गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२०६- कुलामृतस्तोत्र
काण्ड ] नामसंकीर्तनकी महिमा ४१९
नामसंकीर्तनकी महिमा
**सूतजीने कहा—**मुक्तिके कारणभूत, अनादि, अनन्त, अज, नित्य, अव्यय और अक्षय भगवान् विष्णुको जो मनुष्य नमन करता है, वह समस्त संसारके लिये नमस्कारके योग्य हो जाता है। मैं आनन्दस्वरूप, अद्वैत, विज्ञानमय, सर्वव्यापक एवं सभीके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान् विष्णुको भक्तिभावसे भरे हुए एकाग्र-मनसे सदा प्रणाम करता हूँ। जो ईश्वर अन्तःकरणमें विराजमान रहकर सभीके शुभाशुभ कर्मोंको देखते हैं, उन सर्वसाक्षी परमेश्वर विष्णुको मेरा नमन है।
शरीरमें शक्ति रहते हुए जो मनुष्य भगवान् चक्रपाणि विष्णुको प्रणाम नहीं करता, उससे इस संसारके अति तुच्छ तृण भी उद्विग्न रहते हैं। जलसे परिपूर्ण नूतन-श्यामल मेघों-जैसी सुन्दर कान्तिवाले, लोकनाथ, परमपुरुष तथा अप्रमेय भगवान् कृष्णको भाव-विभोर होकर दृढ़ भक्तिके साथ मात्र एक बार किया गया प्रणाम श्वपच (चाण्डाल)-को भी तत्काल उत्तम गति देनेमें सक्षम है। जो व्यक्ति पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम करते हुए भगवान् हरिकी पूजा करता है, उसको वह गति प्राप्त होती है, जो सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे भी सम्भव नहीं है। जंगल एवं समुद्रकी भाँति दुर्गम संसारमें दौड़ते हुए पुरुषोंको कृष्णके लिये उनके द्वारा किया गया एक ही प्रणाम उन्हें मुक्ति प्रदान करके तार देगा। बैठा हो, शयन कर रहा हो अथवा जहाँ कहीं भी रह रहा हो—हर स्थितिमें कल्याणकामी पुरुषको 'नमो नारायणाय' मन्त्रका स्मरण करना चाहिये। 'नारायण' यह शब्द सुलभ है और वागिन्द्रिय मनुष्यके वशमें है, फिर भी मूर्ख मनुष्य नरकमें गिरता है, इससे बढ़कर आश्चर्य क्या होगा! यदि कोई चार मुखोंसे युक्त हो जाय अथवा उसके करोड़ों मुख हो जायँ, चाहे कोई विशुद्ध चित्तवाला मनुष्य हो, फिर भी वह देवश्रेष्ठ भगवान् विष्णुके गुणोंसे सम्बन्धित दस हजारवें भागका भी वर्णन नहीं कर सकता। मधुसूदन (श्रीविष्णु)-की स्तुति करनेवाले व्यास आदि मुनि अपनी बुद्धिकी क्षीणताके कारण श्रीविष्णुके गुण-वर्णनसे विरत होते हैं न कि श्रीविष्णुके गुणोंकी इयत्ताके कारण। सिंहसे डरकर मृग जैसे तत्काल भाग जाते हैं वैसे ही श्रीविष्णुके नामोंका कीर्तन करनेसे अशक्त व्यक्तिके भी सभी पातक तत्काल नष्ट हो जाते हैं और निष्पाप होनेके कारण वह व्यक्ति अपने पूरे परिवारके साथ मोक्षके लिये संनद्ध हो जाता है।
स्वप्नमें भी भगवान् नारायणका नाम लेनेवाला मनुष्य अपनी अक्षय पापराशिको विनष्ट कर देता है। यदि कोई मनुष्य प्रबोध-दशामें परात्पर विष्णुका नाम लेता है तो फिर उसके विषयमें कहना ही क्या? 'हे कृष्ण! हे अच्युत! हे अनन्त! हे वासुदेव! आपको नमस्कार है।' ऐसा कहकर जो भक्तिभावसे श्रीविष्णुको प्रणाम करते हैं, वे यमपुरी नहीं जाते। अग्निके प्रज्वलित होनेपर अथवा सूर्यके उदित हो जानेपर जैसे अन्धकार विनष्ट हो जाता है, वैसे ही हरिका नामसंकीर्तन करनेसे प्राणियोंके पाप-समूहका विनाश हो जाता है। नामसंकीर्तनसे जिस नित्य सर्वोत्तम अक्षय सुखका अनुभव होता है, उसके सम्मुख अनित्य क्षयशील स्वर्गसुख सर्वथा नगण्य है। जिनका चित्त श्रीकृष्णचिन्तनमें ही प्रतिक्षण रम रहा है, उनके लिये श्रीकृष्णधामतक पहुँचनेके लंबे मार्गमें श्रीकृष्णनामसंकीर्तन सर्वोत्तम पाथेय (अनुपम अवलम्ब) है। संसाररूपी सर्पके दंशसे व्याप्त विषके भयंकर उपद्रवको शान्त करनेके लिये एकमात्र औषध 'श्रीकृष्ण' नाम है। इस वैष्णव मन्त्रका जप करके मनुष्य संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है—
२०७- मृत्वष्टकस्तोत्र
| ४२० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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पाथेयं पुण्डरीकाक्ष नामसंकीर्तनं हरेः।
संसारसर्पदंशष्टविषचेष्टैकभेषजम् ॥
(२२८।१७)
कृतयुगमें भगवान् हरिका ध्यान करते हुए, त्रेतायुगमें इन्हीं भगवान् हरिके मन्त्रोंका जप करते हुए, द्वापरमें इन्हींकी पूजा करते हुए, जो फल प्राणियोंको प्राप्त होता है, वही फल कलियुगमें मनुष्य उन्हीं भगवान् 'केशव' के स्मरणमात्रसे प्राप्त कर लेता है—
ध्यायन् कृते जपन् मन्त्रैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्।
यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संस्मृत्य केशवम्॥
(२२८।१८)
जिस व्यक्तिकी जिह्वाके अग्रभागमें 'हरि' ये दो अक्षर विद्यमान होते हैं, वह इस संसारसागरको पार कर विष्णु-पदको प्राप्त करनेमें सफल हो जाता है—
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जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्।
संसारसागरं तीर्त्वा स गच्छेद्वैष्णवं पदम्॥
(२२८।१९)
ज्ञानपूर्वक किये गये हजारों पापोंसे परिशुद्धि प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाले व्यक्तिके लिये भगवान्का नाम परम कल्याणकारी है। भगवान् नारायणके स्तवन और गुणानुवादसे भरी हुई कथाओंके श्रवणमें निमग्न रहनेवाला व्यक्ति स्वप्नमें भी इस संसारको नहीं देखता—
विज्ञातदुष्कृतिसहस्रसमावृतोऽपि
श्रेयः परं तु परिशुद्धिमभीप्समानः।
स्वप्नान्तरे न हि पुनश्च भवं स पश्ये-
न्नारायणस्तुतिकथापरमो मनुष्यः॥
(२२८।२०)
(अध्याय २२८)
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विष्णुपूजामें श्रद्धा-भक्तिकी महिमा
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सूतजीने पुनः कहा— हे शौनक! समस्त लोकोंके स्वामी भगवान् हरिकी आराधना ही सार है। पुरुषसूक्तके* द्वारा जो मनुष्य पुष्प और जल आदि उस परात्पर देवको समर्पित करता है, वह सम्पूर्ण चराचर जगत्की पूजा कर लेता है। जो विष्णुकी पूजा नहीं करते, उन्हें ब्रह्मघाती समझना चाहिये। जिन भगवान्से समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है और यह समस्त चराचर जगत् जिनसे व्याप्त है, उन विष्णुका जो ध्यान नहीं करता, वह विष्ठाका कृमि होता है। नरकलोकमें होनेवाले कष्टोंसे संतप्त हो रहे पापी जीवसे यमराज स्वयं पूछते हैं कि क्या तुमने कष्टविनाशक भगवान् विष्णुदेवका पूजन नहीं किया था? द्रव्योंका अभाव होनेपर मात्र जलसे ही पूजा करनेपर जो देव प्रसन्न होकर
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स्वयं अपने ही लोकको दे देते हैं, क्या तुमने उनकी पूजा नहीं की थी?
श्रद्धापूर्वक की गयी पूजासे संतुष्ट भगवान् हृषीकेश मनुष्यका जो उपकार करते हैं, वह न माता करती है, न पिता करता है और न तो उसका भाई ही करता है। वर्णाश्रम-धर्मका आचरण करनेवाले मनुष्यके द्वारा यदि भगवान् विष्णुकी पूजा होती है तो वे (श्रीविष्णु) उस पूजासे संतुष्ट हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है, जो उनको संतुष्ट कर सके। न तो वे प्राणियोंके द्वारा दिये गये विभिन्न प्रकारके दानसे उतना संतृप्त होते हैं, न तो पुष्पोपहार और भाँति-भाँतिके सुगन्धित पदार्थोंके अनुलेपनसे उतना संतुष्ट होते हैं, जितना भक्तिसे। सम्पत्ति, ऐश्वर्य, माहात्म्य,
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* 'सहस्रशीर्षा पुरुषः' आदि १६ मन्त्र 'पुरुषसूक्त'-रूपमें प्रसिद्ध हैं। ये मन्त्र सभी वेदोंकी संहितामें उपलब्ध हैं।
२०८- अच्युतस्तोत्र
काण्ड ] विष्णुभक्तिका माहात्म्य ४२१
पुत्र-पौत्रादिक संतान तथा अन्यान्य कर्मसम्पादनसे भी भगवान् हरि संतुष्ट नहीं होते। विमुक्तजनोंके लिये भी हरिका ऐक्य श्रीहरिकी आराधनासे ही प्राप्त होता है; क्योंकि श्रीहरिकी आराधना ही ऐक्यभावका मूल है।
(अध्याय २२९)
विष्णुभक्तिका माहात्म्य
सूतजीने कहा— सभी शास्त्रोंका अवलोकन करके तथा पुनः-पुनः विचार करके यह एक ही निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्यको सदैव भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये—
आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥
( २३०।१)
जो व्यक्ति एकनिष्ठ होकर नित्य उस नारायणका ध्यान करता है, उसके लिये नाना प्रकारके दान, विभिन्न तीर्थोंका परिभ्रमण, तपस्या और यज्ञोंका सम्पादन करनेसे क्या प्रयोजन? अर्थात् श्रीमन्नारायणका ध्यान सर्वोत्कृष्ट है।
छियासठ हजार तीर्थ भगवान् नारायणके प्रणामकी सोलहवीं कलाकी भी बराबरी नहीं कर सकते। समस्त प्रायश्चित्त और जितने भी तप-कर्म हैं, इन सभीमें भगवान् कृष्णका स्मरण ही सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा समझना चाहिये। जिस पुरुषकी अनुरक्ति सदैव पापकर्ममें रहती है, उसके लिये एकमात्र श्रेष्ठतम प्रायश्चित्त भगवान् हरिका स्मरण है।
जो प्राणी एक मुहूर्तभर भी निरालस्य होकर नारायणका ध्यान कर लेता है, वह स्वर्ग प्राप्त करता है, फिर नारायणमें अनन्य-परायण भक्तके विषयमें क्या कहा जाय—
मुहूर्तमपि यो ध्यायेन्नारायणमतन्द्रितः।
सोऽपि स्वर्गतिमाप्नोति किं पुनस्तत्परायणः॥
(२३०।६)
जो मनुष्य योगपरायण है अथवा योगसिद्ध है, उसकी चित्तवृत्ति जागते, स्वप्न देखते तथा सुषुप्तावस्थामें भगवान् अच्युतके ही आश्रित होती है। उठते, गिरते, रोते, बैठते, खाते, जागते भगवान् गोविन्द माधव विष्णुका स्मरण करना चाहिये।
अपने-अपने कर्ममें संलग्न रहते हुए भगवान् जनार्दन हरिमें ही चित्तको अनुरक्त रखना चाहिये, ऐसा शास्त्रका कथन है। अन्य बहुत-सी बातोंको कहनेसे क्या लाभ—
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः कुर्याच्चित्तं जनार्दने।
