥ अब बाणों के लक्षण कहते हैं इससे आगे बाणों के शुभ लक्षण कहते हैं, न मोटे न पतले न कच्चे और न खोटी भूमि के उत्पन्न हुए सरकंडे ग्रहण करे॥५६॥ हीनग्रंथिविदीर्णं च वर्जयेदीदृशं शरम् । पूर्णग्रंथिसुपक्वं च पाण्डुरं समयाहृतम् ॥५७॥
१२ धनुर्वेदसंहिता हीन गांठवाला कुवला हुआ हो तो ऐसा शर नहीं ले पूरी गांठवाला अच्छा पका हुआ पीले रंग का समय पर ले॥५७॥ शरवंशा गृहीतव्या शरत्काले च गाधिज ॥५८॥ हे गाधिके पुत्र विश्वामित्र! वृश्चिक राशि के सूर्य मार्गशीर्ष में शर के बांस बाण बनाने को लेनी चाहिये॥५८॥ कठिनं वर्तुलं काण्डं गृह्णीयात्सुप्रदेशजम् । द्वौ हस्तौ मुष्टिहीनौ च दैर्घ्यं स्थौल्येकनिष्ठिका॥५९॥ कैड़े गोल अच्छे देश में उत्पन्न हुए शर लेवे, एक बाण दो हाथ लंबा हो, एक मुट्ठी कम अर्थात् पांच अंगुल न्यून दो हाथ लंबा एक बाण हो और कनिष्ठा (छोटी) अंगुली सा मोटा हो॥५९॥ विधेया शरमानेषु यत्नेष्वाकर्षयेत्ततः । इतने अनुमान के बाण बनावे पीछे यंत्र अर्थात् धनुष पर चढ़ावे॥ काकहंसशशादानां मत्स्यादक्रौंचकेकिनाम् । गृध्राणां कुरराणां च पक्षा एते सुशोभनाः ॥६०॥ कौवे, हंस, शशाद, बगुले, क्रौंचपक्षी, मोर, गीध, टटीहरी इनके पर बाण के बांधने में श्रेष्ठ हैं॥६०॥ षडंगुलप्रमाणेन पक्षच्छेदं च कारयेत् । दशांगुलमिताः पक्षाः शार्ङ्गिचापस्य मार्गणे ॥६१॥ योज्या दृढाश्चतुःसंख्याः सन्नद्धाः स्नायुतन्तुभिः । छः अंगुल के मान परों को काटे और शार्ङ्गधनुष पर चढ़ाने के बाण के लिये दश २ अंगुल के पर चार २ प्रत्येक बाण के खड़े तांत के तारों से वांधे॥६१॥ जैसे :- शरश्च त्रिविधो ज्ञेयः स्त्री पुमांश्च नपुंसकः ॥६२॥ अग्रस्थूलो भवेन्नारी पश्चात्स्थूलो भवेत्पुमान् ॥ समो नपुंसको ज्ञेयस्तल्लक्ष्यार्थे प्रशस्यते ॥ दूरपातो युवत्या च पुरुषो भेदयेद्दृढम् ॥६३॥ तीन प्रकारके बाण जानने चाहिये स्त्री पुरुष और नपुंसक जो आगे से भारी हो वह स्त्री बाण कहाता है, और पीछे जो भारी हो वह पुरुष,
हिन्दीटीकासमेता १३ और जो एकसार हो वह नपुंसक होता है वह नपुंसक बाण केवल निशाना सीखने के लिये ही है और जो स्त्री बाण आगे से भारी होता है, वह दूर जाकर मारता है, और जो पुरुष बाण होता है, वह दृढ़ अर्थात् (मजबूत) पदार्थ को भी छेद देता है और काट देता है॥६२-६३॥ अथ फललक्षणम् आरामुखं क्षुरप्रं च गोपुच्छं चार्द्धचन्द्रकम् ॥ सूचीमुखं च भल्लं च वत्सदंतं द्विभल्लकम् ॥६४॥ कर्णिकं काकतुण्डं च तथान्यान्यप्यनेकशः । फलानि देशभेदेन भवन्ति बहुरूपतः ॥६५॥ अब फल के लक्षण यह हैं, आरीकेसा मुखवाला १ खुरपेकासा २, गऊकी पूंछ के समान आकार वाला ३, आधे चांदक आकार ४, सुईकेसे मुखवाला ५ वरछड़ी के से मुखवाला ६, बछड़े के दांत के आकार वाला ७, दोभाल वाला ८ कर्णिक फूलकी पंखडीसा ९, कौवे की चोंच के आकार वाला १० ये दश प्रकार आकार बाण के लोहे की भाल के होते हैं और भी देश भेद से अनेक प्रकार के होते हैं॥६४-६५॥ अथैतेषां कर्माणि आरामुखेन चर्मच्छेदनम् क्षुरप्रेण बाणकर्तनम् वा बाहुक- र्तनम् गोपुच्छेन लक्ष्यसाधनम् अर्धचन्द्रेण ग्रीवामस्तकध- नुरादीनां छेदनम् सूचीमुखेन कवचभेदनम् भल्लेन हृदय- भेदनम् वत्सदन्तेन गुणचर्वणम् द्विभल्लेन बाणाव- रोधनम् कर्णिकेन लोहमयबाणानां छेदनम् काकतुण्डेन वेध्यानां वेधं कुर्यात् ॥६६॥ आरामुख से ढालछेदन, क्षुरप्रसे हाथ काटना, गोपुच्छ से निशाना मारना, अर्द्धचन्द्र से माथा गरदन बाण काटना, धनुष काटना, सूचीमुख से बस्तर छेदन, भल्ल से हृदय को फोड़ना, वत्सदन्त से धनुष की गुण काटना, द्विभल्ल से बाण रोकना, कर्णिक से लोहे के बाण काटना, काकतुण्ड से वेधन के योग्यों को वेध विचार से करे॥६६॥
