गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 396, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३८६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
व्यवहारमें अर्थका महत्त्व है। जैसे नदियोंके मूल पर्वत हैं, वैसे ही समस्त कार्योंका मूल अर्थ है; इसीलिये अर्थको उत्पन्न करना एवं बढ़ाना आवश्यक होता है। अर्थ उसे ही कहते हैं, जो हमारे सभी कार्योंकी सम्पन्नतामें अनिवार्यरूपसे उपयोगी हो। इसी दृष्टिसे सभी रत्नोंकी निधि पृथ्वी, धान्य, पशु, स्त्रियाँ आदि अर्थ माने जाते हैं। इस तरह अर्थका महत्त्व होनेपर भी इसके अर्जनमें संयम आवश्यक है; अतएव विशेषकर ब्राह्मणको अपनी जीविकाके लिये अर्थार्जन करते समय यह ध्यानमें रखना चाहिये कि यदि आपत्तिकाल नहीं है तो किसी भी प्राणीके साथ द्रोह न करना पड़े अथवा कम-से-कम द्रोह करना पड़े।
धन तीन प्रकारका माना गया है—शुक्ल, शबल (मिश्रित) और कृष्ण। उस धनके सात विभाग हैं। सभी वर्णोंको प्राप्त होनेवाला धन तीन प्रकारका होता है—१-दायभागके अनुसार वंशपरम्परासे यथाधिकार प्राप्त धन, २-प्रेमके कारण किसीके द्वारा दिया गया धन और ३-यथाविधि विवाहित पत्नीके साथ प्राप्त धन। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणके लिये तीन प्रकारके विशेष धन हैं— याजन (यज्ञ करानेसे प्राप्त), अध्यापनसे प्राप्त तथा विशुद्ध प्रतिग्रह (सत्पात्रसे लिया गया दान)। क्षत्रिय वर्णका विशेष धन भी तीन प्रकारका कहा गया है—करसे प्राप्त धन उसका पहला धन है, दूसरा धन दण्डद्वारा प्राप्त तथा तीसरा धन वह है जो विजयद्वारा प्राप्त हो। वैश्यका भी तीन प्रकारका विशेष धन है—खेतीसे प्राप्त, गोपालनसे प्राप्त तथा व्यापारसे प्राप्त। शूद्रका विशेष धन एक ही प्रकारका है, जो उपर्युक्त वर्णोंकी कृपासे उसको प्राप्त होता है। आपत्तिकालमें ब्राह्मण एवं क्षत्रिय स्वयं ब्याजसे, खेतीसे तथा व्यापारसे धन अर्जित कर सकते हैं, आपत्तिकालमें ऐसा करनेपर पाप नहीं होता है।
ऋषियोंके द्वारा जीवनयापनके लिये बहुत-से उपाय बताये गये हैं, उनमें कुसीद (ब्याज) सभी वर्णोंके लिये बताये गये विशेष उपायोंकी अपेक्षा अधिक है। अनावृष्टि, राजभय तथा चूहा आदि जीव-जन्तुओंके उपद्रवोंसे कृषि आदिमें बाधा आ जाती है, किंतु कुसीद-वृत्तिमें यह बाधा नहीं आती। शुक्लपक्ष हो, कृष्णपक्ष हो, रात्रि हो, दिन हो, गर्मी हो, वर्षा अथवा शीत हो—सभी दशाओंमें कुसीदसे होनेवाली धनवृद्धि रुकती नहीं है। अर्थात् सूदपर दिया गया धन बढ़ता ही रहता है। नाना प्रकारके व्यापारिक कार्योंमें संलग्न वणिक्-जनोंकी जो धनकी अभिवृद्धि दूसरे देशमें जानेसे होती है, वही अभिवृद्धि कुसीद-वृत्ति करनेसे घरमें बैठे-ही-बैठे प्राप्त हो जाती है।
शास्त्रसम्मत विधिसे अर्जित धनके लाभांशसे सभी लोगोंको पितृगण, देवगण तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। ये संतुष्ट होकर धन-अर्जनमें अज्ञानवश हुए दोषको निःसंदेह शान्त कर देते हैं। जो वणिक् ब्याजके द्वारा (धनार्जनके लिये) वस्त्र, गौ तथा स्वर्णादि देता है और जो किसान अन्न, पेय पदार्थ, सवारी, शय्या तथा आसन आदि (ब्याज-वृत्तिमें) देता है, वह (उपार्जित धनका) बीसवाँ भाग और पशु-स्वर्णादिका १००वाँ भाग राजाको देकर शेष बचे हुए धनके चतुर्थांशसे जौ (यव) आदि विभिन्न वस्तुओंका सञ्चय करे। दो-चौथाई अर्थात् आधे धनका उपयोग अपने भरण-पोषण तथा नित्य-नैमित्तिक कार्यके लिये होना चाहिये। जो एक-चौथाई धन शेष बचे, उसका उपयोग मूलधनकी वृद्धिमें करना चाहिये।
विद्या, शिल्प, वेतन, सेवा, गोरक्षा, व्यापार, कृषि, वृत्ति*, भिक्षा और ब्याज—ये दस जीवनयापनके
* वृत्ति—सहायताके रूपमें प्रतिमास दी जानेवाली धनराशि।