दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ दोहावली श्रीरामकी दयालुता मुकुर निरखि मुख राम भ्रू गनत गुनहि दै दोष। तुलसी से सठ सेवकन्हि लखि जनि परहिं सरोष॥१८७॥ भावार्थ—श्रीरामजी दर्पणमें अपना श्रीमुख निरखकर अपनी टेढ़ी भौंहोंको जो एक गुण है दोष देते हैं और सोचते हैं कि तुलसी सरीखे दुष्ट सेवकोंको कहीं इन टेढ़ी भृकुटियोंमें क्रोध न दिखायी देने लगे ॥१८७॥ श्रीरामकी धर्मधुरन्धरता सहसनाम मुनि भनित सुनि तुलसी बल्लभ नाम। सकुचित हियँ हँसि निरखि सिय धरम धुरंधर राम॥१८८॥ भावार्थ—मुनिके कहे हुए रामसहस्रनाममें 'तुलसीवल्लभ' अपना नाम सुनकर धर्मधुरंधर भगवान श्रीरामजी हँसकर सीताजीकी ओर देखते हैं और मन-ही-मन सकुचाते हैं ॥१८८॥ श्रीसीताजीका अलौकिक प्रेम गौतम तिय गति सुरति करि नहिँ परसति पग पानि। मन बिहँसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि ॥१८९॥ भावार्थ—[जनकपुरीमें सखियोंके कहनेपर भी] मुनि गौतमकी पत्नी अहल्याकी गतिको याद करके (जो चरणस्पर्श करते ही देवी बनकर आकाशमें उड़ गयी थी) श्रीसीताजी अपने हाथोंसे भगवान् श्रीरामजीके पैर नहीं छूतीं। रघुवंशविभूषण श्रीरामजी सीताजीके इस अलौकिक प्रेमको जानकर मन-ही-मन हँसने लगे ॥१८९॥