१४ धनुर्वेदसंहिता अथैषां स्वरूपाणि आरामुख क्षुरप्र गोपुच्छ अर्द्धचन्द्र सूचीमुख भल्ल वत्सदन्त द्विभल्ल कर्णिक काकतुण्ड अण्य तोमर प्रास दीप्ताग्र नतपर्व झिल्लम टोप-शिरस्त्राण
हिन्दीटीकासमेता १५ अन्यद्गोपुच्छकं ज्ञेयं शुद्धकाष्ठविनिर्मितम् । मुखे च लोहकंटेन विद्धं त्र्यंगुलसंमितम् ॥६७॥ और गोपुच्छ बाण जानना शुद्ध काष्ठ का बना हुआ उसके मुख पर तीन अंगुल का लोह का कांटा विंधा हुआ होता है॥६७॥ बाणस्य फलकस्थाने (सेह) कंटकयोजनाद्गोपुच्छबाणो भवति । अनेन शराभ्यासस्तथा लक्ष्याभ्यासो वा कर्तव्यः ॥६८॥ बाण के फलक स्थान में (साई) का कांटा लगाकर गोपुच्छ बाण होता है, इससे निशाना और बाण फेंकने का अभ्यास करना चाहिये॥६८॥ अथ पायनम् इषुफलशरवशामूललेपनाद्व्रणोऽसाध्यो भवति । तच्चि- ह्नमेतत् । यस्मिञ्छरवंशासमूहे स्वातिबिन्दुर्निपतति स पीतवर्णो भवति तस्य मूले विषमुत्पद्यते तन्मूलं ग्राह्यं स च सर्वदा पवनाभावेपि कम्पते इदमेव तल्लक्ष्मेति॥६९॥ अब फलों का पायन लिखते हैं, बाण के फल पर सरकण्डे की जड़ के लेप से घाव असाध्य होता है, उसकी पहिचान यह है कि, जिस झूँडे के समूह पर स्वाति की बूँद पड़ती है, वह पीले रंग का हो जाता है, उसकी जड़ में विष उत्पन्न होता है, वह जड़ लेनी चाहिये और वह सदा पवन भी न चलता हो तो भी कांपता रहता है, यही उसका चिह्न है॥६९॥ फलस्य पायनं वक्ष्ये दिव्यौषधिविलेपनैः । येन दुर्भेद्यवर्माणि भेदने तरुपर्णवत् ॥७०॥ फलों का पायन कहेंगे, दिव्य औषधियों के लेपन से जो किसी से भी न कटे, ऐसे कवचों को वृक्ष के पत्तों की तरह काट देवे॥७०॥ पिप्पली सैंधवं कुष्ठं गोमूत्रे तु सुपेषयेत् ॥ अनेन लेपयेच्छस्त्रं लिप्तं चाग्नौ प्रतापयेत् ॥७१॥ शिखिग्रीवानुवर्णाभं तप्तपीतं तथौषधम् ।
१६ धनुर्वेदसंहिता ततस्तु विमलं तोयं पाययेच्छस्त्रमुत्तमम् ॥७२॥ पीपल, सेंधानमक, कूठ, इन तीनों को गोमूत्र में अच्छी पीसे, फिर इससे शस्त्र को लीपे पीछे उसको अग्नि में तपावे, वह मोर की गरदन के सदृश नीला हो जाय तपाने से औषधि को पी जाय पीछे स्वच्छ जल में बुझा दे॥७१-७२॥ अथ नाराचनालीकशतघ्नीनां च वर्णनम् । सर्वलोहास्तु ये बाणा नाराचास्ते प्रकीर्तिताः । पञ्चभिः पृथुलैः पक्षैर्युक्ताः सिद्धयंति कस्यचित् ॥७३॥ अथ नाराच और नालीक और शतघ्नी का वर्णन करते हैं, जो बाण सब लोह के होते हैं वे नाराच कहे हैं, वे पांच मोटे पर बांधने से किसी को सिद्ध होते हैं॥७३॥ नालीका लघवो बाणा नलयंत्रेण नोदिताः । अत्युच्चदूरपातेषु दुर्गयुद्धेषु ते मताः ॥७४॥ जो कि नलयंत्र से फेंके जाते हैं, छोटे छोटे बाण कहाते हैं उनका नाम नालीक है अर्थात् गोली का नाम नालीक बाण हैं, और नलयंत्र नाम बन्दूक का है, सो बहुत ऊंचे और दूर फेंकने में तथा गढ़युद्ध में काम आते हैं ॥७४॥ सिंहासनस्य रक्षार्थं शतघ्नीः स्थापयेद्गढे । रंजकं बहुलं तत्र स्थाप्यं च बहु धीमता ॥७५॥ तख्तकी रक्षा के लिये गढ़ में तोपें स्थापन करे और बहुत सी बारूद और गोले गोली भी स्थापन करे॥७५॥ अथ स्थानमुष्टचाकर्षणलक्षणम् स्थानान्यष्टौ विधेयानि योजने भिन्नकर्मणाम् । मुष्टयः पंच समाख्याता व्यायाः पञ्च प्रकीर्तिताः ॥७६॥ इनके अनन्तर स्थान मुष्टि आकर्षण के लक्षण कहते हैं, अलग अलग काम में बाण प्रयोग करने के लिये स्थान आठ प्रकारके करने और पांच प्रकार की मुट्टी कही है, तथा पांच प्रकार के व्याय कहे हैं॥७६॥