एषा शास्त्रानुसारोक्तिः किमन्यैर्बहुभाषितैः॥
( २३०।९)
ध्यान ही परम धर्म है, ध्यान ही परम तप है, ध्यान ही परम शुद्धि है, अतः मनुष्यको (भगवद्) ध्यानपरायण होना चाहिये। विष्णुके ध्यानसे बढ़कर अन्य कोई ध्यान नहीं है, उपवाससे बढ़कर अन्य कोई तपस्या नहीं है, अतः भगवान् वासुदेवके चिन्तनको ही अपना प्रधान कर्म मानना चाहिये। इस लोक और परलोकमें प्राणीके लिये जो कुछ दुर्लभ है, जो अपने मनसे भी सोचा नहीं जा सकता, वह सब बिना माँगे ही ध्यानमात्र करनेसे मधुसूदन प्रदान कर देते हैं।
यज्ञ आदि उत्तम कर्म करते समय प्रमादवश स्खलनसे जो न्यूनता होती है, वह विष्णुके स्मरणमात्रसे सम्पूर्णतामें परिवर्तित हो जाती है, ऐसा श्रुतिवचन है—
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्।
स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः॥
( २३०।१३)
पापकर्म करनेवालोंकी शुद्धिका ध्यानके समान
| ४२२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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अन्य कोई साधन नहीं है। यह ध्यान पुनर्जन्म देनेवाले कारणोंको भस्म करनेवाली योगाग्नि है। समाधि (ध्यानयोग)-से सम्पन्न योगी योगाग्निसे तत्काल अपने समस्त कर्मोंको नष्ट करके इसी जन्ममें मुक्ति प्राप्त कर लेता है। वायुके सहयोगसे ऊँचे उठनेवाली ज्वालासे युक्त अग्नि जैसे अपने आश्रय कक्ष (कमरे)-को जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही योगी (ध्यानयोगी)-के चित्तमें स्थित श्रीविष्णु योगीके समस्त पापोंको भस्म कर देते हैं। जैसे अग्निके संयोगसे सोना मलरहित हो जाता है, वैसे ही मनुष्योंका मल भगवान् वासुदेवके सांनिध्यसे विनष्ट हो जाता है।
हजारों बार गङ्गास्नान तथा करोड़ों बार पुष्कर नामक तीर्थमें स्नान करनेसे जो पाप नष्ट होता है, वह हरिका मात्र स्मरण करनेसे नष्ट हो जाता है। हजारों प्राणायाम करनेसे जो पाप नष्ट होता है, वही पाप क्षणमात्र भगवान् हरिका ध्यान करनेसे निश्चित ही नष्ट हो जाता है। जिस मनुष्यके हृदयमें भगवान् केशव विराजमान हैं, उसके मानसपर उन दुष्ट उक्तियों तथा पाखण्डका प्रभाव नहीं पड़ता, जो कलिके प्रभावसे प्रवृत्त हैं। जिस समय हरिका स्मरण किया जाता है, वही तिथि, वही दिन, वही रात्रि, वही योग, वही चन्द्रबल और वही लग्न सर्वश्रेष्ठ है। जिस मुहूर्त या क्षणमें वासुदेवका चिन्तन नहीं होता, वह मुहूर्त या क्षण हानिका समय है। वह अत्यन्त व्यर्थ है। वह किसी भी प्रकारके लाभसे रहित होनेके कारण मूर्खता एवं मूकता (गूँगेपन)-का समय है।
जिसके हृदयमें भगवान् गोविन्द विद्यमान हैं, उसके लिये कलियुग भी सत्ययुग ही है। इसके विपरीत जिसके हृदयमें अच्युत भगवान् गोविन्दका वास नहीं है, उसके लिये तो सत्ययुग भी कलियुग ही है। जिसका चित्त आगे और पीछे, चलते तथा बैठते, सदैव भगवान् गोविन्दमें रमा हुआ है, वह व्यक्ति सदा ही कृतकृत्य है—
कलौ कृतयुगं तस्य कलिस्तस्य कृते युगे।
<div align="right">(२३०। २३-२४)</div>
हृदये यस्य गोविन्दो यस्य चेतसि नाच्युतः॥
यस्याग्रतस्तथा पृष्ठे गच्छतस्तिष्ठतोऽपि वा।
गोविन्दे नियतं चेतः कृतकृत्यः सदैव सः॥
हे मैत्रेय! जप, होम एवं पूजा आदिके द्वारा जिसका मन वासुदेव श्रीकृष्णकी आराधनामें अनुरक्त है, उसके लिये इन्द्र आदिका पद विघ्नके समान है।
जिन्होंने श्रीकेशवके चरणोंमें अपने मनको अर्पित कर दिया है, वे गृहस्थाश्रमका परित्याग बिना किये ही, कठिन तपश्चर्या बिना किये ही पौरुषी (पुरुषोत्तम परब्रह्मकी शक्ति) मायाके जालको काट डालते हैं।
गोविन्द दामोदरका हृदयमें वास रहनेपर मनुष्य क्रोधियोंके प्रति क्षमा, मूर्खोके प्रति दया और धर्ममें संलग्न प्राणियोंके प्रति प्रसन्नता प्रकट करते हैं—
क्षमां कुर्वन्ति क्रुद्धेषु दयां मूर्खेषु मानवाः।
<div align="right">(२३०। २७)</div>
मुदं च धर्मशीलेषु गोविन्दे हृदयस्थिते॥
स्नान-दान आदि कर्मोंमें तथा विशेष रूपसे सभी प्रकारके दुष्कर्मोंका प्रायश्चित्त करते समय भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये।
जिनके हृदयमें नीलकमलके समान सुन्दर श्यामवर्ण भगवान् हरि विराजमान रहते हैं, उन्हींको वास्तविक लाभ और जय प्राप्त होते हैं। उनका पराभव कैसे हो सकता है—
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराभवः।
<div align="right">(२३०। २९)</div>
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥
हरिमें समर्पित चित्तवाले कीड़े-मकोड़े, पक्षी आदि जीव-जन्तुओंकी भी ऊर्ध्व (उत्तम) गति
काण्ड ] विष्णुभक्तिका माहात्म्य ४२३
होती है। फिर ज्ञानसम्पन्न मनुष्योंकी गतिके विषयमें कहना ही क्या—
कीटपक्षिगणानां च हरौ संन्यस्तचेतसाम्।
ऊर्ध्व्वा ह्येव गतिश्चास्ति किं पुनर्ज्ञानिनां नृणाम्॥
(२३०।३०)
भगवान् वासुदेवरूपी वृक्षकी छाया न तो अधिक शीतल होती है और न अधिक तापकारक होती है। नरकके द्वारका शमन करनेवाली (नरकमें जानेसे रोकने-वाली) इस छायाका सेवन क्यों नहीं किया जाय—
वासुदेवतरुच्छाया नातिशीतातितापदा।
नरकद्वारशमनी सा किमर्थं न सेव्यते॥
(२३०।३१)
हे मित्र! भगवान् मधुसूदनको अपने हृदयमें अहर्निश प्रतिष्ठित रखनेवाले प्राणीका विनाश करनेमें न तो महाक्रोधी दुर्वासाका शाप समर्थ है और न तो देवराज इन्द्रका शासन ही समर्थ है—
न च दुर्वाससः शापो राज्यं चापि शचीपतेः।
हन्तुं समर्थं हि सखे हृत्कृते मधुसूदने॥
(२३०।३२)
बोलते हुए, रुकते हुए अथवा इच्छानुसार अन्य कार्य करते हुए भी यदि भगवद्विषयक चिन्तन निरन्तर बना रहे तो धारणा (ध्येयपर चित्तकी स्थिरता)-को सिद्ध हुआ मानना चाहिये—
वदतस्तिष्ठतोऽन्यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः।
नापयाति यदा चिन्ता सिद्धां मन्येत धारणाम्॥
(२३०।३३)
सूर्यमण्डलके मध्य विराजमान रहनेवाले, कमलासनपर सुशोभित, केयूर*, मकराकृतकुण्डल और मुकुटसे अलंकृत, दिव्य हारसे युक्त, मनोहारिणी सुन्दर स्वर्णिम आभासे युक्त शरीरवाले, शंख-चक्रधारी भगवान् विष्णुका सदैव ध्यान करना चाहिये—
ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती
नारायणः सरसिजासनसंनिविष्टः।
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी
हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥
(२३०।३४)
इस संसारमें भगवान्के ध्यानके समान अन्य कोई पवित्र कार्य नहीं है। श्रीविष्णुके ध्यानमें ही सदा निरत रहनेवाला मनुष्य चाण्डालका भी अन्न खाते हुए इस संसारके पापसे संलिप्त नहीं होता, क्योंकि ऐसा मनुष्य अपने स्वत्वको भगवान्में लीन कर देनेसे भगवन्मय हो जाता है, अतएव उसकी भेददृष्टि पूरी तरह निर्मूल हो जाती है।
प्राणीका चित्त सदा सांसारिक विषयवासनाओंके भोगमें जिस प्रकार अनुरक्त रहता है, यदि उसी प्रकार नारायणमें ही अनुरक्त हो तो इस संसारके बन्धनसे क्यों नहीं विमुक्त हो सकता—
सदा चित्तं समासक्तं जन्तोर्विषयगोचरे।
यदि नारायणेऽप्येवं को न मुच्येत बन्धनात्॥
(२३०।३६)
सूतजीने फिर कहा—हे शौनक! सर्वदा जिसके चित्तमें भगवान् विष्णुकी भक्ति विद्यमान रहती है, वह प्रतिक्षण श्रीविष्णुको ही नमन करता रहता है। इस स्थितिमें वह हरिकृपासे अपनेको पापके समुद्रसे तार लेता है।
वही ज्ञान है जिस ज्ञानका विषय गोविन्द हों, वही कथा है जिस कथामें केशवकी लीला हो, वही कर्म है जो प्रभुके निमित्त किया जाय; अन्य बहुत-सी बातोंको कहनेसे क्या लाभ? जो जिह्वा हरिकी स्तुति करती है वही जिह्वा है, जो चित्त श्रीहरिको समर्पित है वही चित्त है तथा भगवान्की पूजा करनेमें जो हाथ लगे हुए हैं वे ही वास्तविक हाथ हैं—
* बाँहके मूलमें पहना जानेवाला आभूषण, इसे अङ्गद, बिजायट, बाजूबंद आदि भी कहते हैं।
| ४२४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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तज्ज्ञानं यत्र गोविन्दः सा कथा यत्र केशवः।
तत्कर्म यत् तदर्थाय किमन्यैर्बहुभाषितैः॥
सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत् तदर्पितम्।
तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥
(२३०।३८-३९)
मस्तकका फल है भगवान्को नतमस्तक होकर प्रणाम करना, हाथका फल है भगवान्की पूजा करना, मनका फल है उनके गुण और कर्मका चिन्तन करना तथा वाणीका फल है गोविन्दके गुणोंका कीर्तन करना—
प्रणाममीशस्य शिरःफलं विदु-
स्तदर्चनं पाणिफलं दिवौकसः।
मनःफलं तद्गुणकर्मचिन्तनं
वचस्तु गोविन्दगुणस्तुतिः फलम्॥
(२३०।४०)
मनुष्यके पापकर्मकी जो राशि सुमेरु और मन्दराचलके समान विशाल हो गयी हो, वह सम्पूर्ण पापराशि भी भगवान् केशवका स्मरणमात्र करनेसे ही विनष्ट हो जाती है—
मेरुमन्दरमात्रोऽपि राशिः पापस्य कर्मणः।
केशवस्मरणादेव तस्य सर्वं विनश्यति॥
(२३०।४१)
श्रीविष्णुपरायण भक्त अनासक्त-भावसे यदि अपने सभी कर्मोंको श्रीविष्णुके चरणोंमें समर्पित करता है तो उसके कर्म साधु हों या असाधु बन्धनकारक नहीं होते। हे प्रभो! सुर, असुर, मनुष्य, तिर्यक्, स्थावर आदि भेदोंमें विभक्त तृणसे लेकर ब्रह्मापर्यन्त समस्त जगत् आपकी ही मायासे मोहित है।
जिनमें मन लगा देनेसे प्राणी नरकमें नहीं जाता और जिनके चिन्तन-सुखकी तुलनामें स्वर्गकी प्राप्ति विषके समान है तथा ब्रह्मलोककी कामना भी अत्यल्प होनेके कारण किसी भी प्रकार मनमें प्रवेश नहीं पाती, जो अव्यय भगवान् जड बुद्धिवाले मनुष्योंके चित्तमें स्थित होकर उन्हें मुक्ति प्रदान कर देते हैं, उन अच्युतका कीर्तन करनेपर यदि उनमें प्राणीका विलय हो जाता है तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात है* ?
