दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ दोहावली उद्बोधन दीपसिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग। भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग ॥२६९॥ भावार्थ—युवती स्त्रियोंका [ सुन्दर ] शरीर दीपककी लौके समान है, मन ! तू उसमें पतंग मत बन [ नहीं तो भस्म हो जायगा ]। काम और मदको त्यागकर श्रीरामका भजन कर और सदा सत्सङ्ग कर ॥२६९॥ गृहासक्ति श्रीरघुनाथजीके स्वरूपकेज्ञानमें बाधक है काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप। ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे भव कूप ॥२७०॥ भावार्थ—जो काम, क्रोध, मद और लोभके परायण हैं और जो दुःखरूप गृहमें ही आसक्त हैं, वे संसाररूपी कुएँमें पड़े हुए मूढ़ श्रीरघुनाथजीको कैसे जान सकते हैं ? ॥२७०॥ काम-क्रोधादि एक-एक अनर्थकारक हैं, फिर सबकी तो बात ही क्या ? ग्रह ग्रहीत पुनि बातबस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार ॥२७१॥ भावार्थ—जिसे कुग्रह लगे हों [अथवा जो पिशाचग्रस्त हो] फिर जो वायुरोगसे पीड़ित हो और उसीको फिर बिच्छू डंक मार दे, ऐसे तीन प्रकारसे पागल बने हुएको ऊपरसे शराब पिला दी जाय तो कहिये, यह कैसा इलाज है? ॥२७१॥