भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 656 में से

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पृष्ठ 298

२९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] श्रीमान्का दर्शन प्राप्त हुआ है, किंतु आजतक आपने मुझ पुरोहितका कोई भी समाचार क्यों नहीं लिया?' ॥ १० ॥ ब्रह्माजी बोले-महर्षि कश्यपजीकी यह बात सुनकर नृपश्रेष्ठ बोले—'हे ब्रह्मन्! मैं राज्यके संचालनके कार्यमें अत्यन्त व्यस्त मनवाला हो गया था, अतः मेरे अपराधको आप क्षमा कीजिये ॥ ११ ॥ हे प्रभो! मेरे पुत्रका विवाह होना निश्चित हुआ है, अतः मैं आपको ले जानेके लिये आया हूँ। हे मुने! आज आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया ॥ १२ ॥ आप शीघ्र चलें और विवाहका कार्य सम्पन्न करनेके अनन्तर पुनः लौट आयें। आपके आगमनके बिना श्रेष्ठ लोगोंमें मेरी प्रशंसा नहीं हो पायेगी, इसलिये हे महामुने! मैं आपको ही लेने आया हूँ' ॥ १३१/२ ॥ मुनि कश्यप बोले-हे नृपश्रेष्ठ! इस समय मेरा चातुर्मास्य व्रत चल रहा है, इसलिये मैं तो नहीं आ पाऊँगा। हे राजन्! यदि आप इच्छुक हैं तो मेरे पुत्रको ले जाइये, वह सब प्रकारसे समर्थ है ॥ १४१/२ ॥ राजा बोले-हे मुने! आप अपने पुत्रको आज्ञा प्रदान करें, हम दोनों शीघ्र ही यहाँसे चलेंगे ॥ १५ ॥ राजाकी यह बात सुनकर मुनि कश्यप अपने पुत्रसे बोले—'हे विनायक! यद्यपि तुम्हारे जानेसे मैं बहुत दुखी रहूँगा, तथापि इन राजाकी अनुरोधपूर्ण वाणीसे मैं तुम्हें इनके साथ भेज रहा हूँ' ॥ १६१/२ ॥ उस आज्ञाको शिरोधार्यकर तथा माता-पिता दोनोंके चरणोंकी वन्दना करके विनायक बाहर आये और राजाने उन्हें रथपर बिठाया। राजा स्वयं भी उन महर्षि कश्यप और देवी अदितिके चरणोंमें प्रणामकर रथमें आरूढ़ हुए ॥ १७-१८ ॥ उस समय देवी अदिति वहाँपर आयीं और नृपश्रेष्ठ काशिनरेशसे बोलीं—हे राजन्! मेरे इस बालककी निरन्तर रक्षा करनी चाहिये। मेरा यह बालक जहाँ-जहाँ भी जाता है, वहाँ-वहाँ अनेक उत्पात होते हैं, अतः आपको बड़े ही प्रयत्नपूर्वक इसकी रक्षा वैसे ही करनी होगी, जैसे कि पलकें आँखकी पुतलीकी रक्षा करती हैं ॥ १९-२० ॥ जिस प्रकार आप मेरे पुत्र को ले जा रहे हैं, वैसे

[दायाँ स्तम्भ] ही आप वापस भी लायें। 'ठीक है, ऐसा ही होगा।' अदितिसे इस प्रकार कहकर राजाने प्रणाम करके उन्हें विदा किया। तदनन्तर बालक गणेशके साथ राजा काशीनरेशने वायुके सदृश वेगवान् रथसे प्रस्थान किया। रथके द्वारा मार्गमें जाते हुए राजाको एक घनघोर वन दिखायी दिया ॥ २१-२२ ॥ वह नरान्तकके चाचाका अत्यन्त रमणीय स्थान था। उसका नाम धूम्राक्ष था, वह रौद्रकेतुका भाई तथा बड़ा ही पराक्रमी था। उस धूम्राक्षने दस हजार वर्षतक सहस्र किरणोंवाले भगवान् सूर्यकी प्रसन्नतापूर्वक नित्य आराधना करते हुए अत्यन्त दारुण तप किया था ॥ २३-२४ ॥ वह तीनों लोकोंको अपने वशमें करनेकी इच्छासे सभीका संहार कर सकनेवाले आयुधकी अभिलाषा रखता था। वह वृक्षकी शाखामें दोनों पैरोंको अटकाकर नीचे मुख लटकाये हुए धुएँका पान करता था। इस प्रकार बहुत समयतक साधना करते हुए उसके सामने अमोघ अस्त्र प्रकट हुआ ॥ २५-२६ ॥ तपस्या करनेवाले उस धूम्राक्ष नामक राक्षसके लिये वह अस्त्र भगवान् सूर्यने भेजा था। उस अस्त्रके आकाशतक व्याप्त महान् तेजको बालक विनायकने देखा। उन्होंने शीघ्र ही उछलकर उस तेजोमय अस्त्रको उसी प्रकार पकड़ लिया, जैसे गरुड़ सर्पको पकड़ लेता है। यह देखकर महामनस्वी काशिराज आश्चर्यमें पड़ गये ॥ २७-२८ ॥ उन्होंने मनमें यह विचार किया कि तीनों लोकोंमें लाभ, हानि तथा जीवनके विषयमें दैवके अतिरिक्त अन्य कोई हेतु नहीं है। इस अस्त्रकी प्राप्ति मुझे नहीं बल्कि सहसा इस बालकको हुई है। तदनन्तर बालक विनायकने उस अस्त्रकी शक्तिको ज्ञात करनेके लिये उसको हाथमें लेकर तोला और फेंका ॥ २९-३० ॥ उसी समय वह अस्त्र भयानक शब्द करता हुआ शीघ्र ही ऊपरको गया और धूम्राक्षके ऊपर गिरा, जिससे उस राक्षसका शरीर तत्काल दो भागोंमें बँट गया ॥ ३१ ॥ गिरते हुए उसके शरीरके दोनों भागोंने बड़ी-बड़ी चट्टानों तथा वृक्षोंको चूर-चूर कर डाला और दो हजार