दुःख-सागरको पार करनेके लिये यज्ञ, जप, स्नान और विष्णुका ध्यान तथा पूजन करना चाहिये।
राष्ट्रका आश्रय राजा, बालकका आश्रय पिता और समस्त प्राणियोंका आश्रय धर्म है; किंतु सभीके आश्रय श्रीहरि ही हैं—
राष्ट्रस्य शरणं राजा पितरो बालकस्य च।
धर्मश्च सर्वमर्त्यानां सर्वस्य शरणं हरिः॥
(२३०।४६)
हे मुनिवर! जो लोग जगत्के कारणस्वरूप सनातन भगवान् वासुदेवको नमन करते हैं, उनसे अधिक श्रेष्ठ पुण्यवान् कोई तीर्थ नहीं है। निरालस्य होकर गोविन्दका ध्यान करते हुए उन्हींको समर्पित स्वाध्याय आदि कर्म करना चाहिये। भगवद्भक्त व्यक्ति चाहे शूद्र हो अथवा निषाद हो या चाण्डाल हो, उसे द्विजातियोंके समान ही माननेवाला व्यक्ति नरकमें नहीं जाता। जैसे धनप्राप्तिकी अभिलाषासे धनवान् व्यक्तिकी सदैव सम्मानपूर्वक स्तुति की जाती है, वैसे ही जगत्स्रष्टा श्रीविष्णुकी स्तुति-पूजा आदि की जाय तो क्यों नहीं इस संसारके बन्धनसे मुक्ति हो सकती है ?
जिस प्रकार वनमें लगी हुई अग्नि गीले ईंधनको जलाकर राख कर देती है, उसी प्रकार योगियोंके हृदयमें स्थित भगवान् विष्णु उनके समस्त पापोंको विनष्ट कर देते हैं। जैसे चारों ओरसे लगी हुई
* यस्मिन् न्यस्तमतिर्न याति नरकं स्वर्गोऽपि यच्चिन्तने विघ्नो यत्र न वा विशेत् कथमपि ब्राह्मोऽपि लोकोऽल्पकः।
मुक्तिं चेतसि संस्थितो जडधियां पुंसां ददात्यव्ययः किं चित्रं यदयं प्रयाति विलयं तत्राच्युते कीर्तिते॥ (२३०।४४)
काण्ड ] नृसिंहस्तोत्र तथा उसकी महिमा ४२५
अग्निकी ज्वालासे घिरे हुए पर्वतका आश्रय मृग आदि पशु एवं पक्षी नहीं लेते, वैसे ही सभी पाप योगाभ्यासमें लगे हुए मनुष्यका आश्रय नहीं ग्रहण करते। उन विष्णुके प्रति जिसका विश्वास जितना अधिक दृढ़ होता है, उसको उतनी ही अधिक सिद्धि प्राप्त होती है।
भगवान् कृष्णके ऐसे प्रभावका आकलन कर शत्रुभावसे उन गोविन्दका स्मरण करता हुआ दमघोषका पुत्र शिशुपाल भगवान्में लीन हो गया। यदि कोई मनुष्य भक्तिभावसे विष्णुपरायण है, तो उसके विषयमें क्या कहना? उसकी मुक्ति तो पहलेसे ही सुनिश्चित हो जाती है—
विद्वेषादपि गोविन्दं दमघोषात्मजः स्मरन्।
<p align="right">(२३०।५४)</p> <p align="right">(अध्याय २३०)</p>
शिशुपालो गतस्तत्त्वं किं पुनस्तत्परायणः॥
नृसिंहस्तोत्र तथा उसकी महिमा
सूतजीने कहा—हे शौनक! अब मैं भगवान् शिवद्वारा कही गयी नारसिंहस्तुति (नृसिंहस्तोत्र)-का वर्णन करूँगा।
प्राचीन कालकी बात है, एक बार सभी मातृगणोंने भगवान् शंकरसे कहा कि हे भगवन्! हम सब आपकी कृपासे देव, असुर और मनुष्य आदि जो इस संसारमें प्राणी हैं, उन सबको खायेंगे। हम सभीको आप इसके लिये आज्ञा प्रदान करें।
शंकरजीने कहा—हे मातृकाओ! आप सबके द्वारा संसारकी समस्त प्रजाकी रक्षा होनी चाहिये। इसलिये इस महाभयंकर पापसे आप लोग अपने-अपने मनको शीघ्र वापस कर लें।
भगवान् शंकरके द्वारा ऐसा कहे जानेपर भी मातृकाएँ उनके वचनका अनादर करते हुए त्रिभुवनके समस्त चराचर प्राणियोंको खानेके लिये जुट गयीं। मातृकाओंके द्वारा त्रैलोक्यका भक्षण करते देखकर भगवान् शिवने नृसिंहरूप उन श्रीविष्णुदेवका इस रूपमें ध्यान किया—जो आदि-अन्तसे रहित एवं समस्त चराचर जगत्के कारण हैं, विद्युत्के समान लपलपाती हुई जिनकी जिह्वा है, जिनके बड़े-बड़े महाभयंकर दाँत हैं, जिनकी ग्रीवा देदीप्यमान केसरसे* सुशोभित है, जो रत्नजटित अङ्गद एवं मुकुटसे सुशोभित हैं। जिनका शिरोभाग सोनेके समान दिखायी देनेवाली जटाओंसे युक्त है, जिनके कटिप्रदेशमें सोनेकी करधनी है, जो नीलकमलके समान श्यामवर्णके हैं, जो रत्नखचित पायल धारण किये हुए हैं। जिनके तेजसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड व्याप्त है। जिनका शरीर आवर्ताकार रोमसमूहसे युक्त है और जो देव श्रेष्ठतम पुष्पोंसे गूँथी गयी एक विशाल मालाको धारण किये हुए हैं। इस तरह भगवान् रुद्रने भक्तिपूर्वक जिस रूपमें नारायणका ध्यान किया था, उसी रूपमें ध्यान करनेमात्रसे नृसिंहदेव श्रीविष्णुने उन्हें अपना दर्शन दिया। यह रूप देवताओंके द्वारा भी दुर्निरीक्ष्य था।
शिवने देवेश नृसिंहको प्रणाम करके उन्हें तुष्ट किया और वे इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे। शंकरजीने कहा—
नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ नरसिंहवपुर्धर।
दैत्येश्वरेन्द्रसंहारिनखशुक्तिविराजित ॥
नखमण्डलसंभिन्नहेमपिङ्गलविग्रह ।
नमोऽस्तु पद्मनाभाय शोभनाय जगद्गुरो।
कल्पान्ताम्भोदनिर्घोष सूर्यकोटिसमप्रभ॥
सहस्रयमसंत्रास सहस्रेन्द्रपराक्रम।
सहस्रधनदस्फीत सहस्रचरणात्मक॥
* सिंहकी ग्रीवाके ऊपरी भागके केशसमूहको 'केसर' कहते हैं।
२०९- ब्रह्मज्ञाननिरूपण तथा षडङ्गयोग
| ४२६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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सहस्रचन्द्रप्रतिम सहस्त्रांशुहरिक्रम।
सहस्ररुद्रतेजस्क सहस्रब्रह्मसंस्तुत॥
सहस्ररुद्रसंजप्य सहस्राक्षनिरीक्षण।
सहस्रजन्ममथन सहस्रबन्धमोचन॥
सहस्रवायुवेगाक्ष सहस्त्राज्ञकृपाकर।
(२३१। १२-१६ १/२)
हे समस्त संसारके स्वामी ! हे नृसिंहरूपधारिन् ! हे दैत्यराज हिरण्यकशिपुके वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले ! शुक्तियोंके समान चमकीले नाखूनोंसे सुशोभित देव ! आपको नमस्कार है। हे नखमण्डलकी कान्तिसे मिश्रित सुवर्णके समान देदीप्यमान शरीरवाले ! हे जगद्वन्द्य ! हे शोभासम्पन्न भगवान् पद्मनाभ ! प्रलयकालीन मेघके सदृश गर्जना करनेवाले, करोड़ों सूर्यके समान प्रभासम्पन्न देव ! आपको नमन है। दुष्ट पापियोंको हजारों यमराजके समान भयभीत करनेवाले ! हजारों इन्द्रकी शक्ति अपनेमें संनिहित रखनेवाले ! हजारों कुबेरके सदृश धनसम्पन्न ! हजारों चरणसे युक्त हे देव ! आपको नमस्कार है। हजारों चन्द्रके समान शीतल कान्तिवाले ! हजारों सूर्यके सदृश पराक्रमशाली ! हजारों रुद्रकी भाँति तेजस्वी ! हजारों ब्रह्मासे स्तुत्य हे देव ! आपको मेरा नमन है। हजारों रुद्र देवताओंके द्वारा मन्त्ररूपमें जप करने योग्य महामहिम ! इन्द्रके हजारों नेत्रोंसे देखे जानेवाले ! हजारों जन्मके पाप-पुण्योंका मन्थन करनेवाले ! संसारके हजारों जीवोंका बन्धन काटकर उन्हें मुक्त करनेवाले ! हजारों वायुदेवोंके समान वेगवान् और हजारों मूर्ख प्राणियोंपर कृपा करनेवाले हे दयानिधान ! आपको मेरा नमस्कार है।
इस प्रकार नृसिंहरूपधारी देवदेवेश्वर भगवान् हरिकी स्तुति करके विनम्रतापूर्वक शिवने पुनः उनसे कहा—
हे देवदेवेश्वर ! अन्धकासुरका विनाश करनेके लिये जिन मातृकाओंकी सृष्टि मैंने की थी, वे तो मेरे ही वचनकी अवहेलना करके संसारकी विविध प्रजाओंका भक्षण कर रही हैं। मातृकाओंकी सृष्टि करके तो अब स्वयं मैं इनका संहार करनेमें असमर्थ हूँ। पहले इनकी सृष्टि की, अब कैसे इनका विनाश करूँ ? यह मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।
रुद्रके ऐसा कहनेपर नृसिंहरूपधारी भगवान् हरिने उसी समय अपनी जिह्वाके अग्रभागसे हजारों देवियोंको उत्पन्न करके उन्हींके द्वारा देवता, असुर और मनुष्य आदिका संहार करनेवाली क्रुद्ध मातृकाओंका विनाश कर संसारका कल्याण किया। तदनन्तर वे हरि अन्तर्धान हो गये।
जो मनुष्य नियमपूर्वक इस नारसिंहस्तोत्रका जितेन्द्रिय होकर पाठ करता है, निश्चित ही भगवान् हरि उसके समस्त मनोरथको वैसे ही पूर्ण करते हैं जैसे उन्होंने शिवके मनोरथको पूर्ण किया था।
मध्याह्नकालीन प्रचण्ड सूर्यके समान तेजस्वी नेत्रोंवाले, श्वेत वर्णके कमलमें स्थित, प्रज्वलित अग्निके सदृश भयंकर, अनादि, मध्य और अन्तसे रहित पुराणपुरुष, परात्पर, जगदाधार भगवान् नृसिंहका ध्यान करना चाहिये—
ध्यायेन्नृसिंहं तरुणार्कनेत्रं
सिताम्बुजातं ज्वलिताग्निवक्त्रम्।
अनादिमध्यान्तमजं पुराणं
परात्परेशं जगतां निधानम्॥
(२३१। २३)
जो मनुष्य इस स्तोत्रका निरन्तर जप करता है, उसके दुःखसमूहको श्रीनृसिंह उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं जिस प्रकार अंशुमाली सूर्य कुहरेकी राशिको अपने सामनेसे हटा देते हैं। जब साधक कल्याणकारी मातृवर्गसे युक्त नृसिंहदेवकी मूर्तिका निर्माण करके उनकी पूजा करता है, तब वह सदैव उन परात्परदेवके समीपमें ही रहता है। त्रिपुरारि शिवने भी तो उन्हीं देवदेवेश्वर नृसिंहमूर्ति भगवान् हरिकी पूजा की थी। उन्हीं देवको प्रसन्न करके श्रीशिवजीने वर प्राप्त किया और मातृकाओंसे संसारकी रक्षा की। (अध्याय २३१)
काण्ड ] कुलामृतस्तोत्र ४२७
कुलामृतस्तोत्र
सूतजीने कहा—हे शौनक! अब मैं उस कुलामृत नामक स्तोत्रका वर्णन करूँगा, जिसका वर्णन देवर्षि नारदके पूछनेपर शिवने किया था। उसे आप सुनें।
