भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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९८ दोहावली तीनि लोक तिहुँ काल जस चातक ही केँ माथ । तुलसी जासु न दीनता सुनी दूसरे नाथ ॥२८८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तीनों लोकोंमें और तीनों कालोंमें कीर्ति तो केवल अनन्य प्रेमी चातकके ही भाग्यमें है, जिसकी दीनता संसारमें किसी भी दूसरे स्वामीने नहीं सुन पायी ॥ २८८ ॥ प्रीति पपीहा पयद की प्रगट नई पहिचानि । जाचक जगत कनाउड़ो कियो कनौड़ा दानि ॥२८९॥ भावार्थ—पपीहा और मेघके प्रेमका परिचय प्रत्यक्ष ही नये ही ढंगका है; याचक (मँगता) तो संसारभरका ऋणी होता है, परंतु इस प्रेमी पपीहेने दानी मेघको अपना ऋणी बना डाला ॥२८९॥ नहिं जाचत नहिं संग्रहइ सीस नाइ नहिं लेइ । ऐसे मानी मागनेहि को बारिद बिनु देइ ॥२९०॥ भावार्थ—पपीहा न तो मुंहसे मांगता है, न जलका संग्रह करता है और