हिन्दीटीकासमेता १७ अग्रतो वामपादश्च दक्षिणे चानुकुञ्चितम् । प्रत्यालीढं प्रकर्तव्यं हस्तद्वयसविस्तरम् ॥७७॥ बायां पैर आगे और दाहिना पीछे सुकड़ा हुआ यह दो हाथ की प्रत्यालीढ गति कहाती है॥७७॥ आलीढे तु प्रकर्तव्यं सव्यं चैवानुकुञ्चितम् । दक्षिणन्तु पुरस्ताद्वा दूरपाते विशिष्यते ॥७८॥ आलीढ गति में धनुषधारी को बायां पैर सकोड़ना, और दाहिना आगे कर बाण फेंके तो बाण दूर जाय॥७८॥ पादौ सविस्तरौ कार्यों समौ हस्तप्रमाणतः । विशाखस्थानकं ज्ञेयं कूटलक्ष्यस्य वेधने ॥७९॥ एक हाथ के प्रमाण से पैरों को विस्तार के साथ करे, उसका नाम विशाख गति है, कूटलक्ष्य के वेधने में इसका उपयोग होता है॥७९॥ समपादैः समौ पादौ निष्कम्पौ च सुसंगतौ । असमे च पुरो वामे हस्तमात्रनतं वपुः ॥८०॥ समपादों से बराबर दोनों पैर बिना ही लिये खड़ा हो बाण फेंके, और असमगति में आगे बायां पैर एक हाथ आगे रहे और शरीर झुका हुआ॥८०॥ आकुञ्चितोरुद्वौ यत्र जानुभ्यां धरणीं गतौ । दर्दुरक्रममित्याहुः स्थानकं दृढभेदने ॥८१॥ जहां दोनों ऊरू सिकोड़ कर जानुओं को धरती पर टेके, वह दर्दुरक्रम कहा है। दृढ़स्थान को भेद करने के लिये॥८१॥ सव्यं जानु गतं भूमौ दक्षिणं च सुकुञ्चितम् । अग्रतो यत्र दातव्यं तं विद्याद्गरुडक्रमम् ॥८२॥ बायां तो पृथिवी पर हो और दंहिना सुकड़ा हुआ हो, आगे से जो दे उसको गरुड़क्रम जानना॥८२॥ पद्मासनं प्रसिद्धन्तु उपविश्य यथाक्रमम् । धन्विनां तत्तु विज्ञेयं स्थानकं शुभलक्षणम् ॥८३॥ पद्मासन प्रसिद्ध है, इसका जैसा क्रम है वैसे बैठकर बाण मारे, ३
१८ धनुर्वेदसंहिता धनुषधारी को जानना चाहिये, यह शुभलक्षण वाला स्थानक है॥८३॥ अथ गुणमुष्टयः पताका वज्रमुष्टिश्च सिंहकर्णस्तथैव च । मत्सरी काकतुण्डी च योजनीया यथाक्रमम् ॥८४॥ अब गुणकी मुष्टि कहते हैं, पताका, वज्रमुष्टि, सिंहकर्ण, मत्सरी और काकतुण्डी ये पांच प्रकार गुण के हैं॥८४॥ दीर्घा तु तर्जनी यत्र ह्याश्रितोऽङ्गुष्ठमूलकम् । पताका सा च विज्ञेया नलिकादूरमोक्षणे ॥८५॥ जहां तर्जनी दीर्घ की जाय और अँगुठे को जड़ के पास हो, वह पताका जाननी, यह नलिका नाम वाण जिसमें रंजक और लोहकण भरे हों, उसके छोड़ने के लिये है॥८५॥ तर्जनीमध्यमामध्यमंगुष्ठो विशते यदि । वज्रमुष्टिस्तु सा ज्ञेया स्थले नाराचमोक्षणे ॥८६॥ तर्जनी और मध्यमा के बीच में यदि अँगूठा प्रवेश हो, वह वज्रमुष्टि जाननी, मोटा लोह का वाण छोड़ने के लिये इसका उपयोग करना॥८६॥ अंगुष्ठमध्यदेशन्तु तर्जन्यग्रं सुसंस्थितम् । सिंहकर्णः स विज्ञेयो दृढलक्ष्यस्य वेधने ॥८७॥ अँगूठे के बीच में तर्जनी का अग्र रखे, वह सिंहकर्ण जानना, दृढ़ लक्ष्य के वेधने में उपयोगी है॥८७॥ अंगुष्ठनखमूले तु तर्जन्यग्रं च संस्थितम् । मत्सरी सा च विज्ञेया चित्रलक्ष्यस्य वेधने ॥८८॥ अँगूठे के नख की जड़ में तर्जनी का अग्रभाग धरे; वह मत्सरी जाननी, चित्रकारी के निशाने के वेधने में यह उपयोगी है॥८८॥