नारदजीने कहा—हे त्रिपुरान्तक भगवन्! जो दुर्मतिपूर्ण मनुष्य संसारमें काम-क्रोध और शुभाशुभ द्वन्द्वोंसे तथा शब्दादि विषयोंसे बँधकर सदासे पीड़ित हो रहे हैं, उनकी जन्म-मृत्युरूपी संसार-सागरसे जिस उपायद्वारा क्षणमात्रमें विमुक्ति हो जाय, उसको हम आपसे सुनना चाहते हैं।
इसपर भगवान् शंकर बोले—हे ऋषिश्रेष्ठ! भव-बन्धनको नष्ट करनेवाले और दुःखका विनाश करनेवाले परम गोपनीय रहस्यको मैं कहता हूँ, सुनो—तिनकेसे लेकर ब्रह्मातक चार प्रकारकी चराचर सृष्टि इस जगत्में जिन प्रभुकी मायासे अज्ञानके वशीभूत होकर सदैव सोती रहती है, उन विष्णुकी कृपासे यदि कोई जग जाता है तो वही संसारसे पार होता है। यह संसार देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुस्तर है। भोग और ऐश्वर्यके मदमें उन्मत्त तथा तत्त्वज्ञानसे पराङ्मुख, स्त्री, पुत्र और कुटुम्बियोंके व्यामोहमें भ्रमित होकर सभी प्राणी नाना प्रकारके दुःख झेलते हैं। इस व्यामोहमें फँसे हुए सभी जीवोंकी वैसी ही गति होती है, जैसी गति समुद्रमें स्नान करनेके लिये आये हुए वृद्ध जंगली हाथियोंकी होती है। जो मनुष्य हरिकीर्तन करनेके समय अपने मुखको बंद रखता है अर्थात् हरिकीर्तनसे पराङ्मुख रहता है, वह कोशमें स्थित कीड़ेके समान होता है। उसकी मुक्ति तो करोड़ों जन्म लेनेपर भी सम्भव नहीं है। अतः हे नारद! प्रसन्न-चित्त होकर सदैव देवदेवेश अव्यय भगवान् विष्णुकी प्रसन्नतापूर्वक सम्यक् आराधना करनी चाहिये।
जो विश्वरूप, अनादि, अनन्त, अजन्मा तथा हृदयमें स्थित, अविचल, सर्वज्ञ भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करता है, वह मुक्त हो जाता है। शरीररहित, विधाता, सर्वज्ञानसम्पन्न, मनके रमणके अनन्य आश्रय, अचल, सर्वत्र व्याप्त भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मुक्त हो जाता है। निर्विकल्प (निर्विशेष), निराभास, निष्प्रपञ्च तथा निर्दोष, वासुदेव, परम गुरु भगवान् विष्णुका ध्यान करनेसे मनुष्य मुक्तिको प्राप्त कर लेता है। सर्वात्मक एवं प्राणिमात्रके ज्ञानके एकमात्र प्रतिनिधि, शुभ, एकाक्षर (एक अक्षर 'अ' मात्रसे बोध्य) विष्णुका ध्यान करनेसे मुक्ति हो जाती है। वाक्यातीत (किसी भी वाक्यसे अवर्णनीय), तीनों कालोंको जाननेवाले, लोकसाक्षी, विश्वेश्वर तथा सभीसे श्रेष्ठ विष्णुका सदा ध्यान करनेसे मुक्ति हो जाती है। ब्रह्मा आदि देव, गन्धर्व, मुनि, सिद्ध, चारण एवं योगियोंके द्वारा सदा सेवित श्रीविष्णुका ध्यान करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है। संसार-बन्धनसे मुक्ति चाहनेवाले सभी लोगोंको वरद श्रीविष्णुकी इसी प्रकार सदा स्तुति करनी चाहिये। यदि कोई भी संसार-बन्धनसे मुक्ति चाहता है तो उसे समाहितचित्त होकर अनन्त, अव्यय, देवाधिदेव, अनन्त ब्रह्माण्डमें सर्वोच्च देवके रूपमें सुप्रतिष्ठित, समस्त जगत्के नियन्ता, अज श्रीविष्णुका सदा ध्यान करना चाहिये।*
* यस्तु विश्वमनाद्यन्तमजमात्मनि संस्थितम्। सर्वज्ञमचलं विष्णुं सदा ध्यायेत् स मुच्यते॥
देवं गर्भोचितं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते। अशरीरं विधातारं सर्वज्ञानमनोरतिम्।
अचलं सर्वगं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥
निर्विकल्पं निराभासं निष्प्रपञ्चं निरामयम्। वासुदेवं गुरुं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥
सर्वात्मकं च वै यावदात्मचैतन्यरूपकम्। शुभमेकाक्षरं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
| ४२८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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सूतजीने कहा— प्राचीन कालमें देवर्षि नारदके द्वारा पूछनेपर वृषभध्वज शिवने नारदसे श्रीविष्णुका जैसा वर्णन किया था वैसा मैंने आपसे कर दिया है। हे तात! निरन्तर उन अक्षय, निष्कल, सनातन, अव्यय, ब्रह्मस्वरूप विष्णुका ध्यान करते हुए आप निश्चित ही उनके शाश्वत पदको प्राप्त करेंगे। हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे मनुष्यको जो फल प्राप्त होता है, वह एकाग्रचित्त होकर विष्णुका क्षणमात्र ध्यान करनेसे प्राप्त होनेवाले फलके सोलहवें भागकी भी समानता करनेमें समर्थ नहीं है।
भगवान् शिवसे विष्णुके इस माहात्म्यको सुनकर सिद्ध देवर्षि नारदने उनकी सम्यक् आराधना करते हुए परम पदको प्राप्त किया। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक नित्य इस स्तुतिका पाठ करता है, उसके करोड़ों जन्ममें किये गये पाप नष्ट हो जाते हैं। महादेवके द्वारा कही गयी यह स्तुति बड़ी दिव्य है। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक इस स्तुतिका नित्य पाठ करता है, वह अमृतत्त्व अर्थात् परम वैष्णव पदको प्राप्त कर लेता है।
(अध्याय २३२)
मृत्य्राष्टकस्तोत्र*
सूतजीने कहा— हे शौनक! अब मैं मार्कण्डेयमुनिके द्वारा कहे गये स्तोत्रको बतलाता हूँ जो इस प्रकार है—
दामोदरं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
शङ्खचक्रधरं देवं व्यक्तरूपिणमव्ययम्।
अधोक्षजं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
वराहं वामनं विष्णुं नारसिंहं जनार्दनम्।
माधवं च प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
पुरुषं पुष्करक्षेत्रबीजं पुण्यं जगत्पतिम्।
लोकनाथं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
सहस्रशिरसं देवं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्।
महायोगं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
भूतात्मानं महात्मानं यज्ञयोनिमयोनिजम्।
विश्वरूपं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्युः करिष्यति॥
इत्युदीरितमाकर्ण्य स्तोत्रं तस्य महात्मनः।
अपयातस्ततो मृत्युर्विष्णुदूतैः प्रपीडितः॥
इति तेन जितो मृत्युर्मार्कण्डेयेन धीमता।
प्रसन्ने पुण्डरीकाक्षे नृसिंहे नास्ति दुर्लभम्॥
(२३३।१–८)
मैं भगवान् दामोदरकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं शंखचक्रधारी, व्यक्त, अव्यय, अधोक्षजकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं वराह, वामन, विष्णु, नृसिंह, जनार्दन, माधवके शरणागत हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं पुराणपुरुष, पुष्करक्षेत्रके (मूलतत्त्व) बीजभूत, (मूल पुरुष) महापुण्य, जगत्पति, लोकनाथकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं सहस्र सिरवाले, व्यक्त, अव्यक्त, सनातन, महायोगेश्वरकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैंने प्राणियोंमें 'आत्मा' स्वरूपसे विद्यमान रहनेवाले, महात्मा, यज्ञयोनि, अयोनिज, विश्वरूप भगवान्की शरण ग्रहण कर ली है, अब मृत्यु मेरा क्या करेगी? इस प्रकार उन महात्मा
वाक्यातीतं त्रिकालज्ञं विश्वेशं लोकसाक्षिणम्। सर्वस्मादुत्तमं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
ब्रह्मादिदेवगन्धर्वैर्मुनिभिः सिद्धचारणैः। योगिभिः सेवितं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
संसारबन्धनान्मुक्तिमिच्छँल्लोको हृाशेषतः। स्तुत्वैवं वरदं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
संसारबन्धनात् कोऽपि मुक्तिमिच्छन् समाहितः। अनन्तमव्ययं देवं विष्णुं विश्वप्रतिष्ठितम्।
विश्वेश्वरमजं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
* मृत्युका निवारक आठ श्लोकोंका स्तोत्र।
(२३२।११–१८)
२१०- आत्मज्ञाननिरूपण
| काण्ड ] | अच्युतस्तोत्र | ४२९ |
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मार्कण्डेयमुनिके द्वारा की गयी स्तुतिको सुनकर विष्णु-दूतोंसे संत्रस्त मृत्यु भाग जाती है। इस स्तोत्रका पाठकर बुद्धिमान् श्रीमार्कण्डेयने मृत्युपर विजय प्राप्त कर ली। पुण्डरीकाक्ष श्रीनृसिंह महाविष्णुके प्रसन्न होनेपर कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
यह मृत्वष्टकस्तोत्र महापुण्यशाली है, मृत्युका विनाश करनेवाला और मङ्गलदायक है। मार्कण्डेयमुनिका कल्याण करनेके लिये भगवान् विष्णुने स्वयं इस स्तोत्रको कहा था। जो मनुष्य नित्य तीनों कालोंमें पवित्रतासे भक्तिपूर्वक इस स्तुतिका नियमपूर्वक पाठ करता है, वह विष्णुभक्त अकालमृत्युसे ग्रस्त नहीं होता। जो योगी अपने हृदयकमलमें पुराणपुरुष, सनातन, अप्रमेय तथा सूर्यसे भी अत्यधिक तेजस्वी नारायणका ध्यान करता है, वह मृत्युपर विजय प्राप्त कर लेता है।
(अध्याय २३३)
अच्युतस्तोत्र
सूतजीने कहा—हे शौनक! अब मैं अच्युतस्तोत्रका वर्णन करूँगा जो प्राणियोंको सब कुछ प्रदान करनेवाला है। देवर्षि नारदके पूछनेपर ब्रह्माजीने उस सर्वश्रेष्ठ स्तोत्रका जैसा वर्णन किया था, वैसा ही आप मुझसे सुनें।
