गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 268, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ें| २५८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
भी अवस्थित रह सकता है। दुर्बल तथा व्याधिमुक्त रोगीके मिथ्याहारादि (अपथ्य)-सेवनसे शरीरमें प्रविष्ट अल्प दोष भी अन्य दूसरे दोषोंसे शक्ति ग्रहणकर महाबलवान् हो जाते हैं। जिस उपचार या पथ्यके कारण ज्वर बढ़ता और घटता है, उसे प्रत्यनीक कहते हैं। यह ज्वर विक्षेप, क्षय तथा वृद्धिसे युक्त रहता है। उपर्युक्त मिथ्याहारका सेवन करनेवाले मनुष्यके देहमें वातादि दोषोंमेंसे कोई-सा बलवान् दोष अपने प्रकोपकालमें संतत आदि ज्वर उत्पन्न करता है। परंतु यह तभी सम्भव है, जब उसे अपने पक्षके किसी रसादि दूष्य पदार्थसे सहायता मिले, सहायता न मिलनेपर वह बलहीन होकर क्षीण हो जाता है।
क्षीण हो रहे दोषसे युक्त ज्वर सूक्ष्म होता है, जो शरीरके अंदर विद्यमान रसादिक^१ सप्त धातुओंमें ही लीन रहता है। रस आदिमें सूक्ष्मभावसे विद्यमान रहनेके कारण वह ज्वर शरीरमें कृशता, विवर्णता और जडतादिको उत्पन्न कर देता है। रसवाही स्रोतोंके मुख खुले होनेके कारण ज्वरको उत्पन्न करनेवाले दोष उन स्रोतोंमें प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त हो जाते हैं। इस कारण संतत-ज्वर निरन्तर रहता है और उक्त हेतुके विपरीत होनेपर सम्पूर्ण स्रोत दूरवर्ती सूक्ष्म मुखवाले होते हैं। इसलिये ज्वरको उत्पन्न करनेवाले दोष विलम्बमें प्रविष्ट होते हैं अर्थात् सम्पूर्ण देहमें फैलने नहीं पाते, इसलिये विच्छिन्न कालमें सततादि ज्वरको उत्पन्न करते हैं। अतः सततादि ज्वर संतत-ज्वरसे विपरीत होता है।
विषमसंज्ञक^२ ज्वरका प्रारम्भ, क्रिया और काल विषम होता है तथा यह ज्वर दीर्घ कालानुबन्धी होता है, प्रायः रक्ताश्रित दोष सतत-ज्वरको उत्पन्न करता है। यह ज्वर अहोरात्रमें दो बार होता है अर्थात् दिनमें एक बार, रातमें एक बार अथवा कभी दिनमें दो बार, रातमें दो बार। जब दोष मांसवाही नाड़ीमें आश्रित होकर अन्येद्यु नामक विषम ज्वरको उत्पन्न करता है, तब यह दिन-रातमें एक बार होता है। उसी ज्वरके प्रभावमें जब मांसवाही एवं मेदावाही नाड़ियाँ भी प्रकुपित दोषके संसर्गमें आ जाती हैं, वह लक्षण तृतीयक (तिजरिया) ज्वरके अन्तर्गत मान लिया जाता है।
तृतीयक ज्वर तीन प्रकारका होता है—वात-पित्ताधिक्य, कफ-पित्ताधिक्य और वात-कफाधिक्य। प्रथम दिन पित्त और वायुके प्रकुपित होनेसे ज्वर मस्तकका ग्राही हो जाता है। दूसरे दिन कफ तथा पित्तके प्रकोपसे वह रीढ़की हड्डीमें प्रविष्ट हो जाता है और तीसरे दिन वायु एवं कफसे दूषित होनेसे वह ज्वर सम्पूर्ण पीठपर अधिकार कर लेता है। अर्थात् पित्त और वायुके प्रकुपित होनेसे ज्वर-प्रभावके कारण पहले दिन रोगीका मस्तक जलने लगता है और उसमें पीड़ा होती है। दूसरे दिन कफ तथा पित्तके प्रकुपित होनेसे रीढ़की हड्डीमें दर्द होता है, तीसरे दिन वायु एवं कफके दोषजन्य प्रभावके बढ़नेसे रोगीको ताप तो होता ही है, किंतु उसकी समस्त पीठमें पीड़ा होती है। यह ज्वर एक-एक दिनका अन्तराल छोड़कर शरीरके तीनों भागोंको प्रभावित करता है, इसीलिये इसको 'एकाहान्तर' नामसे स्वीकार किया गया है।
वात-पित्त और कफजन्य दोषके कारण शरीरके अंदर अधिक बननेवाले मलके द्वारा ज्वर जब मेदा-मज्जा-हड्डी तथा अन्य स्थितियोंमें पहुँच जाता है, तब उसको चतुर्थक ज्वर कहा जाता है। लौकिक भाषामें इसीको लोग 'चौथिया बुखार' कहते हैं। जब यही ज्वर मज्जाभागमें प्रविष्ट होता है तो यह दूसरे प्रकारका हो जाता है और इसका
१-रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र—ये सात धातु शरीरको धारण करते हैं। २-च०चि०अ० ३, अ०हृ० नि० अ० २।