हिन्दीटीकासमेता १९ अँगुष्ठाग्रे तु तर्जन्या मुखं यत्र निवेशितम् । काकतुण्डं च सा ज्ञेया सूक्ष्मलक्ष्ये सुयोजिता ॥८९॥ जहां तर्जनी का मुख अँगूठे के आगे निवेशित किया हो वह काकतुण्डी जानना, सूक्ष्म लक्ष्य में यह मुद्रा करनी॥८९॥ अथ धनुर्मुष्टिसंधानम् संधानं त्रिविधं प्रोक्तमध ऊर्ध्वं समं सदा । योजयेत्त्रिप्रकारं हि कार्येष्वपि यथाक्रमम् ॥९०॥ अब धनुष की मुष्टिका प्रकार कहते हैं, संधान तीन प्रकार का कहा है, अधःसन्धान १ ऊर्ध्वसन्धान २ और समसन्धान ३ ।। ऊपर १ नीचे २ बराबर ३ इनको जैसा कार्य हो उसमें यथाक्रम से ३ तीन प्रकार से योजना करै॥९०॥ अधश्च दूरपातित्वे समे लक्ष्ये सुनिश्चले । दृढास्फोटं प्रकुर्वीत ऊर्ध्वसंधानयोगतः ॥९१॥ दूर बाण फेंकने को अधःसन्धान करना जो अचल वस्तु हो उस पर समसन्धान करना और वस्तु को तोड़ने के लिये ऊर्ध्वसंधान करना॥९१॥ अथ व्यायाः कैशिकः केशमूले वै शरभृंगे च सात्विकः । श्रवणे वत्सकर्णश्च ग्रीवायां भरतो भवेत् ॥९२॥ अंस्के स्कंधनामा च व्यायाः पंच प्रकीर्तिताः ॥ केशों की जड़ में कैशिक और सात्विक शर श्रृंगतक और वत्सकर्ण कानतक, ग्रीवातक भरत और स्कन्धनाम व्याय कंधे तक, ये पांच व्याय अर्थात् बाण के खैंचने के प्रकार कहे हैं॥९२॥ कैशिकश्चित्रयुद्धेषु ह्यधोलक्ष्येपु सात्विकः । वत्सकर्णः सदा ज्ञेयो भरतो गूढभेदने ॥९३॥ दृढभेदे च दूरे च स्कंधनामानमुद्दिशेत् ॥
२० धनुर्वेदसंहिता कैशिक चित्रयुद्ध में और अधोलक्षों में सात्विक तथा बत्सकर्ण सदा जानना और गूढ़ भेद में भरत और दृढ़ भेद में तथा दूर बाण फेंकने को स्कंधनाम व्याय कहा है॥९३॥ अथ लक्ष्यम् लक्ष्यं चतुर्विधं ज्ञेयं स्थिरं चैव चलं तथा । चलाचलं द्वयचलं वेधनीयं क्रमेण तु ॥९४॥ अब निशाना कहते हैं, चार प्रकार का लक्ष्य जानना एक स्थिर, दूसरा चल, तीसरा चलाचल, चौथा द्वयचल इनको क्रमसे वेधना चाहिये॥९४॥ आत्मानं सुस्थिरं कृत्वा लक्ष्यं चैव स्थिरं बुधः । वेधयेत्त्रिप्रकारं तु स्थिरवेधी स उच्यते ॥९५॥ बुद्धिमान् अपने को स्थिर करके तीनों प्रकार के संधानों से लक्ष्य को वेधे वह स्थिरवेधी कहाता है, तीन प्रकार पहिले कह चुके हैं॥९५॥ चलन्तु वेधयेद्यस्तु आत्मस्थानेषु संस्थितः । चलं लक्ष्यं तु तत्प्रोक्तमाचार्येण शिवेन वै ॥९६॥ चलते हुए को जो अपने स्थान पर बैठा हुआ वेधे उसको युद्ध के आचार्य शिवजी महाराज चल लक्ष्य कहते हैं॥९६॥ धन्वी तु चलते यत्र स्थिरलक्ष्ये समाहितः । चलाचलं भवेत्तच्च ह्यप्रमेयमचिंतितम् ॥९७॥ जहाँ धनुषधारी तो स्थिर लक्ष्यपर सावधान होकर चलता है, उसका नाम चलाचल है, जो चिंतन में नहीं आता है यह अत्यंत उत्तम लक्ष्य है॥९७॥ उभावेव चलौ यत्र लक्ष्यं चापि धनुर्द्धरः । तद्विज्ञेयं द्वयचलं श्रमेण बहु साध्यते ॥९८॥ जहाँ धनुषधारी और लक्ष्य दोनों चलते हों उसको द्वयचल जानो, वह बड़ी मेहनत से सिद्ध होता है॥९८॥ श्रमेणास्खलितं लक्ष्यं दूरं च बहुभेदनम् ।
हिन्दीटीकासमेता २१ श्रमेणास्खलिता कृष्टिः शीघ्रसंधानमाप्यते ॥९९॥ श्रम से छोड़ा हुआ निशाना, और बहुत दूर का भेदन और श्रम से मर्यादा के साथ खिंचा हुआ बाण शीघ्र संधान को प्राप्त होता है॥९९॥ श्रमेण चित्रयोधित्वं श्रमेण प्राप्यते जयः । तस्माद्गुरुसमक्षं हि श्रमः कार्यो विजानता ॥१००॥ श्रम से चित्रयोद्धा होता है और श्रम से ही जय प्राप्त होता है। इससे जानने वाले को गुरु के सामने ही परिश्रम करना चाहिये॥१००॥ प्रथमं वामहस्तेन यः श्रमं कुरुते नरः । तस्य चापक्रियासिद्धिरचिरादेव जायते ॥१॥ पहले बायें हाथ से जो मनुस्य श्रम करे, उसको धनुष की क्रिया सिद्धि शीघ्र ही हो जाती है॥१॥ वामहस्ते सुसंसिद्धे पश्चाद्दक्षिणमारभेत् । उभाभ्यां च श्रमं कुर्यान्नाराचैश्च शरैस्तथा ॥२॥ बाँयाँ हाथ सिद्ध हुए पीछे दाहिने से आरंभ करे, फिर दोनों से नाराच और बांणों से श्रम करे॥२॥ वामेनैव श्रमं कुर्यात्सुसिद्धे दक्षिणे करे । विशाखेनासमेनैव रथी व्याये च कैशिके ॥३॥ जब दाहिना हाथ सिद्ध हो जाय तब बाँये से ही श्रम करे, विशाखगति और असमपादगति से रथी कैशिक नाम व्याय से॥३॥ उदिते भास्करे लक्ष्यं पश्चिमायां निवेशयेत् । अपराह्ने च कर्तव्यं लक्ष्यं पूर्वदिगाश्रितम् ॥४॥ सूर्य के उदय से दोपहर तक पश्चिम दिशा में निशाना करे और अपराह्न अर्थात् दोपहर ढले पीछे पूर्व दिशा में लक्ष्य साधन करे॥४॥ उत्तरेण सदा कार्यमवश्यमवरोधिकम् । संग्रामेण विना कार्यं न लक्ष्यं दक्षिणामुखम् ॥५॥ उत्तर दिशा को सदा अवश्य ही अवरोध से निशाना करना चाहिये, परंतु संग्राम के विना दक्षिण के सामने मुख करके निशाना कभी न
२२ धनुर्वेदसंहिता लगावे सिद्धान्त यह हुआ कि, सूर्य सदा पीठ पीछे वा दाहिनी ओर हो॥५॥ षष्टिधन्वंतरे लक्ष्यं ज्येष्ठं लक्ष्यं प्रकीर्तितम् । चत्वारिंशन्मध्यमं च विंशतिश्च कनिष्ठकम् ॥६॥ ६० साठ वाण धनुष के लिये रखो, वह श्रेष्ठ निशाना कहता है, ४० वाणों से मध्यम और २० बीस वाणों से कनिष्ठ लक्ष्य कहाता है॥६॥ शरोंका यह प्रमाण कह दिया अब नाराचोंका कहते हैं चत्वारिंशच्च त्रिंशच्च षोडशैव भवेत्ततः ॥७॥ चालीस, तीन और पीछे सोलह नाराचों का अर्थात् समस्त लोहमय बाणों को रखने वाला क्रम से उत्तम मध्यम और कनिष्ठ कहाता है॥७॥ चतुःशतैश्च काण्डानां यो हि लक्ष्यं विसर्जयेत् । सूर्योदये चास्तमाने स ज्येष्ठो धन्विनां भवेत् ॥८॥ सूर्य के उदय में और अस्त में चार सौ बाणों का जो लक्ष्य छोड़े वह धनुषधारियो में बड़ा होता है॥८॥ त्रिशंतैर्मध्यमश्चैव द्विशताभ्यां कनिष्ठकः । लक्ष्यं च पुरुषोन्मान कुर्याच्चन्द्रकसंयुतम् ॥९॥ तीन सौ से मध्यम और दो सौ से कनिष्ठ इतना उन्मान मनुष्य का है, यह निशाना चन्द्रक के संयुत करे अर्थात् चांदमारी से करे॥९॥ ऊर्ध्वभेदी भवेज्ज्येष्ठो नाभिभेदी च मध्यमः । पादभेदी तु लक्ष्यस्य स कनिष्ठो मतो भृगो ॥१०॥ हे परशुराम! ऊर्ध्वभेदी तो ज्येष्ठ कहाता है और जो बीच में वेध करे, वह मध्यम और निशाने का पादवेधी जो हो वह कनिष्ठ कहाता है॥१०॥ अथाऽनध्यायः अष्टमी च ह्यमावास्या वर्जनीया चतुर्दशी ।
हिन्दीटीकासमेता २३ पूर्णिमार्द्धदिनं यावन्निषिद्धं सर्वकर्मसु ॥११॥ अब अनध्यायों का वर्णन करते हैं, अष्टमी और अमावस और चौदस ये तिथियां वर्जित हैं, पूर्णमासी आधे दिन तक सब कामों में निषेध की है॥११॥ अकाले गर्जिते देवे दुर्दिनं चाथवा भवेत् । पूर्वकांडहतं लक्ष्यमनध्याये प्रचक्षते ॥१२॥ विना समय बादल गर्जे वा बादलों से छाया हुआ आकाश हो, पहला ही बाण लक्ष्य पर न लगे तो धनुर्वेद विद्या का अनध्याय होता है॥१२॥ अनुराधर्क्षमारभ्य षोडशर्क्षे दिवाकरः । यावच्चरति तं कालमकालं हि प्रचक्षते ॥१३॥ अनुराधा नक्षत्र से आरंभ होकर सोलह नक्षत्रों पर सूर्य जब तक रहे, उस समय को असमय कहते हैं, अर्थात् वृश्चिक के राशि के सूर्य से लेकर मार्गशीर्ष के महीने से ज्येष्ठ तक धनुष का अभ्यास न करे, केवल आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, और आश्विन, कार्तिक इन पांच मासों में ही अभ्यास और पठन पाठन करे॥