नारदजीने पूछा—हे ब्रह्मन्! प्रतिदिन पूजाके समय जिस प्रकार अक्षय, अव्यय, वर प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णुकी स्तुति मुझे करनी चाहिये, वह बतानेकी कृपा करें। वे सभी प्राणी धन्य हैं, उन सबका जन्म लेना सफल है, वे ही सब प्रकारका सुख प्राप्त करनेवाले हैं, उन्हीं सज्जनोंका जीवन सार्थक है, जो भगवान् अच्युत विष्णुकी सदैव स्तुति करते हैं।
ब्रह्माजीने कहा—हे मुने! मैं भगवान् वासुदेवका वह स्तोत्र जो प्राणियोंको मोक्ष देनेवाला है और जिस स्तोत्रके द्वारा पूजाकालमें सम्यक् स्तुति किये जानेपर भगवान् नारायण प्रसन्न होते हैं, उसे आपको सुनाता हूँ, सुनें। वह स्तोत्र इस प्रकार है—
ॐ नमो [ भगवते ] वासुदेवाय नमः सर्वाघहारिणे।
नमो विशुद्धदेहाय नमो ज्ञानस्वरूपिणे॥
नमः सर्वसुरेशाय नमः श्रीवत्सधारिणे।
नमश्चर्मासिहस्ताय नमः पङ्कजमालिने॥
नमो विश्वप्रतिष्ठाय नमः पीताम्बराय च।
नमो नृसिंहरूपाय वैकुण्ठाय नमो नमः॥
नमः पङ्कजनाभाय नमः क्षीरोदशायिने।
नमः सहस्रशीर्षाय नमो नागाङ्गशायिने॥
नमः परशुहस्ताय नमः क्षत्रान्तकारिणे।
नमः सत्यप्रतिज्ञाय ह्यजिताय नमो नमः॥
नमस्त्रैलोक्यनाथाय नमश्चक्रधराय च।
नमः शिवाय सूक्ष्माय पुराणाय नमो नमः॥
नमो वामनरूपाय बलिराज्यापहारिणे।
नमो यज्ञवराहाय गोविन्दाय नमो नमः॥
नमस्ते परमानन्द नमस्ते परमाक्षर।
नमस्ते ज्ञानसद्भाव नमस्ते ज्ञानदायक॥
नमस्ते परमाद्वैत नमस्ते पुरुषोत्तम।
नमस्ते विश्वकृद्देव नमस्ते विश्वभावन॥
नमस्ते स्ताद् विश्वनाथ नमस्ते विश्वकारण।
नमस्ते मधुदैत्यघ्न नमस्ते रावणान्तक॥
नमस्ते कंसकेशिघ्न नमस्ते कैटभार्दन।
नमस्ते शतपत्राक्ष नमस्ते गरुडध्वज॥
नमस्ते कालनेमिघ्न नमस्ते गरुडासन।
नमस्ते देवकीपुत्र नमस्ते वृष्णिनन्दन॥
नमस्ते रुक्मिणीकान्त नमस्तेऽदितिनन्दन।
नमस्ते गोकुलावास नमस्ते गोकुलप्रिय॥
जय गोपवपुः कृष्ण जय गोपीजनप्रिय।
जय गोवर्धनाधार जय गोकुलवर्धन॥
जय रावणवीरघ्न जय चाणूरनाशन।
जय वृष्णिकुलोद्योत जय कालीयमर्दन॥
४३० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
जय सत्य जगत्साक्षिन् जय सर्वार्थसाधक।
जय वेदान्तविद्वेद्य जय सर्वद माधव॥
जय सर्वाश्रयाव्यक्त जय सर्वग माधव।
जय सूक्ष्म चिदानन्द जय चित्तनिरञ्जन॥
जयस्तेऽस्तु निरालम्ब जय शान्त सनातन।
जय नाथ जगत्पुष्ट( पूज्य ) जय विष्णो नमोऽस्तु ते॥
त्वं गुरुस्त्वं हरे शिष्यस्त्वं दीक्षामन्त्रमण्डलम्।
त्वं न्यासमुद्रासमयास्त्वं च पुष्पादिसाधनम्॥
त्वमाधारस्त्वं ह्यनन्तस्त्वं कूर्मस्त्वं धराम्बुजम्।
धर्मज्ञानादयस्त्वं हि वेदिमण्डलशक्तयः॥
त्वं प्रभो छलभृद्रामस्त्वं पुनः स खरान्तकः।
त्वं ब्रह्मर्षिश्च देवस्त्वं विष्णुः सत्यपराक्रमः॥
त्वं नृसिंहः परानन्दो वराहस्त्वं धराधरः।
त्वं सुपर्णस्तथा चक्रं त्वं गदा शङ्ख एव च॥
त्वं श्रीः प्रभो त्वं पुष्टित्वं त्वं माला देव शाश्वती।
श्रीवत्सः कौस्तुभस्त्वं हि शार्ङ्गं त्वं च तथेषुधिः॥
त्वं खड्गचर्मणा सार्धं त्वं दिक्पालास्तथा प्रभो।
त्वं वेदास्त्वं विधाता च त्वं यमस्त्वं हुताशनः॥
त्वं धनेशस्त्वमीशानस्त्वमिन्द्रस्त्वमपाम्पतिः।
त्वं रक्षोऽधिपतिः साध्यस्त्वं वायुस्त्वं निशाकरः॥
आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ त्वं मरुद्गणाः।
त्वं दैत्या दानवा नागास्त्वं यक्षा राक्षसाः खगाः॥
गन्धर्वाप्सरसः सिद्धाः पितरस्त्वं महामराः।
भूतानि विषयस्त्वं हि त्वमव्यक्तेन्द्रियाणि च॥
मनोबुद्धिरहङ्कारः क्षेत्रज्ञस्त्वं हृदीश्वरः।
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारः समित्कुशाः॥
त्वं वेदी त्वं हरे दीक्षा त्वं यूपस्त्वं हुताशनः।
त्वं पत्नी त्वं पुरोडाशस्त्वं शाला स्रुक् च त्वं स्रुवः॥
ग्रावाणः सकलं त्वं हि सदस्यस्त्वं सदक्षिणः।
त्वं शूर्पादिस्त्वं च ब्रह्मा मुसलोलूखले ध्रुवम्॥
त्वं होता यजमानस्त्वं त्वं धान्यं पशुयाजकः।
त्वमध्वर्युस्त्वमुद्गाता त्वं यज्ञः पुरुषोत्तमः॥
दिक्पातालमहि व्योम द्यौस्त्वं नक्षत्रकारकः।
देवतियर्ङ्मनुष्येषु जगदेतच्चराचरम्॥
यत्किंचिद् दृश्यते देव ब्रह्माण्डमखिलं जगत्।
तव रूपमिदं सर्वं सृष्ट्यर्थं सम्प्रकाशितम्॥
नाथयन्ते परं ब्रह्म देवैरपि दुरासदम्।
कस्त्वां जानाति विमलं योगगम्यमतीन्द्रियम्॥
अक्षयं पुरुषं नित्यमव्यक्तमजमव्ययम्।
प्रलयोत्पत्तिरहितं सर्वव्यापिनमीश्वरम्॥
सर्वज्ञं निर्गुणं शुद्धमानन्दमजरं परम्।
बोधरूपं ध्रुवं शान्तं पूर्णमद्वैतमक्षरम्॥
अवतारेषु या मूर्तिर्विदूरे देव दृश्यते।
परं भावमजानन्तस्त्वां भजन्ति दिवौकसः॥
कथं त्वामीदृशं सूक्ष्मं शक्नोमि पुरुषोत्तम।
आराधयितुमीशान मनोऽगम्यमगोचरम्॥
इह यन्मण्डले नाथ पूज्यते विधिवत् क्रमैः।
पुष्पधूपादिभिर्यन्त्र तत्र सर्वा विभूतयः॥
सङ्कर्षणादिभेदेन तव यत्पूजितं मया।
क्षन्तुमर्हसि तत्सर्वं यत्कृतं न कृतं मया॥
न शक्नोमि विभो सम्यक् कर्तुं पूजां यथोदिताम्।
यत्कृतं जपहोमादि असाध्यं पुरुषोत्तम॥
विनिष्पादयितुं भक्त्या अतस्त्वां क्षमयाम्यहम्।
दिवा रात्रौ च सन्ध्यायां सर्वावस्थासु चेष्टतः॥
अचला तु हरे भक्तिस्त्वदङ्घ्रियुगले मम।
शरीरे न ( ण ) तथा प्रीतिर्न च धर्मादिकेषु च॥
यथा त्वयि जगन्नाथ प्रीतिरात्यन्तिकी मम।
किं तेन न कृतं कर्म स्वर्गमोक्षादिसाधनम्॥
यस्य विष्णौ दृढा भक्तिः सर्वकामफलप्रदे।
पूजां कर्तुं तथा स्तोत्रं कः शक्नोति तवाच्युत॥
स्तुतं च पूजितं मेऽद्य तत् क्षमस्व नमोऽस्तु ते।
(२३४।५-४९१/२)
मैं उन भगवान् वासुदेवको नमस्कार करता हूँ, जो सभी पापोंको हरण करनेवाले हैं। मैं विशुद्ध देहवाले, ज्ञानस्वरूप, सभी देवताओंके स्वामी, श्रीवत्सधारी*, ढाल और तलवार धारण करनेवाले,
* भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलपर विद्यमान चिह्नविशेष।
२११- गीतासार
काण्ड ] अच्युतस्तोत्र [ ४३१
कमलकी माला धारण करनेवाले, जगत्में प्रतिष्ठित, पीताम्बरसे अलंकृत, नृसिंहस्वरूप और वैकुण्ठमूर्ति श्रीविष्णुको बारम्बार नमन करता हूँ।
मेरा उन देवको प्रणाम है, जिनकी नाभिमें कमल है, जो क्षीरसागरमें शयन करनेवाले हैं, जिनके हजारों सिर हैं, जो शेषशय्यापर शयन कर रहे हैं, जिनके हाथमें परशु है, जो क्षत्रियोंके गर्वका अन्त करनेवाले हैं, जो सत्यप्रतिज्ञ हैं, जो अजित हैं, जो त्रिभुवनके एकमात्र स्वामी और चक्रधारी हैं, उन कल्याणमूर्ति, सूक्ष्मस्वरूप और पुराणपुरुषको मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ। दैत्यराज बलिके राज्यको दानमें ग्रहण करनेके लिये भगवान् वामन तथा पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये यज्ञवराहका अवतार ग्रहण करनेवाले गोविन्द श्रीहरिको मेरा बार-बार प्रणाम है।
हे परमानन्दस्वरूप! हे ज्ञान देनेवाले परम अक्षर ज्ञानस्वरूप! देव! परमाद्वैत! पुरुषोत्तम! विश्वकर्ता! विश्वभावन! विश्वनाथ! विश्वके कारणभूत! मधुदैत्यविनाशक! रावणहन्ता! कंस तथा केशीको मारनेवाले! कैटभ दैत्यको मारनेवाले! आपको नमस्कार है। हे पद्मलोचन! हे गरुडध्वज! कालनेमिके हन्ता! गरुडासन! देवकीपुत्र! वृष्णिनन्दन! रुक्मिणीकान्त! अदितिनन्दन! गोकुलवासी! हे गुरुकुलप्रिय आपको मेरा बारम्बार नमस्कार है।
हे गोपवपु श्रीकृष्ण, गोपीजनप्रिय, गोवर्धनधारी! हे गोकुलवर्धन! आपकी जय हो। हे दैत्यराज रावणके संहारक! चाणूरदैत्य-विनाशक, वृष्णिवंशके प्रकाशक! कालीयमर्दन! सत्यस्वरूप! संसारके साक्षी! सर्वार्थसाधक! हे वेदान्तविदोंके वेद्य! सब कुछ देनेवाले! माधव! सबके आश्रय! अव्यक्त, सर्वत्र व्याप्त! लक्ष्मीकान्त (माधव), सूक्ष्म, चिदानन्द! चित्त निरञ्जन, निरालम्ब! हे शान्त! हे सनातन! हे नाथ! हे जगत्पूज्य भगवान् विष्णु! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आपको मेरा नमस्कार है।
हे हरे! आप ही गुरु हैं, आप ही शिष्य हैं। आप ही दीक्षामें प्रयुक्त होनेवाले मन्त्र तथा मण्डल हैं। आप ही न्यास, मुद्रा और दीक्षा हैं। आप ही पूजामें प्रयुक्त होनेवाले पुष्पादिक साधन हैं। आप ही आधारशक्ति, अनन्त, कूर्म, पृथिवी, पद्म, धर्म, ज्ञान, वेदी और पूजामण्डलकी शक्तियोंके स्वरूप हैं।
हे प्रभो! आप ही छलका भेदन करनेवाले हैं। आप ही खर-दूषणका संहार करनेवाले राम हैं। आप ही ब्रह्मर्षि, देव, विष्णु, सत्यपराक्रम, नृसिंह, परानन्द, धराको धारण करनेवाले महावराह हैं।
हे प्रभो! आप ही सुपर्ण, शंख, चक्र, गदा हैं। हे देव! आप ही लक्ष्मी, पुष्टि, शाश्वती माला, श्रीवत्स, कौस्तुभ, शार्ङ्गी* तथा तूणीर (तरकस)-रूप हैं।
