दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १०५
प्रेम जिसके साथ लग जाता है, वही उसका आहार है, (वह खाना- पीना सब भूलकर उसीकी स्मृतिसे जीता रहता है) और वही उसका शरीर है (वह अपने शरीरकी सुधि भुलाकर उसीके शरीरमें तन्मय हुआ रहता है) ॥ ३१२ ॥ एकांगी अनुरागके अन्य उदाहरण बिबि रसना तनु स्याम है बंक चलनि बिख खानि । तुलसी जस श्रवननि सुन्यो सीस समर्प्यो आनि ॥३१३॥ भावार्थ—जिसके दो जीभें हैं, काला शरीर और टेढ़ी चाल है तथा जो विषकी खान है, ऐसा सर्प भी कानोंसे अपनी प्रशंसा सुनते ही [प्रेमवश] आकर अपना सिर सौंप देता है* ॥ ३१३ ॥ मृगका उदाहरण आपु ब्याध को रूप धरि चहै कुरंगहि राग । तुलसी जो मृग मन मुरै परै प्रेम पट दाग ॥३१४॥ भावार्थ—राग (वीणाका मधुर स्वर) स्वयं बहेलियाका रूप धरकर हरिनको मार डाले [परंतु रागके प्रति उसका अनुराग तो वैसा ही रहता है]। तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि राग