१३॥ अरुणोदयवेलायां वारिदो यदि गर्जति । तद्दिने स्यादनध्यायस्तमकालं प्रचक्षते ॥१४॥ जिस समय प्रातःकाल लाल बादल हो सूर्य उदय होते समय यदि बादल गर्जे, उस दिन अनध्याय होता है उसको असमय कहते हैं॥१४॥ श्रमं च कुर्वतस्तत्र भुजंगो दृश्यते यदि । अथवा भज्यते चापं यदैव श्रमकर्मणि ॥१५॥ त्रुट्यते वा गुणो यत्र प्रथमे बाणमोक्षणे । श्रमं तत्र न कुर्वीत शस्त्रे मतिमतां वरः ॥१६॥ धनुष अभ्यास करने के आरम्भ में जो सर्प दीखे अथवा धनुष टूट जाय और पहिले ही बाण छोड़ते समय डोरी टूट जाय तो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ धनुर्द्धर को विचार करना चाहिये कि, वह धनुष का वा किसी शस्त्र का भी अभ्यास न करे॥१५-१६॥
२४ धनुर्वेदसंहिता अथ श्रमक्रिया क्रियाकलापान्वक्ष्यामि श्रमसाध्याञ्छुचिष्मताम् । येषां विज्ञानमात्रेण सिद्धिर्भवति नान्यथा ॥१७॥ अब श्रम क्रिया कहते हैं, पवित्र पुरुषों के लिये धनुष की क्रिया कहते हैं, जो परिश्रम से सिद्ध हो सकती है, जिनके जानने मात्र से ही सिद्धि हो जाती है यह अन्यथा नहीं है॥१७॥ प्रथमं चापमारोप्य चूलिकां बन्धयेत्ततः । स्थानकं तु ततः कृत्वा बाणोपरि करं न्यसेत् ॥१८॥ प्रथम धनुष को आरोपण करके पीछे चूलिको बांधे, तत्पश्चात् स्थानक करके बाण पर हाथ रखे॥१८॥ तोलनं धनुषश्चैव कर्तव्यं वामपाणिना । आदानं च ततः कृत्वा सन्धानं च ततःपरम् ॥१९॥ धनुषका तोलन बाँये हाथ से करना चाहिये, बोझ तोलकर पीछे उठावे, उसके उपरान्त वाण संधान करे॥१९॥ सकृदाकृष्टचापेन भूमिवेधं न कारयेत् । नमस्कुर्याच्च मां विघ्नराजं गुरुधनुःशरान् ॥२०॥ पहले चढ़ाये धनुष से धरती का वेध न करे और हे विश्वामित्र! शिवजी महाराज कहते हैं कि गणेशजी को और मुझको, गुरुको, धनुषको, बाणों को नमस्कार करे॥२०॥ याचितव्या गुरोराज्ञा बाणस्याकर्षणं प्रति । प्राणवायुं प्रयत्नेन प्राणेन सह पूरयेत् ॥२१॥ कुम्भकेन स्थिरं कृत्वा हुङ्कारेण विसर्जयेत् । इत्यभ्यासक्रिया कार्या धन्विना सिद्धिमिच्छता ॥२२॥ फिर गुरु से बाण खैंचने की आज्ञा मांगे, प्राण वायु को जतन से प्राण के साथ पूरक करे, पीछे कुम्भक से वायु को स्थिरकर हुंकार से रेचक करे, सिद्धि चाहने वाले धनुषधारी को यदि सिद्धि चाहे तो इस अभ्यास की क्रिया करनी चाहिये॥२१-२२॥ षण्मासात्सिध्यते मुष्टिः शराः संवत्सरेण तु ।
२. अष्टादश अस्त्र-प्रयोग, स्थान-विधान (स्थानक) एवं लक्ष्य-वेध विद्या
हिन्दीटीकासमेता २५ नाराचास्तस्य सिध्यंति यस्य तुष्टो महेश्वरः ॥२३॥ छः महीने में मुट्ठी सिद्ध होती है और बाण एक वर्ष में सिद्ध होते हैं, नाराच उसके सिद्ध होते हैं, जिस पर श्रीमहादेवजी प्रसन्न हों॥२३॥ पुष्पवद्धारयेद्वाणं सर्पवत्पीडयेद्धनुः । धनवच्चिंतयेल्लक्ष्यं यदिच्छेत्सिद्धिमात्मनः ॥२४॥ यदि अपनी सिद्धि चाहे तो फूल की तरह बाण धारण करे, साँप की तरह धनुष को पीडन करे, धन की तरह लक्ष्य का चिंतन करे॥२४॥ क्रियामिच्छन्ति चाचार्या दूरमिच्छन्ति भार्गवाः । राजानो दृढमिच्छन्ति लक्ष्यमिच्छन्ति चेतरे ॥२५॥ आचार्य तो क्रिया की इच्छा करते हैं और भृगुवंशी बाण दूर जाकर पड़े यह इच्छा करते हैं, राजा अंग दृढ़ वस्तु कट जाय ऐसी इच्छा करते हैं और लोग लक्ष्य (निशाना) अच्छा लगे, इसकी इच्छा करते हैं॥