हे प्रभो! ढाल और खड्गसे युक्त आप इन्द्रादिक दिक्पाल देवता हैं। आप ही विधाता और आप ही ब्रह्मा हैं। आप ही यम, अग्नि, कुबेर, ईशान, इन्द्र, वरुण, राक्षसोंके स्वामी, साध्य, वायु, चन्द्र, सूर्य, वसु, रुद्रगण, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण हैं। आप ही दैत्य, दानव, नाग, यक्ष, राक्षस, पक्षी, गन्धर्व, अप्सरा, सिद्ध, पितृजन तथा देवगण हैं। आप ही पृथ्वी आदि पञ्चमहाभूत, शब्दादि विषयस्वरूप और अव्यक्त इन्द्रिय हैं। आप ही मन, बुद्धि एवं अहंकारतत्त्व हैं। आप ही क्षेत्रज्ञ तथा हृदयेश्वर हैं। आपकी जय हो, आपको मैं प्रणाम करता हूँ।
हे हरे! आप ही यज्ञ, वषट्कार, ॐकार (प्रणव), समिधा और कुश हैं। आप ही यज्ञवेदी,
* 'शार्ङ्ग' नामका धनुष धारण करनेवाले।
२१२- गीतासार
४३२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-
यज्ञीय दीक्षा, यज्ञयूप, अग्नि, यजमानपत्नी, पुरोडाश, यज्ञशाला, स्रुक्, स्रुव तथा सोमरस निकालनेके लिये प्रयुक्त पाषाणविशेष हैं। आप सब कुछ हैं। आप ही यज्ञकी सम्पन्नताके लिये दक्षिणायुक्त सदस्य और आप ही यज्ञके सम्पादनके लिये उपयोगी शूर्पादिक उपकरण, ब्रह्मा (विशेष ऋत्विक्), मूसल तथा ओखली हैं। आप ही निश्चितरूपमें होता, यजमान, धान्य, पशु, याजक, अध्वर्यु, उद्गाता, यज्ञ और आप ही पुरुषोत्तम यज्ञभगवान् हैं। आपको मेरा नमस्कार है।
हे देव! आप ही दिशा, पाताल, पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग एवं नक्षत्रोंके जन्मदाता हैं। आप ही देव, तिर्यक् तथा मनुष्य आदि हैं। यह चराचर जगत् भी आप ही हैं। यह अखिल ब्रह्माण्ड और जगत् आपका ही स्वरूप है। इन सबको सृष्टिके लिये आपने स्वतः प्रकट किया है। हे परब्रह्म! यह आपका स्वरूप उन देवताओंके भी ज्ञानसे परे है। इस संसारमें कौन ऐसा प्राणी है, जो निष्कलुष, योगगम्य, इन्द्रियातीत, अक्षय, पुराणपुरुष, नित्य, अव्यक्त, अजन्मा, अव्यय, प्रलय और उत्पत्तिसे रहित, सर्वव्यापक, ईश्वर, सर्वज्ञ, निर्गुण, शुद्ध, परमानन्द, अजर, बोधरूप, अटल, शान्त, पूर्ण, अद्वैत तथा अक्षर ब्रह्म आपको जान सकता है। हे देव! अवतारोंमें आपके जिस स्वरूपका दर्शन होता है, उसके परम भावको बिना जाने हुए ही देवता लोग आपका भजन करते हैं। वे भी आपके मूलस्वरूपके दर्शनसे वञ्चित रह जाते हैं। हे पुरुषोत्तम! इस प्रकार आपका मनसे भी अगम्य जो अगोचर सूक्ष्मस्वरूप है, उसकी आराधना करनेमें क्या मैं समर्थ हो सकता हूँ?
हे नाथ! यहाँपर इस पूजामण्डलमें यथाविधि पुष्प-धूप आदिके द्वारा संकर्षण आदि नामभेदोंसे आपकी ही मैंने पूजा की है, ये सभी विभूतियाँ आपकी ही हैं। मैंने आपकी इस पूजामें जो कुछ किया है और जो कुछ नहीं किया है, वह सब आप क्षमा करें। हे विभो! यथोक्त रूपसे मैं आपकी सम्यक् पूजा नहीं कर सकता। जो मैंने जप-होमादि किया है, भक्तिपूर्वक उस कार्यका निष्पादन करना मेरे लिये असाध्य है। इसलिये मैं आपसे क्षमा-प्रार्थना करता हूँ। हे प्रभो! दिन, रात और संध्यामें तथा सभी अवस्थाओंमें मेरी चेष्टा-निष्ठा आपकी सेवाके अनुरूप रहे। हे हरे! आपके चरणयुगलमें मेरी एकनिष्ठ अचल भक्ति हो। हे नाथ! मेरी जैसी प्रीति अपने शरीरसे है, वैसी धर्मादि कार्योंमें नहीं। इसलिये हे जगन्नाथ! आप ऐसी कृपा करें कि आपमें मेरी आत्यन्तिकी प्रीति हो जाय। सभी फल देनेवाले भगवान् विष्णुकी जिसने दृढ़ भक्ति कर ली, उसने स्वर्ग और मोक्ष आदिके साधन किन कर्मोंको नहीं किया है? हे अच्युत! आपके पूजन और स्तुति करनेमें कौन समर्थ है? आज मैंने यथासामर्थ्य आपकी जो पूजा और स्तुति की है, उसकी अपूर्णताके लिये मुझे क्षमा प्रदान करें। मेरा आपको प्रणाम है।
हे मुने! मैंने भली प्रकारसे आपको यह चक्रधर (अच्युत)-स्तोत्र सुना दिया है। यदि आप परम वैष्णव पदकी इच्छा करते हैं तो परात्पर विष्णुकी भक्तिपूर्वक यह स्तुति करें।
पूजाके समय जो मनुष्य इस स्तोत्रके द्वारा जगद्गुरु भगवान् विष्णुकी स्तुति करता है, वह शीघ्र ही संसारके बन्धनको काटकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। हे मुने! अन्य जो कोई भी पवित्र होकर भक्तिपूर्वक प्रतिदिन तीनों संध्याओंमें श्रीविष्णुदेवका इस स्तोत्रके अनुसार भजन करता है, वह अपने समस्त अभीष्टोंकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है। इस स्तोत्रका पाठ करनेसे पुत्र चाहनेवाला व्यक्ति पुत्र प्राप्त करता है, सांसारिक बन्धनसे मुक्त होनेकी
२१३- ब्रह्मगीतासार
काण्ड ] अच्युतस्तोत्र ४३३
इच्छा रखनेवाला उससे मुक्त हो जाता है। इस स्तोत्रके पाठसे रोगी रोगसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है, निर्धन व्यक्ति धनवान् बन जाता है और विद्यार्थी विद्या, भाग्य तथा कीर्ति प्राप्त करता है। जातिस्मरत्व (पूर्वजन्मके वृत्तान्तकी स्मृति) तथा और जो कुछ चित्तमें इच्छा रखता है, भक्त उसे प्राप्त कर लेता है।
वह प्राणी धन्य है, सब कुछ जाननेवाला है, बुद्धिमान् है, साधु है, सभी सत्कर्मोंका कर्ता है, सत्यवादी है, पवित्र है और दाता है, जो भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति करता है। इस संसारमें वे प्राणी सम्भाषण करने योग्य नहीं हैं और समस्त धर्मोंसे बहिष्कृत हैं, जिनका कोई भी सत्कार्य भगवान् हरिके उद्देश्यसे सम्पन्न नहीं होता। वह व्यक्ति दुरात्मा है, उसका मन और वचन शुद्ध नहीं है, जिसकी सब कुछ प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णुमें अचल भक्ति नहीं है।
मनुष्य सब सुख प्रदान करनेवाले भगवान् हरिकी विधिवत् पूजा कर जो कुछ भी कामना करता है उसे प्राप्त कर लेता है। श्रद्धापूर्वक आराधना करनेपर पुरुषोत्तमभगवान् सब कुछ प्रदान करते हैं। समस्त मुनि जिन देवका चिन्तन करते हैं, वे ही शुद्ध ब्रह्म परब्रह्म हैं। जो सभीके हृदयमें विराजमान रहते हैं, जो सब कुछ जानते हैं और जो सभी कृत्योंके साक्षी हैं, जो भय-मरण-विहीन हैं, नित्य-आनन्दस्वरूप हैं, ऐसे अज, अमृत, ईश वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। मैं समस्त संसारके स्वामी, सुप्रसन्न, शाश्वत, अति विमल, विशुद्ध, निर्गुण, आत्मस्वरूप और समस्त सुखोंके मूल भगवान् नारायणकी भावपुष्पसे पूजा करता हूँ। मेरे हृदयकमलमें सर्वसाक्षी सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् विष्णु सदा विराजमान रहें—
सकलमुनिभिराद्यश्चिन्त्यते यो हि शुद्धो
निखिलहृदि निविष्टो वेत्ति यः सर्वसाक्षी।
तमजममृतमीशं वासुदेवं नतोऽस्मि
भयमरणविहीनं नित्यमानन्दरूपम्॥
निखिलभुवननाथं शाश्वतं सुप्रसन्नं
त्वतिविमलविशुद्धं निर्गुणं भावपुष्पैः।
सुखमुदितसमस्तं पूजयाम्यात्मभावं
विशतु हृदयपद्मे सर्वसाक्षी चिदात्मा॥
(२३४।६०-६१)
इस प्रकार मैंने आदि-अन्तसे रहित, परात्पर ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुके महा प्रभावका वर्णन किया। इसलिये मोक्ष प्राप्त करनेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह भलीभाँति परमेश्वरका चिन्तन करे। इस संसारमें कौन ऐसा योगी है जो उन बोधगम्य पुराणपुरुष, सूर्यके समान तेजस्वी, विमल, विशुद्धात्मा, श्रेष्ठ, अद्वितीय विष्णुका चिन्तन करके उनमें तदाकार नहीं हो जाता ? जो मनुष्य इस स्तुतिका सदैव पाठ करता है, वह श्रीविष्णुके समान ही प्रशान्तचित्त तथा पापसे रहित हो जाता है। जो व्यक्ति अर्थ, धर्म, काम और मोक्षरूप पुरुषार्थकी कामना करता है अथवा सम्पूर्ण सौख्य चाहता है, वह सब कुछ छोड़कर सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुष, वरण करने योग्य विष्णुकी शरणमें जाता है, इसीलिये उसका प्रभाव सर्वत्र फैल जाता है और वह विष्णुलोकको चला जाता है।
जो प्राणी विभु, सबके स्वामी, विश्वको धारण करनेवाले, विशुद्धात्मा, समस्त संसारके विनाशके हेतु, विमल, भगवान् वासुदेवकी शरणमें अनासक्त-भावसे जाता है, वह मोक्षपदको प्राप्त करता है—
विभुं प्रभुं विश्वधरं विशुद्ध-
मशेषसंसारविनाशहेतुम् ।
यो वासुदेवं विमलं प्रपन्नः
स मोक्षमाप्नोति विमुक्तसङ्गः॥
(२३४।६६)
(अध्याय २३४)
४३४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
ब्रह्मज्ञाननिरूपण तथा षडङ्गयोग
सूतजीने कहा— [हे शौनक!] अब मैं वेदान्त और सांख्यसिद्धान्तके अनुसार ब्रह्मज्ञानका वर्णन करता हूँ।
'मैं ही ज्योतिर्मय परब्रह्मस्वरूप विष्णु हूँ'—ऐसा चिन्तन करते हुए 'सूर्य, हृदयाकाश और वह्निमें एक ही ज्योति तीन रूपमें स्थित है', ऐसा निश्चय करना चाहिये। जैसे गायोंके शरीरमें घृत रहनेपर भी घृत गायको बल प्रदान नहीं करता, परंतु उसी घृतको निकालकर विधिके अनुसार गायोंके निमित्त प्रयोग करनेपर वह घृत महाबलप्रद हो जाता है, वैसे ही विष्णु सभी जीवोंके शरीरमें विद्यमान रहनेपर भी बिना आराधनाके कल्याणकारी नहीं हो सकते। जो योगरूप वृक्षपर चढ़नेके इच्छुक हैं, उनके लिये कर्मज्ञान आवश्यक है, किंतु जो योगरूपी वृक्षपर आरूढ़ हो चुके हैं, उनके लिये त्याग (वैराग्य) एवं ज्ञान ही महत्त्वपूर्ण हो जाता है। जो शब्दादि विषयोंको जाननेकी इच्छा करता है, उसमें राग-द्वेषादि प्रादुर्भूत हो जाते हैं, इसी कारण मनुष्य लोभ-मोह तथा क्रोधके वशीभूत होकर पापाचार करता है।
