भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 424, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 424

४२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- प्रकारके] वचन सुनकर सावधानचित्त होकर माता- पितासे बोला- 'आप दोनों शोक न करें। मैं अपने उस शत्रुको ग्रास बनानेके लिये जा रहा हूँ। बताओ, जिसने मेरे भाईको मारा है, वह कहाँ रहता है? या तो मैं उसको मारकर सुखका अनुभव करूँगा अथवा स्वयं मरकर भाईके पास चला जाऊँगा ॥ ३२-३४ ॥ हे माता ! हे पिता ! मेरी भौंहोंके टेढ़े होनेमात्रसे त्रिभुवन कम्पायमान हो जाता है, फिर मेरे क्रोधित हो जानेपर तीनों लोकोंकी रक्षा कौन कर सकता है?' ॥ ३५ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब देवान्तककी बात सुनकर वे दोनों (शारदा और रौद्रकेतु) आश्वस्त हो गये। शोकसागरमें डूबे हुए उन दोनोंका उसके वचनोंसे उद्धार हो गया ॥ ३६ ॥ ज्येष्ठ पुत्रके पूछनेपर रौद्रकेतुने विस्तारपूर्वक सारी बात कही-काशिराज नामसे विख्यात एक परम धार्मिक राजा है। उसके घरमें विवाह-सम्बन्धी महान् उत्सवका आयोजन था। उसमें सभी लोगोंके साथ 'विनायक' नामसे विख्यात कश्यपजीका पुत्र भी आमन्त्रित था। वह बालक होते हुए भी अत्यन्त बलवान् माना जाता है। हे पुत्र ! उसने रास्तेमें ही मेरे भाई धूम्राक्षको मार डाला। उसका बदला लेनेके लिये मैंने पाँच सौ निशाचर वीरोंको भेजा था, वे सब दौड़ते हुए वहाँ गये, परंतु उस सप्त- वर्षीय मुनिपुत्र [विनायक]-द्वारा वे सभी मार डाले गये। उनका प्रतिशोध लेनेके लिये नरान्तक स्वयं गया। उसके साथ अनेक शस्त्रोंसे युक्त चतुरंगिणी सेना थी; किंतु उनमेंसे एक भी वापस नहीं लौटा। अकस्मात् यह नरान्तकका [कटा हुआ] सिर दिखायी दिया, तो हम लोग शोकाकुल होकर उसके सिरको लेकर तुम्हारे सम्मुख आये हैं ॥ ३७-४२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-रौद्रकेतुका इस प्रकारका वचन सुनकर देवान्तक [क्रोधसे] काँपने लगा, उसके नेत्र लाल हो गये। वह [अपने आसनसे] उठ खड़ा हुआ। उस समय ऐसा लगता था, मानो वह तीनों लोकोंको निगल जायगा। अहंकार और अज्ञानके वशवर्ती होकर वह अपने पितासे कहने लगा- 'मैं सबको मारनेवाले कालको भी मार डालूँगा, पृथ्वीको उलटकर अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टिसे क्षणभरमें ब्रह्माण्डको भस्म कर डालूँगा' ॥ ४३-४५ ॥ इस प्रकार अपने क्रोधपूर्ण वचनोंसे पृथिवीको कम्पित-सा करते हुए उसने उन सभी दैत्योंको बुलाया, जो देवताओंके अधिकारोंपर प्रतिष्ठित थे ॥ ४६ ॥ तदनन्तर देवान्तकने माता-पिताको प्रणामकर कहा- 'अब मैं शीघ्र ही उस मुनिकुमार [विनायक]-को लाऊँगा और उसके साथ ही [नरान्तकके इस] सिरका अग्नि-संस्कार करूँगा' ॥ ४७१/२ ॥ ऐसा कहकर देवान्तक तथा उसके साथी असंख्य दैत्योंने शीघ्रगामी पक्षियोंकी भाँति बलपूर्वक उड़कर और काशिराजकी नगरीमें पहुँचकर उसे चारों ओरसे घेर लिया ॥ ४८-४९ ॥ उस समय [काशीपुरीमें] महान् कोलाहल होने लगा और दिशाएँ धूलसे भर गयीं; [जिससे] सूर्यका प्रकाश भी वहाँ नहीं आ पा रहा था। [यह देखकर] पुरवासी अत्यधिक चीत्कार करने लगे ॥ ५० ॥ [वे कहने लगे-] नरान्तकको मरे तो अभी दो- तीन दिन भी नहीं हुए, तो फिर यह जनसंहारकारी प्रलय पुनः कैसे आ गया ? ॥ ५१ ॥ यह देखनेमें अत्यन्त कठिन भयंकर शरीरवाला कौन आ गया, यह तो कालको भी कवलित और तीनों लोकोंको भक्षण कर जानेमें समर्थ है ॥ ५२ ॥ इससे पहले भेजे गये दैत्यवीरोंका तो उस विनायकने वध कर डाला था, परंतु अब पुनः दैत्योंकी एक परिखा (खाईं)-सी बन गयी है, जिसके कारण अब बाहर जानेका मार्ग भी नहीं है ॥ ५३ ॥ जब पुरजन इस प्रकार कह रहे थे, तभी देवान्तकके आने (आक्रमण)-का समाचार काशिराजको बतलाने उसके दूत आ गये ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'नगरीनिरोध' नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६२ ॥