२५॥ जनानां रंजनं येन लक्ष्यपातातप्रजायते । हीनेनापीषुणा तस्मात्प्रशस्तं लक्ष्यवेधनम् ॥२६॥ जिस लक्ष्य के मारने से मनुष्यों का चित्त प्रसन्न हो, इससे छोटे बाण से भी लक्ष्य का बींधना अच्छा है छोटे बाण से निशाना अच्छा बिंधता है यह बात सिद्ध हुई॥२६॥ अथ लक्ष्यास्खलनविधिः विशाखस्थानकं हित्वा समसंधानमाचरेत् । गोपुच्छमुखबाणेन सिंहकर्णे न मुष्टिना ॥२७॥ आकर्षेत्कौशिकव्याये न शिखाञ्चालयेत्ततः । पूर्वापरौ समं कार्यौ समासौ निश्चलौ करौ ॥२८॥ चक्षुषी स्पंदयेन्नैव दृष्टिं लक्ष्ये नियोजयेत् । मुष्टिनाऽऽच्छादितं लक्ष्यं शरस्याग्रे नियोजयेत् ॥२९॥ मनो दृष्टिगतं कृत्वा ततः काण्डं विसर्जयेत् ॥
२६ धनुर्वेदसंहिता स्खलत्येव कदाचिन्न लक्ष्ये योधो जितश्रमः ॥३०॥ अब निशाना न चूकने की विधि, विशाख स्थान को छोड़कर समसंधान करे, समसंधान के लक्षण पहिले कह आये हैं, गोपुच्छमुख बाण से और सिंहकर्ण मुष्टि से, कौशिकव्याय से खैंचे और शिखा को भी न चलावे, पूर्व और पर समान करे, दोनों कंधे बराबर करे,और दोनों हाथों को हिलने न दे, आँखों को किंचित् भी न चलावे निगाह को निशाने पर जोड़े, मुट्ठी से लक्ष्य को ढ़ककर बाण के आगे करे, मन को दृष्टि से करके अर्थात् जहाँ निशाने पर दृष्टि हो वहां ही मन देकर पीछे बाण छोड़े, इस विधि से जितश्रम योद्धा कभी भी निशाने से नहीं चूकता है, क्योंकि उसने श्रम से लक्ष्य को जीत लिया॥२७-३०॥ अथ शीघ्रसंधानम् आदानं चैव तूणीरात्संधानं कर्षंणं तथा । क्षेपणं च त्वरायुक्तो बाणस्य कुरुते तु यः ॥३१॥ नित्याभ्यासवशात्तस्य शीघ्रसंधानता भवेत् । अब शीघ्रसंधान कहते हैं, जो पुरुष भाथे में से बाण लेकर संधान करके कर्षण करे, फिर जल्दी ही क्षेपण करे वह ऐसे नित्य के अभ्यास से शीघ्र संधानता हो जाती है॥३१॥ अथ दूरपातित्वम् मुष्ट्यापताकया बाणं स्त्रीचिह्नं दूरपातनम् ॥३२॥ पताका नाम मुष्टि से स्त्री चिह्न वाले बाण को फेंके तो दूर पड़े॥३२॥ अथ दृढभेदिता प्रत्यालीढे कृते स्थाने ह्यधःसंधानमाचरेत् । दर्दुरस्थानमास्थाय ह्यूर्ध्वं धारणमाचरेत् ॥३३॥ स्कंधव्यायेन वज्रस्य मुष्ट्या पुंमार्गेण च ।
हिन्दीटीकासमेता २७ अत्यन्तसौष्ठवाद्वाह्वोर्जायते दृढभेदिता ॥३४॥ पत्यालीढ़ स्थान किये पीछे अधःसंधान करै और दर्दुर स्थान से स्थित होकर ऊर्ध्वसंधान करे, स्कंधव्याय से वज्रमुष्टि और पुरुष बाण समसंधान करै, ऐसा करने से बहुत अच्छी दृढ़भेदिता हाथों से ही बाणों की हो जाती है॥३३-३४॥ अथ हीनगतयः सूचीमुखा मीनपुच्छा भ्रमरी च तृतीयाका । शराणां गतयस्तिस्रः प्रशस्ताः कथिता बुधैः ॥३५॥ अब हीन गतियों का वर्णन करते हैं। सूचीमुख १ मीनपुच्छ २ तीसरी भ्रमरी ३ ये बाणों की तीन चाल श्रेष्ठ कही हैं॥३५॥ सूचीमुखा गतिस्तस्य सायकस्य प्रजायते । पत्रं विलोकितं यस्य ह्यथवा हीनपत्रकम् ॥३६॥ जिस बाण के पर देखे हों, अर्थात् परवाला हो, अथवा पर रहित हो, उस बाण की सूचीमुख चाल हो जाती है॥३६॥ कर्करीतन्तु चापेन यैः कृष्टो हीनमुष्टिना । मत्स्यपुच्छा गतिस्तस्य सायकस्य प्रकीर्तिता ॥३७॥ जिस बाण को कठिन धनुष और पूर्वोक्त हीन मुष्टि से खैंचा जाय उसकी मत्स्यपुच्छा गति श्रीमहादेवजी महाराज ने कही है॥३७॥ भ्रमरी कथिता ह्येषा शिवेन श्रमकर्मणि । ऋजुत्वेन विना याति क्षेप्यमाणस्तु सायकः ॥३८॥ फेंका हुआ जो बाण सीधापन के विना ही जाय इसको शिवजी महाराज ने श्रमकर्म में भ्रमरी कहा है पूर्वोक्त तिर्यग्गत लक्ष्य वेधन के लिये श्रेष्ठ हैं॥३८॥ अथ बाणानां लक्ष्यस्खलनगतयः वामगा दक्षिणा चैव ऊर्ध्वगाऽधोगमा तथा । चतस्रो गतयः प्रोक्ता बाणस्खलनहेतवः ॥३९॥