जिसके हाथ, उपस्थ<sup>१</sup>, उदर और वाक्य—ये चार सुसंयत रहते हैं, वही बुद्धिमानोंके द्वारा विप्र कहा जाता है। जो दूसरेके द्रव्यको ग्रहण नहीं करते, हिंसा नहीं करते, जुएमें अनुरक्त नहीं रहते, वास्तवमें उन्हींके दोनों हाथ सुसंयत रहते हैं। जो दूसरेकी स्त्रीके प्रति कामका भाव नहीं रखता, उसीकी उपस्थेन्द्रिय सुसंयत है। जो लोभरहित होकर परिमित भोजन करते हैं, उन्हींके उदरको संयत कहा जाता है। जो हित-परिमित और सत्य वाक्य बोलता है, उसीकी वाणी संयत कही जाती है। जिसके हाथ आदि संयत रहते हैं, उसके लिये तपस्या या यज्ञादिका कोई प्रयोजन नहीं है अर्थात् तपस्या, यज्ञ आदि तभी सफल होते हैं, जब हाथ, उपस्थ, उदर एवं वाक्य संयत हों।
मन, बुद्धि और इन्द्रियोंका आत्यन्तिक ऐक्य अर्थात् सदा ध्येयतत्त्वमें लगा रहना ध्यान कहलाता है। वह ध्यान दो प्रकारका होता है—सबीज<sup>२</sup> तथा निर्बीज<sup>३</sup>।
चिन्तनकी मूल आधार-शक्ति 'बुद्धि' भौंहोंके मध्यमें रहती है। इसे यदि जीव विषयोंमें लगाये रहता है तो यही जाग्रत्-अवस्था होती है। जब जीवकी इन्द्रियाँ शान्त हों, केवल मन चञ्चल हो और इसी कारण बाहरी एवं भीतरी विषयोंको केवल स्वप्नमें जीव देखता रहे तो यही स्वप्नावस्था है। जब मन हृदयमें स्थित हो तथा तमोगुणसे मोहित होनेके कारण कुछ भी स्मरण न कर सके, तब सुषुप्ति-अवस्था समझनी चाहिये।
जो जितेन्द्रिय होता है उसको जाग्रत्-अवस्था में तन्द्रा, मोह और भ्रम नहीं उत्पन्न होते। वह शब्दादि विषयोंमें आसक्त नहीं होता।
ज्ञानी इन्द्रियों और मनको विषयोंसे खींचकर बुद्धिके द्वारा अहंकारको एवं प्रकृतिके द्वारा बुद्धिको संयत कर और चित्-शक्तिके द्वारा प्रकृतिको भी संयत कर केवल आत्मरूपमें अवस्थित रहता है। इस स्थितिमें ज्ञानी मनसे स्वप्रकाश आत्मा (परमात्मा)-को देख सकता है। आत्मा स्वप्रकाश है, ज्ञेय है, ज्ञाता है और ज्ञानाधिकरण है। चिद्रूप अमृत शुद्ध निष्क्रिय सर्वव्यापी शिवप्रद आत्माको जानकर मनुष्य तुरीय<sup>४</sup>-अवस्था में आ जाता है, इसमें संशय नहीं है।
<sup>१</sup> मूत्रेन्द्रिय।
<sup>२</sup> अविद्या आदि क्लेश ही बीज हैं। इनका अनुभव होते रहनेपर सबीज ध्यान कहा जाता है।
<sup>३</sup> क्लेशरूप बीजका अनुभव न हो तो निर्बीज ध्यान कहा जाता है।
<sup>४</sup> परम शान्त, शिवस्वरूप अद्वैतावस्था।
२१५- गरुडपुराणका माहात्म्य
काण्ड ] ब्रह्मज्ञाननिरूपण तथा षडङ्गयोग ४३५
जीवका अन्तिम लक्ष्य मुक्ति है। यह मुक्ति जीवको तभी प्राप्त होती है, जब वह पुर्यष्टक एवं त्रिगुणात्मिका प्रकृतिका परित्याग कर देता है। यह पुर्यष्टक एक 'कमल' के रूपमें माना गया है। संसारावस्थामें जीव इसी कमलरूपी पुर्यष्टक की कर्णिकामें स्थित रहता है। तीनों गुणों (सत्त्व, रज एवं तम)-की साम्यावस्थारूप प्रकृति ही पुर्यष्टकरूपी कमलकी कर्णिका है। इस पुर्यष्टकरूप कमलके आठ पत्र (दल) हैं। ये हैं—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, सत्व, रज तथा तम। इस प्रतीकात्मक वर्णनका निष्कर्ष यह है कि जीवको मुक्ति प्राप्त करनेके लिये प्रकृतिसे स्वयंको अलग करना अनिवार्य है इस हेतु शब्द आदि विषयोंके प्रति अनासक्त होना होगा।
प्राणायाम, जप, प्रत्याहार, धारणा, समाधि और ध्यान—ये छः योगके साधन हैं।
इन्द्रियसंयमसे पापक्षय और पापक्षयसे देवप्रीति सुलभ होती है। देवप्रीति मुक्ति एवं मुक्तिसाधनकी ओर उन्मुख होनेके लिये भी प्रथम एवं अनिवार्य साधन है। योगका मुख्यतम साधन है प्राणायाम। यह दो प्रकारका है—गर्भ और अगर्भ। जप एवं ध्यानयुक्त जो प्राणायाम है, वही गर्भ प्राणायाम है और इससे अतिरिक्त होनेपर अगर्भ प्राणायाम कहा जाता है। जो प्राणायाम छत्तीस मात्रासे युक्त रहता है वही श्रेष्ठ है, जो चौबीस मात्रासे युक्त रहता है वह मध्यम है और जो प्राणायाम बारह* मात्रासे युक्त रहता है वह निम्न है। सदा ॐकारका जप कर प्राणायाम करे। ॐकार परब्रह्मका वाचक है। इस ब्रह्मवाचक ॐकारका परिज्ञान होनेपर वाच्य ब्रह्म प्रसन्न हो जाता है।
'ॐ नमो विष्णवे'—इस षडक्षर और द्वादशाक्षर गायत्रीका जप करना चाहिये। सभी इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति सांसारिक विषयोंकी ओर रहती है। मनके द्वारा इन प्रवृत्तियोंकी निवृत्तिको ही प्रत्याहार कहा गया है। इन्द्रियोंको अपने विषयोंसे समाहरण कर मनको बुद्धिके साथ प्रत्याहारमें स्थित रखते हुए बारह बार प्राणायाम करनेमें जितना समय लगता है, उतने समयतक ब्रह्ममें मनको निविष्ट करना ही द्वादशधारणात्मक ध्यान है—ऐसा ब्रह्माने कहा है। नियतरूपसे ब्रह्माकारवृत्तिमें जो संतुष्टिका अनुभव होता है, उसीको समाधि कहा जाता है। ध्यान करते-करते यदि मन चञ्चल नहीं होता है, सदा ध्यानमें ही प्रवृत्ति रहती है अर्थात् अभीष्ट प्राप्तितक ध्यानसे निवृत्ति नहीं होती तो इसीका नाम धारणा है। मन यदि ध्येयतत्त्वमें ही आसक्त रहता है अर्थात् ध्येयतत्त्वका ही चिन्तन सदा होता रहता है, अन्य किसी भी पदार्थका भान नहीं होता तो इसीको ध्यान कहा जाता है।
ध्यानपरायण मुनिगण, ध्येय पदार्थका चिन्तन करते-करते जब मन उसी ध्येयमें निश्चल हो जाता है तो इसे ही परम ध्यान कहते हैं। ध्यान करते-करते जब सर्वत्र ध्येयपदार्थ ही दिखायी देने लगे, ध्याता भी ध्येयमय प्रतीत हो और किसी प्रकारका द्वैतज्ञान नहीं रहे तो इस अवस्थाको समाधि कहा जाता है। जिसका मन संकल्परहित होकर इन्द्रियोंके विषयचिन्तनसे विरत हो जाता है तथा ब्रह्ममें लीन हो जाता है, वही समाधिमें स्थित कहा जाता है। जिस योगीका मन आत्मामें अवस्थित परमात्माका ध्यान करते-करते तन्मय हो जाता है, वह योगी समाधिस्थ कहा जाता है। चित्तकी अस्थिरता, भ्रान्ति, दौर्मनस्य और प्रमाद—ये सभी योगियोंके दोष कहे गये हैं, ये योगमें विघ्नकारक हैं।
मनके स्थिर होनेके लिये प्रथम ध्येयके स्थूलस्वरूपका चिन्तन करे, इसके बाद मनके
* मात्राका विवेक योगसूत्रसे प्राणायामकी प्रक्रिया समझनेमें स्पष्ट होगा।
| ४३६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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निश्चल होनेपर तेजःस्वरूप परमात्माके अनुरक्त होकर स्थिर हो जाना चाहिये। जगत्में परमात्माके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, वह परमात्मा ही विश्वरूप है—इस प्रकारका निश्चय कर परमात्मासे अतिरिक्त सभी पदार्थोंको असत् मानकर उनका परित्याग कर देना चाहिये। हृदय-पद्ममें स्थित ॐकाररूपी व्यापक परमब्रह्मका ध्यान करना चाहिये। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञसे रहित तीन मात्रासे युक्त ॐकारका जप करना चाहिये। प्रथम अपने हृदयमें ॐकारस्वरूप प्रधान पुरुषका ध्यान करे। इसके बाद उसके ऊपर कृष्णवर्ण, रक्तवर्ण तथा श्वेतवर्णवाले तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुणके तीन मण्डलोंका ध्यान कर उनमें जीवात्मा पुरुषका ध्यान करे। मण्डलके ऊपर ऐश्वर्य आदि आठ गुणोंसे युक्त अष्टदल कमलकी भावना की जाती है।
इस कमलकी कर्णिका ज्ञान है, केसर विज्ञान है, नाल वैराग्य है एवं इसका कन्द वैष्णव धर्म है। मुक्तिसाधक व्यक्ति इस हृत्पद्मकी कर्णिकामें स्थित प्रणवरूप ब्रह्मका ध्यान, चेतन निश्चल तथा व्यापक रूपमें करे। इस ॐकारस्वरूप ब्रह्मका ध्यान करते-करते यदि कोई प्राणोंका परित्याग कर देता है तो वह ब्रह्मसायुज्य प्राप्त करता है। योगी देहगत पद्मके मध्यमें हरिको बैठाकर भक्तिभावसे उनका ध्यान करे। कुछ लोग ध्यान-रूपी चक्षुसे—आत्मासे आत्मा (परमात्मा)-को देखते हैं। सांख्यदर्शन-वेत्तालोग प्रकृति-पुरुषके विवेकसे तथा योगवेत्ता योगके प्रभावसे आत्मदर्शन करते हैं। आत्मा ज्ञानरूप है। वास्तवमें ज्ञानका ही माहात्म्य है। ज्ञान ही ब्रह्मका प्रकाशक है और ज्ञान ही भवबन्धनको काटनेवाला है। इसीलिये ध्यान-साधनमें एकचित्तता ही प्रधान योग है। यही योग योगियोंको मुक्ति प्रदान करता है, इसमें संशय नहीं है। यह एकचित्तताका योग आत्मदर्शनमें ही पर्यवसित है।
जो इन्द्रियादिको जीत कर ज्ञानसे प्रदीप्त हो जाता है, परमात्मामें अवस्थित इसी योगीको मुक्त कहा जाता है। आसन, स्थान आदिकी विधियाँ योगकी साधक नहीं होतीं, प्रत्युत ये तो योगसिद्धिमें विलम्ब करनेवाली हैं। ये सब विधियाँ साधनके विस्तार मात्र हैं। शिशुपालने स्मरणाभ्यासके प्रभावसे सिद्धि-लाभ किया था। योगाभ्यास करनेवाले योगीजन आत्मासे आत्माको देखते हैं। योगीजन सभी प्राणियोंमें करुणाभाव, विषयोंके प्रति विद्वेष एवं शिश्न और उदरकी परायणताका परित्याग करते हुए मुक्ति प्राप्त करते हैं। जब योगी मनुष्य इन्द्रियोंसे इन्द्रियोंके विषयका अनुभव नहीं करता, तब काष्ठकी भाँति सुख, दुःखके अनुभवसे अतीत होकर ब्रह्ममें लीन हो जाता है अर्थात् मुक्त हो जाता है।
