भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२५६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

प्रवृत्ति शरीरमें बढ़ने लगती है, उस समय भी यह सन्निपात-ज्वर होता है। उस कालमें शीत और दाहका प्रकोप शरीरपर होता है। उनसे मुक्ति प्राप्त करना प्राणीके लिये अत्यन्त कठिन है। शीतका प्रभाव शरीरपर पहले होनेसे पित्तके कारण मुखसे कफ निकलता है और सूख भी जाता है। पित्तके शान्त होनेपर मूर्च्छा, मद और तृष्णा होती है। अन्तमें क्रमशः रोगीको तन्द्रा और आलस्य आ जाता है तथा अम्ल वमन होता है।

आगन्तुक-ज्वरका लक्षण

अभिघात, अभिषंग, शाप तथा अभिचार-कर्मसे आनेवाले चार प्रकारके ज्वरको आगन्तुक-ज्वर माना गया है। दाह आदिके कारण शरीरमें जब पसीना छूटता है तो उसको अभिघातज ज्वर कहा जाता है। अधिक परिश्रम करनेसे शरीरमें वायु प्रायः रक्तको प्रदूषित करता हुआ पीड़ा, शोक तथा शरीरके सामान्य वर्णोंको परिवर्तित करनेवाले पीड़ायुक्त ज्वरको उत्पन्न कर देता है।

ग्रह-प्रभाव, औषधि-प्रयोग, विष-पान तथा क्रोध, भय, शोक एवं कामजन्य भी सन्निपात-ज्वर होता है। ग्रहावेशसे जो ज्वर उत्पन्न होता है, उसमें रोगी अकस्मात् हँसने और रोने लगता है। औषधि और गन्ध-विशेषके प्रयोगसे आये हुए सन्निपात-ज्वरमें मूर्च्छा, सिरपीड़ा, वमन, कम्प तथा क्षय (शरीर-शैथिल्य)-का प्रभाव रोगीपर रहता है। विष-पानसे मूर्च्छा, अतिसार, पीलापन, दाह और मस्तिष्क-भ्रान्तिके लक्षण रोगीमें स्पष्ट होने लगते हैं। क्रोधजन्य सन्निपातमें शरीर काँपने लगता है, मस्तिष्कमें पीड़ा होती है। भय तथा शोकसे उत्पन्न हुए ज्वरमें रोगी प्रलाप करता है। कामजन्य ज्वरमें भ्रम, अरुचि, दाह, लज्जा, निद्रा, बुद्धि तथा धैर्यका ह्रास हो जाता है।

सन्निपातिक ग्रहावेशादिके कारण उत्पन्न हुए ज्वर और आगन्तुकरूप आदि रूपजन्य ज्वरमें वायुका प्रकोप ही प्रभावी रहता है। कोपजन्य ज्वरके कारण रोगीमें पित्त प्रकुपित हो उठता है। शाप तथा अभिचारकर्मके कारण जो ये दो सन्निपात-ज्वर प्राणीमें आते हैं, ये दोनों अत्यन्त भयंकर होते हैं। इन दोनों ज्वरोंको सहन करना रोगीके लिये अतिशय कठिन है। अभिचारजन्य ज्वर तान्त्रिकोंके द्वारा प्रयुक्त मन्त्रोंसे शरीरमें आता है। इसमें मन्त्र-प्रभावके कारण उत्पन्न किये गये असह्य कष्टोंसे प्राणी संतप्त होता रहता है। इसी अभिचार-मन्त्रके द्वारा इसकी पूर्वावस्थाकी जानकारी करनी चाहिये, तत्पश्चात् शरीरपर विचार करना अपेक्षित है। उसके बाद रोगीमें उठे हुए संतापसे विस्फोट तथा दिग्भ्रमित दाह, मूर्च्छा, चेतना आदिसे ज्वरका परीक्षण करना उचित होता है। अन्यथा उस रोगीमें सर्वप्रथम प्रदाह और मूर्च्छाका प्रकोप होता है। उसके बाद ज्वर प्रतिदिन बढ़ता रहता है।

इस प्रकार संक्षेपमें<sup></sup> आठ प्रकारका ज्वर देखा गया, किंतु वह विभिन्न प्रकारका होता है—यथा—शारीरिक, मानसिक, सौम्य, तीक्ष्ण, अन्तर्बाह्य, प्राकृत, वैकृत, साध्य, असाध्य, सामज्वर और निरामज्वर इसके विविध रूप हैं।

ज्वर होनेपर प्रथम शरीरमें शारीरिक, मनमें मानसिक ज्वर आनेपर पहले मनमें अनन्तर शरीरमें ताप होता है। प्राकृतिक वायुके बाह्य-प्रभावसे नाक-कान तथा मुँह आदिके द्वारा जो वायु ग्रहण की जाती है, उसके कारण कफ मिश्रित होता है, तब शरीरमें शीत बढ़ जाता है। पित्त-मिश्रित शरीर होनेपर शरीरमें दाह होता है। कफ तथा पित्त दोनोंकी मिश्रित-अवस्थामें शीत और दाहका मिश्रित प्रभाव पड़ता है। इसलिये वात-कफ-ज्वर सौम्य तथा वात-पित्त-


१-च०चि०अ० ३, अ०हृ०नि०अ० २। २-अ०हृ०नि०अ० २।४६।

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