२८ धनुर्वेदसंहिता बांई ओर जानेवाली, दाहिनी ओर जानेवाली, ऊपर को और वैसे ही नीचे को गति हो जाय, ये चार गतियां श्रीमहादेवजी ने बाणों के स्खलन के कारण कही हैं॥३९॥ अथैतासां क्रमेणोदाहरणानि कम्पते गुणमुष्टिस्तु मार्गणस्य तु पृष्ठतः । संमुखी स्याद्धनुर्मुष्टिस्तदा वामे गतिर्भवेत् ॥४०॥ गुणा की मुष्टि जो कि बाण की पीठ पर से काँपे और धनुष की मुष्टि सामने होय तब बाण सीधा जाके नहीं लगे, किंतु बाई ओर को उसकी चाल हो जाती है, इसलिये गुणा की मुष्टि को काँपने न दे॥४०॥ ग्रहणं शिथिलं यस्य ऋजुत्वेन विवर्जितम् । पार्श्वं तु दक्षिणं याति सायकस्य न संशयः ॥४१॥ जिस बाण का पकड़ना ढीला हो और सीधापन से भी रहित हो वह दाहिनी ओर चला जाता है, इसमें संदेह नहीं॥४१॥ ऊर्ध्वं भवेच्चापमुष्टिर्गुणमुष्टिरधो भवेत् । स मुक्तो मार्गणो लक्ष्यादूर्ध्वं याति न संशयः ॥४२॥ धनुष की मुट्ठी ऊपर को हो और गुणा की मुष्टि निशाने से नीचे को हो तो वह शर लक्ष्यवेध को छोड़कर ऊपर को चला जाता है इसमें कुछ संशय नहीं॥४२॥ मोक्षणे चैव बाणस्य चापे मुष्टिरधो भवेत् । गुणमुष्टिर्भवेदूर्ध्वं तदाधोगामिनी गतिः ॥४३॥ बाण के छोड़ने पर धनुष की मुष्टि यदि निशाने से नीचे हो और गुणा की मुष्टि ऊपर हो तब बाण की गति नीचे को हो जाती है, सिद्धांत यह है कि चापमुष्टि और गुणामुष्टि से लक्ष्य को ढक लेना चाहिये तब लक्ष्यभेद होता है अन्यथा नहीं होता॥४३॥ अथ शुद्धगतयः लक्ष्यबाणाग्रदृष्टीनां संगतिस्तु यदा भवेत् ।
हिन्दीटीकासमेता २९ तदानीं मुंचितो बाणो लक्ष्यान्न स्खलति ध्रुवम् ॥४४॥ अब शुद्ध गति का वर्णन ऐसा है कि, लक्ष्य और बाण का अग्रभाग तथा दृष्टि ये तीनों एक ही हो जायें, तब छोड़ा हुआ बाण निशाने से नहीं चूकता॥४४॥ निर्दोषः शब्दहीनश्च सममुष्टिद्वयोज्झितः । भिनत्ति दृढवेध्यानि सायको नास्ति संशयः ॥४५॥ दोष रहित और शब्द से हीन गुणा और धनुष इनकी समान मुष्टि से छोड़ा हुआ बाण कठिन वस्तुओं को विदारण कर देता है, इसमें संदेह नहीं॥४५॥ स्वाकृष्टस्तेजितो यश्च सुशुद्धो गाढमुष्टितः । नरनागाश्वकायेषु न तिष्ठति स मार्गणः ॥४६॥ सुंदर खैंचा हुआ तेज किया हुआ जो अच्छा स्वच्छ पक्ष आदि बँधा हो वह बाण गाढ़ी मुष्टि से छोड़ा हुआ, मनुष्य हाथी घोड़ों के शरीरों में नहीं ठहरता अर्थात् पार हो जाता है॥४६॥ यस्य तृणसमा बाणा यस्येन्धनसमं धनुः । यस्य प्राणसमा मौर्वी स धन्वी धन्विनां वरः ॥४७॥ जिसके तृण के समान बाण, और जिसके ईंधन के तुल्य धनुष और प्राण के समान मौर्वी (प्रत्यंचा) हो वह धनुषधारी धनुषधारियों में श्रेष्ठ है॥४७॥ अथ दृढचतुष्कम् अयश्चर्मघटश्चैव मृत्पिंडश्च चतुष्टयम् । यो भिनत्ति न तस्येषुर्वज्रेणापि विदार्यते ॥४८॥ अब दृढचतुष्क कहते हैं, लोह, चमड़ा, घड़ा, मिट्टी के पिण्ड इन चारों को जो बाण भेदन करे उसका बाण वज्र से भी न कटे॥४८॥ सार्द्धाङ्गुलप्रमाणेन लोहपत्राणि कारयेत् । तानि भित्त्वैकबाणेन दृढघाती भवेन्नरः ॥ डेढ़ अंगुल के मान चौड़े लोहे के पत्र करावे, उनको एक बाण से जो वेध