मेधावी साधक सभी प्रकारके वर्णभेद, सभी प्रकारके ऐश्वर्यभेद एवं सभी अशुभ तथा पापोंको ध्यानाग्निके द्वारा भस्मसात् कर परमगतिको प्राप्त करता है। जैसे काष्ठसे काष्ठमें घर्षण करनेसे अग्निका दर्शन होता है, वैसे ही ध्यानसे परमात्मस्वरूप हरिका दर्शन किया जा सकता है। जब ब्रह्म और परमात्मस्वरूप हरिका दर्शन किया जाता है, जब ब्रह्म और आत्माके एकत्वका ज्ञान होता है तभी योगका उत्कर्ष जानना चाहिये। किसी भी बाह्य उपायसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं हो सकती, मुक्तिकी प्राप्ति आभ्यन्तरिक यम-नियम आदि उपायोंके द्वारा ही होती है। सांख्यज्ञान, योगाभ्यास और वेदान्तादिके श्रवणसे जो आत्माका प्रत्यक्ष होता है, उसे मुक्ति कहा जाता है। मुक्ति होनेपर अनात्मामें आत्माका और असत्-पदार्थमें सत्-तत्त्वका दर्शन होता है।
(अध्याय २३५)
२१६- वैकुण्ठलोकका वर्णन, मरणकालमें और मरणके अनन्तर जीवके कल्याणके लिये विहित विभिन्न कर्तव्योंके बारेमें गरुडजीके द्वारा किये गये प्रश्न, प्रेतकल्पका उपक्रम
काण्ड ] आत्मज्ञाननिरूपण ४३७
आत्मज्ञाननिरूपण
श्रीभगवान् बोले—हे नारद! अब मैं आत्मज्ञानका तात्त्विक वर्णन करूँगा, सुनिये।
अद्वैत तत्त्व ही सांख्य है और उसमें एकचित्तता ही योग है। जो अद्वैत तत्त्व-योगसे सम्पन्न हैं, वे भवबन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। अद्वैत तत्त्वका ज्ञान होनेपर अतीत, वर्तमान और भविष्यके सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। ज्ञानी व्यक्ति सद्विचाररूपी कुल्हाड़ीके द्वारा संसाररूपी वृक्षको काटकर ज्ञान-वैराग्यरूपी तीर्थके द्वारा वैष्णव पद प्राप्त करता है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—यह तीन प्रकारकी अवस्था ही माया है जो संसारका मूल है। यह माया जबतक रहती है, तबतक संसार ही सत्यमें अवगत होता है। वास्तवमें शाश्वत अद्वैत तत्त्वमें ही सब कुछ प्रविष्ट है। अद्वैत तत्त्व ही परब्रह्म है। यह परब्रह्म नाम-रूप तथा क्रियासे रहित है। यह ब्रह्म ही इस जगत्की सृष्टि कर स्वयं उसीमें प्रविष्ट हो जाता है।
'मैं मायातीत चित्पुरुषको जानता हूँ और मैं भी आत्मस्वरूप हूँ।' इस प्रकारका ज्ञान ही मुक्तिका मार्ग है। मोक्ष-लाभके लिये इससे अतिरिक्त अन्य कोई भी उपाय नहीं है*। श्रवण, मनन और ध्यान—ये सभी ज्ञानके साधन हैं। यज्ञ, दान, तपस्या, वेदाध्ययन और तीर्थसेवामात्रसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं होती है। मुक्ति किसी मतसे दान-ध्यानसे तथा किसीके मतसे पूजादि कर्मोंसे होती है। 'कर्म करो' और 'कर्मका त्याग करो'—ये दोनों वचन वेदमें मिलते हैं। निष्कामभावसे यज्ञादि कर्म मुक्तिके लिये होते हैं, क्योंकि निष्कामभावसे अनुष्ठित यज्ञादि अन्तःकरणकी शुद्धिके साधन हैं। ज्ञान प्राप्त होनेपर एक ही जन्ममें मुक्ति प्राप्त हो जाती है। द्वैत (भेद)-भाव रखनेपर तो मुक्ति सम्भव ही नहीं है। कुयोगी भी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। किसी कारण योगभ्रष्ट होनेपर योगियोंके कुलमें उत्पत्ति हो सकती है। ऐसी स्थितिमें मुक्ति सम्भव है।
कर्मोंसे भवबन्धन और ज्ञान होनेसे जीवकी संसारसे मुक्ति हो जाती है, इसलिये आत्मज्ञानका आश्रय करना चाहिये। जो आत्मज्ञानसे भिन्न ज्ञान हैं, उनको भी अज्ञान कहा जाता है। जब हृदयमें स्थित सभी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब जीव जीवनकालमें ही अमरत्वकी प्राप्ति कर लेता है, इसमें संशय नहीं है—
यदा सर्वे विमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः।
तदाऽमृतत्वमाप्नोति जीवन्नेव न संशयः॥
(२३६। १२)
व्यापक होनेसे ब्रह्म कैसे जाता है, कौन जाता है और कहाँ जाता है? ऐसे प्रश्नोंके लिये कोई अवसर ही नहीं है। अनन्त होनेके कारण उसका कोई देश नहीं है; अतः किसी भी रूपमें उसकी गति नहीं हो सकती। परब्रह्म अद्वय है, अतः उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। वह ज्ञानस्वरूप है, अतः उसमें जड़ता कैसे हो सकती है? वस्तुतः ब्रह्म आकाशके समान है, इसलिये उसकी गति, अगति और स्थिति आदिका विचार कैसे हो सकता है? जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्था मायाके द्वारा कल्पित हैं अर्थात् मिथ्या हैं।
वस्तुमात्रका सार ब्रह्म ही है। तेजोरूप ब्रह्मको एक अखण्ड परम पुण्यरूप समझना चाहिये। जैसे अपनी आत्मा सबको प्रिय है, वैसे ही ब्रह्म सबको प्रिय है क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है। हे महामुने!
* वेदाहमेतं पुरुषं चिद्रूपं तमसः परम्। सोऽहमस्मीति मोक्षाय नान्यः पन्था विमुक्तये॥ (२३६। ६)
| ४३८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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सभी तत्त्वज्ञ ज्ञानको सर्वोच्च मानते हैं, इसलिये चित्तका आलम्बन बोधस्वरूप आत्मा ही है। यह आत्मविज्ञान है। यह पूर्ण है, शाश्वत है। जागते, सोते तथा सुषुप्तावस्थामें प्राप्त होनेवाला सुख पूर्ण सुखरूप ब्रह्मका ही एक क्षुद्र अंश समझना चाहिये। जैसे एक मृण्मय वस्तुका (ज्ञान होनेपर) समस्त मृण्मय पदार्थ जान लिया जाता है।
सर्वत्र व्यास शाश्वत तत्त्व ज्ञानस्वरूप ब्रह्म यदि सदा सर्वत्र सभीके हृदयमें विद्यमान नहीं है तो विस्मृत अर्थका स्मरण नहीं होना चाहिये पर होता है। ऐसी स्थितिमें यह स्मरण किसको होता है, निश्चित ही चेतन तत्त्वको ही होता है। इसे ही आत्मा, ब्रह्म, परमात्मा आदिके रूपमें स्वीकार किया गया है। चेतनतत्त्वकी सत्ता—अणु, अशरीरी अथवा परम व्यापक तत्त्व—किसी भी रूपमें स्वीकार किया जाय, पर स्वीकार करना ही है; अन्यथा प्राणीको सुख-दुःखका अनुभव नहीं हो सकेगा। चेतनतत्त्व प्राणिमात्रके हृदयमें साक्षीरूपसे सदा विद्यमान है, इसीलिये यह उसकी प्रत्येक चेष्टाको जानता रहता है और इस जानकारीका फल यह है कि प्राणीके शुभाशुभ कर्मका फल यथासमय मिलता रहता है। यह ब्रह्मतत्त्व सत्य, ज्ञान एवं आनन्दरूप है तथा अनन्त है। सत्य ज्ञानसे पृथक् नहीं होता, अनन्ततासे पृथक् आनन्द नहीं है। वास्तवमें प्रत्येक जीव सत्य, आनन्द एवं ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही है। स्वयंको ब्रह्मरूपमें जानकर जीव अपने वास्तविक स्वरूप सर्वज्ञताको प्राप्त कर लेता है। जैसे एक हेममणि (पारस)-से अनन्त लौहराशि हेममय हो जाती है, उसी प्रकार ईश (ब्रह्म)-का ज्ञान होनेपर ज्ञानीके द्वारा सकल विश्व जान लिया जाता है, जैसे अन्धकारदोषके कारण रस्सी अपने सत्यस्वरूपमें नहीं दिखायी देती, वैसे ही व्यामोहसे ग्रस्त जीवको आत्माका दर्शन नहीं होता। जिस प्रकार प्रत्यक्ष होनेपर भी द्रव्य दृष्टि-दोषके कारण सही नहीं दिखायी देता है, अपितु वह कुरूप प्रतीत होता है। उसी प्रकार आकाशकी सरूपताके कारण वह आत्मतत्त्व असत्य एवं पृथक् प्रतीत होता है। जैसे रज्जुमें सर्पका और सीपमें रजतका आभास होता है और मृगमरीचिकामें जलका आभास होता है, उसी प्रकार विष्णुमें जगत्की प्रतीति होती है।
जैसे कोई द्विज ग्रहाविष्ट होनेके कारण 'मैं शूद्र हूँ' ऐसा मानता है और ग्रह-बाधा नष्ट होनेके पश्चात् वही व्यक्ति पुनः ध्यान करता हुआ अपनेको ब्राह्मण मानता है, वैसे ही मायासे आच्छन्न जीव यह 'मैं ही हूँ' ऐसा स्वीकार करता है। मायारूपी अज्ञानके समाप्त हो जानेपर पुनः वह अपने स्वरूपमें 'मैं ही ब्रह्म हूँ' ऐसा मान लेता है। जैसे ग्रहके नाश हो जानेपर उसको माननेवाला प्राणी उसे क्रूर ग्रहके रूपमें देखता है, वैसे ही अपने स्वरूपका दर्शन होनेपर मायाके अभावमें उसकी मायिक पदार्थोंसे विरक्ति हो जाती है।
जैसे संसार-चक्र अनादि है, वैसे ही उसके मूल भगवान्की माया भी अनादि है। इस मायाके सत् और असत् दो रूप हैं। व्यवहार-कालमें वह सत् और परमार्थतः असत् है। मायाके कारण ही अज परमात्मा भी अपनी मायाके आवेशसे जगत्के रूपमें परिणत होता है। मायाकी इच्छासे ही पति-पत्नी आदिके रूपमें यह सम्पूर्ण जगत् कल्पित है। अट्ठाईस तत्त्वोंका यह त्रिगुणात्मक जगत् और चौरासी लाख योनियोंके नर और नारियोंकी आकृति मायाके द्वारा ही रचित है। त्रिगुणात्मक अट्ठाईस तत्त्वोंके रूपमें मायाके द्वारा ही खण्डशः विश्वकी सृष्टि होती है। वस्तुतः नाम, रूप और क्रिया आदि जगत्की सत्ता मध्यमें ही है आदि और अन्तमें नहीं। इसलिये व्यवहार-कालमें सत्य