गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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नामसंकीर्तनकी महिमा
**सूतजीने कहा—**मुक्तिके कारणभूत, अनादि, अनन्त, अज, नित्य, अव्यय और अक्षय भगवान् विष्णुको जो मनुष्य नमन करता है, वह समस्त संसारके लिये नमस्कारके योग्य हो जाता है। मैं आनन्दस्वरूप, अद्वैत, विज्ञानमय, सर्वव्यापक एवं सभीके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान् विष्णुको भक्तिभावसे भरे हुए एकाग्र-मनसे सदा प्रणाम करता हूँ। जो ईश्वर अन्तःकरणमें विराजमान रहकर सभीके शुभाशुभ कर्मोंको देखते हैं, उन सर्वसाक्षी परमेश्वर विष्णुको मेरा नमन है।
शरीरमें शक्ति रहते हुए जो मनुष्य भगवान् चक्रपाणि विष्णुको प्रणाम नहीं करता, उससे इस संसारके अति तुच्छ तृण भी उद्विग्न रहते हैं। जलसे परिपूर्ण नूतन-श्यामल मेघों-जैसी सुन्दर कान्तिवाले, लोकनाथ, परमपुरुष तथा अप्रमेय भगवान् कृष्णको भाव-विभोर होकर दृढ़ भक्तिके साथ मात्र एक बार किया गया प्रणाम श्वपच (चाण्डाल)-को भी तत्काल उत्तम गति देनेमें सक्षम है। जो व्यक्ति पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम करते हुए भगवान् हरिकी पूजा करता है, उसको वह गति प्राप्त होती है, जो सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे भी सम्भव नहीं है। जंगल एवं समुद्रकी भाँति दुर्गम संसारमें दौड़ते हुए पुरुषोंको कृष्णके लिये उनके द्वारा किया गया एक ही प्रणाम उन्हें मुक्ति प्रदान करके तार देगा। बैठा हो, शयन कर रहा हो अथवा जहाँ कहीं भी रह रहा हो—हर स्थितिमें कल्याणकामी पुरुषको 'नमो नारायणाय' मन्त्रका स्मरण करना चाहिये। 'नारायण' यह शब्द सुलभ है और वागिन्द्रिय मनुष्यके वशमें है, फिर भी मूर्ख मनुष्य नरकमें गिरता है, इससे बढ़कर आश्चर्य क्या होगा! यदि कोई चार मुखोंसे युक्त हो जाय अथवा उसके करोड़ों मुख हो जायँ, चाहे कोई विशुद्ध चित्तवाला मनुष्य हो, फिर भी वह देवश्रेष्ठ भगवान् विष्णुके गुणोंसे सम्बन्धित दस हजारवें भागका भी वर्णन नहीं कर सकता। मधुसूदन (श्रीविष्णु)-की स्तुति करनेवाले व्यास आदि मुनि अपनी बुद्धिकी क्षीणताके कारण श्रीविष्णुके गुण-वर्णनसे विरत होते हैं न कि श्रीविष्णुके गुणोंकी इयत्ताके कारण। सिंहसे डरकर मृग जैसे तत्काल भाग जाते हैं वैसे ही श्रीविष्णुके नामोंका कीर्तन करनेसे अशक्त व्यक्तिके भी सभी पातक तत्काल नष्ट हो जाते हैं और निष्पाप होनेके कारण वह व्यक्ति अपने पूरे परिवारके साथ मोक्षके लिये संनद्ध हो जाता है।
स्वप्नमें भी भगवान् नारायणका नाम लेनेवाला मनुष्य अपनी अक्षय पापराशिको विनष्ट कर देता है। यदि कोई मनुष्य प्रबोध-दशामें परात्पर विष्णुका नाम लेता है तो फिर उसके विषयमें कहना ही क्या? 'हे कृष्ण! हे अच्युत! हे अनन्त! हे वासुदेव! आपको नमस्कार है।' ऐसा कहकर जो भक्तिभावसे श्रीविष्णुको प्रणाम करते हैं, वे यमपुरी नहीं जाते। अग्निके प्रज्वलित होनेपर अथवा सूर्यके उदित हो जानेपर जैसे अन्धकार विनष्ट हो जाता है, वैसे ही हरिका नामसंकीर्तन करनेसे प्राणियोंके पाप-समूहका विनाश हो जाता है। नामसंकीर्तनसे जिस नित्य सर्वोत्तम अक्षय सुखका अनुभव होता है, उसके सम्मुख अनित्य क्षयशील स्वर्गसुख सर्वथा नगण्य है। जिनका चित्त श्रीकृष्णचिन्तनमें ही प्रतिक्षण रम रहा है, उनके लिये श्रीकृष्णधामतक पहुँचनेके लंबे मार्गमें श्रीकृष्णनामसंकीर्तन सर्वोत्तम पाथेय (अनुपम अवलम्ब) है। संसाररूपी सर्पके दंशसे व्याप्त विषके भयंकर उपद्रवको शान्त करनेके लिये एकमात्र औषध 'श्रीकृष्ण' नाम है। इस वैष्णव मन्त्रका जप करके मनुष्य संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है—