भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 656 में से

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पृष्ठ 294

२९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ‘परशु’ नामक अस्त्र प्रदान किया और ‘परशुहस्त’ | पूजा नहीं की और न कोई मंगलमय श्रेष्ठ उपहार ही यह सुन्दर नाम रखा तथा पुनः उसकी पूजा करके | प्रदान किया ॥ ३३-३४॥ अपना श्रेष्ठ वाहन ‘सिंह’ उसे प्रदान किया और | इन्द्र सोचते थे, मैं तीनों लोकोंके द्वारा पूज्य हूँ, ‘सिंहवाहन’ यह सुन्दर नाम रखा और उसे आदेश | देवताओंका राजा हूँ, वरिष्ठ हूँ, अमृतका पान करनेवाला देते हुए कहा—‘हे विनायक! तुम शीघ्र ही दुष्टोंका | हूँ, गजेन्द्र ऐरावतकी सवारी करनेवाला हूँ और भगवान् विनाश करो’॥ २८—२९१/२ ॥ | विष्णु तथा शूलपाणि शंकरजीद्वारा भी पूजित हूँ तो फिर समुद्रने ब्राह्मणरूप धारणकर वहाँ उपस्थित होकर | मैं कश्यपजीके छोटे बालक उस गणेशको क्यों नमस्कार उसे मुक्ताकी माला प्रदान की और उसकी पूजाकर | करूँ? सिंह कभी भी तृणका भक्षण नहीं करता, समुद्र ‘मालाधर’ यह नाम उसका रखा। भगवान् शेषने | कभी भी छोटे सरोवरसे जलकी अभिलाषा नहीं करता गणेशजीके आसनके रूपमें स्वयं अपनेको समर्पित किया | और सब कुछ प्रदान करनेवाला कल्पवृक्ष अन्य किसी और बड़ी प्रसन्नतापूर्वक ‘फणिराजासन’ उसका नामकरण | दूसरेसे कुछ भी नहीं माँगता ॥ ३५-३६ ॥ किया। अग्निदेवने उसे दाहशक्ति प्रदान की और | महर्षि कश्यपजीने अपने ध्यानयोगसे इन्द्रके इस ‘धनञ्जय’ यह नाम रखा ॥ ३०—३२॥ | प्रकारके भावको समझकर उसकी भलाईकी कामनासे वायुदेवने बालकका ‘प्रभंजन’ यह नाम रखा और | इस प्रकारके धर्मयुक्त वचन कहे— ॥ ३७ ॥ महान् पराक्रम उसे प्रदान किया। इस प्रकार सभी देवोंने | जो अद्भुत कर्मवाला हो और जो गुणोंकी खान यथाशक्ति उसे कुछ भेंट प्रदानकर उसके विविध नाम | हो, वह पूजाके योग्य तथा प्रणाम करनेके योग्य होता रखे। हे मुने! उनके नामोंका वर्णन करनेमें किसीकी भी | है, इसी प्रकार गुणोंसे रहित ब्राह्मण भी पूज्य एवं शक्ति नहीं है। देवराज इन्द्रने मदसे उन्मत्त होकर उसकी | नमस्कार्य नहीं होता है ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें ‘नाना नामोंका वर्णन’ नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १० ॥ ग्यारहवाँ अध्याय महर्षि कश्यपजीद्वारा इन्द्रको बालक गणेशके अद्भुत कर्मोंको बताना, इन्द्रकी आज्ञासे वायु तथा अग्निद्वारा बालक गणेशकी परीक्षा, गणेशका विराट् रूप धारणकर इन्द्रको दिखाना, इन्द्रका भयभीत होकर उनकी स्तुति करना, इन्द्रकृत स्तुतिका माहात्म्य कश्यपजी बोले—मेरे घरमें यह कोई परम पुरुष | दो दैत्य थे। वे तोतेका रूप धारणकर इसे मारनेके लिये ही अवतीर्ण हुआ है, जो अनिर्वचनीय गुणोंवाला है। यह | आये। इसने उनके पंख पकड़कर शिलापर पटक डाला, सत्त्वादि तीनों गुणोंसे समन्वित होते हुए भी उन तीनों | जिससे निष्प्राण होकर वे भूमिपर गिर पड़े, उन भयंकर गुणोंसे रहित है, गुणातीत है ॥ १ ॥ | दैत्योंको सबने अपने सामने देखा था। उसी प्रकार एकबार जो इसका विरोध करेगा, वह अपने स्थानसे च्युत | चित्र नामक गन्धर्व [शापवश] मगरमच्छका रूप हो जायगा। हे देवेन्द्र! मेरे द्वारा बताये गये इसके अद्भुत | धारणकर जलमें स्थित था। वह इस बालकके स्पर्शमात्र कर्मोंके विषयमें आप सुनें। भयंकर विरजा नामक राक्षसी | करनेसे दिव्य शरीरको प्राप्त हो गया ॥ ४—६ ॥ इसे मारनेके लिये आयी थी, किंतु इस बालकने उसे मार | हाहा-हूहू तथा तुम्बुरु नामक दैत्योंके सत्त्वकी डाला, वह दो योजन दूर जाकर गिरी ॥ २-३ ॥ | शुद्धिके लिये इसने स्वयं पंचदेवोंकी मूर्तियोंका अपहरण उद्धत तथा धुन्धु (धुन्धुर) नामक अत्यन्त मदान्ध | करके स्वयंको ही पंचदेवोंके रूपमें प्रकट किया ॥ ७ ॥

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