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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 656 में से

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पृष्ठ 290

२८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 नौवाँ अध्याय हाहा-हूहू तथा तुम्बुरु नामक गन्धर्वोंका कश्यपमुनिके आश्रममें आना, गन्धर्वोंद्वारा पंच- देवोंका पूजन, बालक गणेशद्वारा लीलापूर्वक पंचदेवोंकी मूर्तियोंको अदृश्य कर देना, माताको अपने मुखमें समस्त ब्रह्माण्डको प्रतिष्ठित दिखाना तथा गन्धर्वोंको विश्वात्मारूप दिखाकर उनके भ्रमको निवारित करना, गन्धर्वोंद्वारा गणेश-स्तवन ब्रह्माजी बोले- हे मुने ! मैं बालरूपधारी गणेशजीके | हैं, अतः हम लोग जाते हैं, हमें आज्ञा प्रदान कीजिये।' अन्य चरितका भी वर्णन आपसे करता हूँ, जो समस्त | उनके वचनोंको सुनकर तपोनिधि कश्यपजी पुनः बोले- पापोंका नाशक है। उसे आप एकाग्रचित्त होकर सुनिये ॥ १ ॥ | आप लोग भोजन करनेके अनन्तर थोड़ी देर विश्राम एक बारकी बात है, हाहा, हूहू तथा तुम्बुरु नामक | करके ही यहाँसे जायँ, बिना भोजन लिये यहाँसे कोई गन्धर्व कैलास जानेकी इच्छासे महर्षि कश्यपजीके | नहीं गया है। तदनन्तर महर्षिने स्नान आदिके लिये जल आश्रममें पहुँचे। वे गन्धर्व वीणाको हाथमें लेकर वीणा | प्रदान किया और उनके लिये भोजनका निर्माण बजाते हुए गान कर रहे थे, वे भगवान् विष्णुकी भक्तिमें | करवाया ॥ ९-१० ॥ निरत रहनेवाले थे। शंख, चक्र, गदा, पद्म एवं | तदनन्तर मननशीलोंमें श्रेष्ठ वे हाहा-हूहू आदि तुलसीकी मालासे सुशोभित थे। उनके शरीरके अंगोंमें | गन्धर्व स्नानके पश्चात् देवताओंकी पूजा करने लगे ॥ ११ ॥ गोपीचन्दनका अनुलेपन लगा हुआ था, उन्होंने पीताम्बर | वे देवी पार्वती, शिव, विष्णु, गणेश तथा धारण कर रखा था और वे अत्यन्त मनोहर थे। महर्षि | सूर्यनारायणकी पूजा करके मुहूर्तभरके लिये ध्यानमें कश्यपजीने उनका बहुत आदर-मान किया और यथाविधि | स्थित हो गये। उसी समय बालकोंके साथ बाहर उनकी पूजा की ॥ २-४ ॥ | खेलनेके अनन्तर बालक विनायक जब घरके अन्दर उन्हें प्रणाम करके कश्यपजी बोले- 'मेरे किसी | आये तो वहाँ उन्होंने पंचदेवोंकी उन मूर्तियोंका दर्शन पुण्यके प्रभावसे ही धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष- इस | किया। उन्होंने शीघ्र ही मूर्तियोंको उठाकर बाहर फेंक चतुर्विध पुरुषार्थको प्रदान करनेवाले आप-जैसे महापुरुषोंका | दिया और वे स्वयं अग्निगृह (यज्ञशाला)-में चले दर्शन मुझे हुआ है। आज मेरा तप धन्य हो गया, मेरा | गये ॥ १२-१३ ॥ जन्म लेना सफल हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, | तदनन्तर वे अपने सारे शरीरमें भस्म लगाकर मेरा ज्ञान धन्य हो गया और यह मेरा आश्रम धन्य हो | अन्तर्धान हो गये। जब उन गन्धर्वोंका ध्यान टूटा तो गया। आपके यहाँ आगमनका उद्देश्य मैं नहीं जानता हूँ, | उन्होंने सामने रखी हुई मूर्तियोंको नहीं देखा ॥ १४ ॥ उसे आप बतायें' ॥ ५-६ ॥ | उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ और वे सभी आपसमें ही इस प्रकारसे पूछे गये वे गन्धर्व उनके वचनको | कहने लगे, किस दैत्यने कर्मकी हेतुभूता हमारी इन सुनकर उनसे बोले- 'हम लोग कैलास-दर्शनकी इच्छासे | मूर्तियोंको चुराया है ॥ १५ ॥ आये हैं और इसीमें हमें आपका दर्शन हो गया ॥ ७ ॥ | क्या कोई गन्धर्व, राक्षस या यक्ष इन मूर्तियोंको आज हमारा पाप नष्ट हो गया और हमारा जन्म | चुराने आये अथवा क्या हमारे सत्त्वकी परीक्षा लेनेके लेना सफल हो गया। हमें लगता है कि अब परम सिद्धि | लिये ये मूर्तियाँ स्वतः ही अन्तर्धान हो गयीं ! ॥ १६ ॥ हमसे दूर नहीं है, हमें परम विश्रान्ति प्राप्त हुई है ॥ ८ ॥ | तदनन्तर वे महान् क्रोध करते हुए मुनि कश्यपके हम लोग भगवान् शंकरका दर्शन करनेको उत्सुक | पास पूछनेके लिये आये और बोले- 'आपके घरमें जब